आमिर सुहैल वानी
ईद-उल-फितर रमजान के मुकद्दस महीने के पूरा होने का त्यौहार है। बुनियादी तौर पर यह आत्म-नियंत्रण, कृतज्ञता और आध्यात्मिक ऊंचाई का उत्सव है। यह तीस दिनों के रोजों, अनुशासन, दान और आत्म-मंथन के बाद आता है। इन दिनों में एक आस्तिक इंसान अल्लाह की नजदीकी पाने के लिए अपनी जायज खुशियों पर भी पाबंदी लगाता है। लेकिन विडंबना यह है कि जिस दिन को इस अनुशासन का ताज होना चाहिए था, वह अक्सर फिजूलखर्ची, दिखावे और सामाजिक प्रदर्शन की भेंट चढ़ जाता है।

रमजान की जिस भावना को हमें आगे बढ़ाना चाहिए था, कभी-कभी ईद का तरीका उसके उलट हो जाता है। ईद-उल-फितर का सही सम्मान तभी है जब हम सादगी को अपनाएं। खाने-पीने, सामाजिक व्यवहार और भौतिक आदतों में संयम रखना ही इस त्यौहार को अर्थपूर्ण बनाता है।
ईद पर जरूरत से ज्यादा खाने-पीने का मुद्दा काफी गहरा है। महीने भर के रोजों के बाद अच्छा खाना खाने की इच्छा स्वाभाविक है। इस्लाम आनंद लेने से मना नहीं करता। लेकिन संयम से सीधे अतिभोग की तरफ बढ़ जाना बिना सोचे-समझे लिया गया फैसला होता है।
भारी-भरकम दावतें और ढेरों पकवान उस शुक्रगुजारी को दबा देते हैं जो ईद का असली मकसद है। ईद के दिन की शुरुआत 'जकात-अल-फितर' से होती है। यह व्यवस्था इसलिए बनाई गई ताकि समाज का गरीब से गरीब व्यक्ति भी ईद की खुशी में शामिल हो सके।
लेकिन एक तरफ यह फर्ज हमदर्दी सिखाता है, तो दूसरी तरफ हमारी महंगी दावतें अमीरी और गरीबी के बीच एक गहरी खाई दिखाती हैं। ईद पर कम खाने का मतलब खुशी कम करना नहीं है। इसका मतलब है जागरूकता के साथ खाना। उतना ही बनाना जितनी जरूरत हो। सादा भोजन परिवार के साथ बैठकर करना रमजान की रूह के ज्यादा करीब है।

दिखावा सिर्फ खाने तक सीमित नहीं है। यह कपड़ों, तोहफों और सामाजिक उम्मीदों में भी दिखता है। नए कपड़े पहनना सुन्नत है और यह एक नई शुरुआत का प्रतीक है। लेकिन जब यह चलन अमीरी दिखाने का जरिया बन जाए, तो इसका मकसद भटक जाता है।
अक्सर परिवार अपनी हैसियत से ज्यादा खर्च करने के लिए मजबूर महसूस करते हैं। यह सामाजिक दबाव की वजह से होता है। इससे न केवल आर्थिक बोझ बढ़ता है, बल्कि तुलना और होड़ की संस्कृति भी पैदा होती है।
यहाँ सादगी का मतलब अपनी नीयत को पहचानना है। कपड़ों में शान-शौकत के बजाय गरिमा और स्वच्छता को अहमियत देना जरूरी है। जब इंसान दूसरों को प्रभावित करने की इच्छा छोड़ देता है, तो उसे एक सच्ची आजादी महसूस होती है।

दिखावे की एक और परत उन रस्मों से जुड़ी है जिनका कोई आध्यात्मिक आधार नहीं है। घंटों तक चलने वाली सामाजिक मुलाकातें, जो अब प्यार के बजाय मजबूरी बन गई हैं, इंसान को थका देती हैं। सोशल मीडिया पर अपनी खुशियों का प्रदर्शन करना भी असल ईमानदारी को कम करता है। ईद का असली मकसद खुदा का शुक्र अदा करना और आपसी भाईचारा बढ़ाना है। जब बाहरी चमक-धमक इन बुनियादी बातों पर हावी हो जाती है, तो रूहानी सुकून गायब हो जाता है। इसका उपाय सादगी में है। सिर्फ उन्हीं मुलाकातों और कामों को अहमियत दें जो वाकई मायने रखते हैं।
ईद को सादगी से मनाने के फायदे भी बहुत हैं। कम और सही भोजन सेहत के लिए अच्छा है और बर्बादी को रोकता है। आर्थिक रूप से देखें तो फिजूलखर्ची से बचकर परिवार उस पैसे को शिक्षा या दान जैसे बेहतर कामों में लगा सकते हैं। सामाजिक तौर पर इससे एक ऐसा माहौल बनता है जहाँ हर तबके का इंसान खुद को बराबर महसूस करता है। जिस समाज में सादगी की कदर होती है, वहां ईद लोगों को बांटने के बजाय जोड़ने का काम करती है।

इसके आध्यात्मिक लाभ तो और भी गहरे हैं। संयम बरतने से रमजान का अनुशासन बना रहता है। यह दिल को वापस लापरवाही में डूबने से रोकता है। जब हम अपनी इच्छाओं को सीमित करते हैं, तो हमारा ध्यान उपभोग से हटकर खुदा की नेमतों की कदर करने पर जाता है।
इस तरह हम रमजान की इबादत को ईद के दिन भी जारी रखते हैं। यह नजरिया हमें उन लोगों की याद दिलाता है जो जश्न के दिनों में भी संघर्ष कर रहे होते हैं। इंसान का अहंकार कम होता है और उसकी रूह को सुकून मिलता है।
असल में ईद-उल-फितर को सादगी से मनाना खुद को खुशियों से महरूम करना नहीं है। बल्कि यह खुशियों को नए सिरे से परिभाषित करना है। यह सादगी में, साझा दुआओं में और सच्ची मुस्कुराहटों में खुशी ढूंढने का नाम है।

यह इस बात की तस्दीक है कि रमजान के सबक यानी संयम, कृतज्ञता और करुणा—महीना खत्म होने के साथ खत्म नहीं हुए। जब ईद इस तरह मनाई जाती है, तो यह केवल एक त्यौहार नहीं रह जाता। यह एक बदले हुए व्यक्तित्व का आईना बन जाता है,ऐसा व्यक्तित्व जो दिखावे के बजाय सच्चाई और भौतिक प्रचुरता के बजाय आध्यात्मिक समृद्धि को चुनता है।