मंजीत ठाकुर
इन दिनों सड़कों पर ऊंचे तने वाले तने हुए पेड़ों पर लाल बड़े और मांसल फूलों के खिलने का मौसम है. इन्हें देखकर मुझे हितोपदेश की कहानी याद आती है जो हमने आठवीं की संस्कृत की किताब में पढ़ी थी----
अस्ति गोदावरी तीरे एकः शाल्मलीः तरूः
गोदावरी नदी के किनारे सेमल का एक पेड़ था. कहानी में आगे क्या हुआ इसे छोड़िए पर पेड़ याद रह गया. यह पेड़ था सेमल का, जिसके फूलों से इन दिनों फिजां रंगीन है.प्रकृति के पंचांग में वसंत केवल फूलों के खिलने का मौसम नहीं है; यह एक विराट उत्सव है, एक ऐसा समय जब पृथ्वी अपने मौन को तोड़कर रंगों और सुगंधों के माध्यम से बोल उठती है.

आम में जब बौर आते हैं, जिसे हमलोग मिथिला में इसे आम में मंजर आना कहते हैं, तो आम की बौर की मादक गंध और पलाश की प्रचंड लपटों के बीच, एक और जादुई उपस्थिति होती है, जो अपनी भव्यता और निश्छलता में बेजोड़ है. यह उपस्थिति है सेमल की.महाभारत के ‘शांति पर्व’ में भीष्म पितामह ने युधिष्ठिर को ‘अहंकार के दुष्परिणाम’ समझाने के लिए एक कहानी सुनाते हैं.
हिमालय पर एक विशाल और प्राचीन शाल्मली (सेमल) का वृक्ष था. उसे अपनी विशालता और मजबूती पर बड़ा गर्व था. एक बार उसने पवन देव को चुनौती देते हुए कहा, “हे वायु! तुम दुनिया के बड़े-बड़े वृक्षों को उखाड़ फेंकते हो, लेकिन मेरा एक पत्ता भी नहीं हिला सकते. इसका अर्थ है कि मैं तुमसे अधिक शक्तिशाली हूँ.”
वायुदेव ने उसे बहुत समझाया कि उनकी शक्ति से ही जीवन चलता है, पर वृक्ष नहीं माना. अंत में, वायुदेव ने कहा कि वे अपनी शक्ति का प्रदर्शन करेंगे. सेमल के वृक्ष को अपनी भूल का आभास हुआ कि कल जब तेज आंधी आएगी, तो वह टूट जाएगा.
अपने मान की रक्षा के लिए उसने स्वयं ही अपनी टहनियाँ और पत्ते त्याग दिए ताकि वायु को टकराने का मौका न मिले.जब वायुदेव आए, तो उन्होंने देखा कि वृक्ष पहले ही ‘नग्न’ और ‘शक्तिहीन’ हो चुका है. वायुदेव ने कहा, “अहंकार का अंत स्वयं के विनाश से ही शुरू होता है.” यह घटना आज भी भारतीय दर्शन में ‘विनम्रता’ के महत्व को दर्शाने के लिए उद्धृत की जाती है.
बहरहाल, सेमल रंग और सौंदर्य का एक तिलिस्म रचता है. यह विशाल, रक्तिम मशाल आसमान की तरफ सर उठाकर वसंत के आगमन की घोषणा करती है.सेमल केवल एक पेड़ नहीं है; यह एक मौसम है, एक परंपरा है, एक ऐसा अनुभव है जो हमारी संस्कृति के रग-रग में समाया हुआ है.
इन दिनों, जब हवा गुनगुनी हो चली है और धूप में हल्की तपिश आ गई है, सेमल का मौसम अपने चरम पर है, चारों ओर एक रक्तिम और श्वेत उत्सव रच रहा है.
सेमल है कुदरत की रक्तिम कविता
वसंत के आते ही, सेमल का पेड़ एक नए रूप में अवतार लेता है. इसकी नग्न शाखाएँ, जो सर्दियों की ठिठुरन में सूखी और बेजान-सी लग रही थीं, अचानक गहरे लाल रंग के बड़े, कटोरे जैसे फूलों के गुच्छों से लद जाती हैं. ये फूल, मांसल और ठोस, जैसे प्रकृति के सिंदूर के पात्र हों, सीधे आकाश की ओर मुख किए हुए होते हैं.
सेमल के फूल का सौंदर्य इसकी सघनता और इसकी ज्वलंतता में निहित है. एक ही पेड़ पर सैकड़ों फूल, एक साथ खिलकर, एक ऐसा दृश्य रचते हैं जैसे कोई पेड़ों की शाखाएं आग की लपटों से जल रहा हो.
इन फूलों की रक्तिम आभा दूर से ही आँखों को चकाचौंध कर देती है, जैसे हवा में तैरता हुआ कोई विशाल अग्निकुंड.सेमल के फूलों का खिलना केवल आँखों के लिए ही सुखद नहीं है; यह प्रकृति के अन्य प्राणियों के लिए भी एक बुलावा है.
जैसे ही ये फूल खिलते हैं, पेड़ पक्षियों के लिए एक महान सभा स्थल बन जाता है. मैना, कोयल, तोते, और अनगिनत अन्य पक्षी फूलों पर बैठते हैं, उनके पराग का आनंद लेते हैं, और एक-दूसरे से गुफ्तगू करते हैं. सेमल का पेड़ एक जीवित, जीवंत मंच बन जाता है, जहाँ वसंत का संगीत और नृत्य एक साथ चलता है. फूलों के गिरते ही, ज़मीन पर एक रक्तिम कालीन बिछ जाता है, जो किसी शाही बारात के लिए तैयार किया गया हो. इस कालीन पर चलना, जैसे वसंत के हृदय पर चलना हो.
लोककथाओं में सेमल को ‘पशु-पक्षियों का सराय’ कहा जाता है. चूंकि इसके फूल रसीले होते हैं और इसमें पानी की मात्रा अधिक होती है, इसलिए भीषण गर्मी में जब जंगल के अन्य स्रोत सूख जाते हैं, तब सेमल के फूल पक्षियों और बंदरों की प्यास बुझाते हैं.
सेमल के फूलों का सौंदर्य और उनकी बहुतायत ने प्राचीन काल से ही कवियों और साहित्यकारों को आकर्षित किया है. संस्कृत साहित्य में वसंत का वर्णन सेमल के बिना अधूरा है. महाकवि कालिदास ने अपने विख्यात ग्रंथ ‘ऋतुसंहार’ में वसंत ऋतु का अत्यंत सुंदर चित्रण किया है, जहाँ वे सेमल के फूलों का उल्लेख करते हैं:
प्रफुल्लचूतद्रुमकोरकाणां विकाशिनां शाल्मलिपादपानाम्.
चकास्ति लोकेऽयमतुल्यरागः सर्वत्र संचारिणि पुष्पकाले॥”
(ऋतुसंहार, वसंत-वर्णनम्, श्लोक 7)

इस श्लोक का अर्थ है: “जब आम के पेड़ों पर बौर खिल रहे होते हैं और सेमल के पेड़ फूलों से लद जाते हैं, तब इस अतुलनीय प्रेममय पुष्प-काल में सब कुछ देदीप्यमान हो उठता है.” यहाँ ‘शाल्मलि’ सेमल के लिए प्रयुक्त संस्कृत शब्द है, जो इस पेड़ की प्राचीनता और साहित्यिक महत्ता को दर्शाता है.
झारखंड के इतिहास में बिरसा मुंडा के नेतृत्व में हुए ‘उलगुलान’ (विद्रोह) के दौरान भी पेड़ों का बड़ा महत्व था. हालांकि साल का पेड़ मुख्य था, लेकिन सेमल के लाल फूलों का उपयोग अक्सर संदेश भेजने या ‘क्रांति के रंग’ के रूप में लोकगीतों में किया जाता था. सेमल की रुई के उड़ने को अक्सर ‘आजादी के सपनों’ के फैलने की उपमा दी गई है.
भारतीय जनमानस में सेमल से जुड़ा एक बहुत प्रसिद्ध मुहावरा है “सेमल का फूल होना.” इसका अर्थ है, ‘किसी ऐसी चीज पर मोहित होना जिसका परिणाम शून्य या व्यर्थ हो.’
यह लोककथा एक तोते पर आधारित है जो सेमल के बड़े और सुंदर फूल को देखकर इस उम्मीद में बैठा रहता है कि जब यह फल बनेगा, तो उसे मीठा गुदा मिलेगा. लेकिन अंत में जब फल फटता है, तो केवल ‘रुई’ निकलती है जो हवा में उड़ जाती है. यह मुहावरा संसार की माया और मोह के झूठे आकर्षण को दर्शाने के लिए सदियों से इस्तेमाल होता आ रहा है.
बहरहाल, मौसम में गरमाहट बढ़ती है तो सेमल के फूलों का स्थान फल लेने लगते हैं. कली से फल बनने की यह प्रक्रिया एक और चमत्कार है. फल, जो शुरू में छोटे और हरे होते हैं, धीरे-धीरे बढ़ते हैं और एक विशिष्ट आकार ले लेते हैं.
कुछ समय बाद, जब धूप और तेज हो जाती है, ये फल पककर फट जाते हैं. और तब शुरू होता है सेमल का एक और अद्भुत मौसम. रुई का मौसम.फलों के फटने से सफेद, रेशमी रुई के अनगिनत गुच्छे हवा में तैरने लगते हैं. यह जैसे हवा में उड़ते हुए श्वेत बादल हों, या तैरते हुए सपने.
सेमल की रुई का उड़ना, वसंत के अंत और ग्रीष्म के आगमन का संकेत है. हवा शांत हो जाती है, और केवल ये श्वेत गुच्छे हवा में तैरते हुए दिखाई देते हैं. यह एक शांत, मौन उत्सव है.
बच्चे इन उड़ते हुए गुच्छों के पीछे भागते हैं, उन्हें पकड़ने की कोशिश करते हैं, जैसे किसी परी को पकड़ने की कोशिश कर रहे हों. सेमल की रुई को ‘शाल्मली-रुई’ भी कहा जाता है, जो अपने रेशमीपन और कोमलता के लिए प्रसिद्ध है. हालांकि, इसे फ्री या नश्वर कहा जाता है, क्योंकि इसका कोई स्थायी उपयोग नहीं है, जैसे सूती रुई का होता है. यह रुई केवल कुछ दिनों के लिए हवा में तैरती है और फिर गायब हो जाती है.
यही नश्वरता सेमल की रुई को साहित्यिक प्रतीक बनाती है. यह जीवन की व्यर्थता, सांसारिक सुखों की क्षणभंगुरता, और भौतिक वस्तुओं के प्रति मोह को दर्शाती है.
‘भर्तृहरि-शतकत्रय’ में एक श्लोक है-
शाल्मलीतरुणि प्रोद्यत्कुसुमे शुकसङ्गतिः।
केवलं फललोभेन फले सति तु तूलिका॥
यानी, सेमल के वृक्ष पर खिले हुए (लाल और आकर्षक) फूलों को देखकर तोता उस पर बड़ी आशा के साथ आता है. वह वहाँ केवल भविष्य में मिलने वाले मीठे फल के लोभ में रुकता है, लेकिन अंततः जब फल पकता है, तो उसमें से केवल तूला (रुई) निकलती है.
सेमल केवल एक फूल और रुई देने वाला पेड़ नहीं है; यह एक बहुआयामी विरासत है. इसकी लकड़ी हल्की और टिकाऊ होती है, जिसका उपयोग माचिस की तिल्लियाँ, पैकिंग बॉक्स, और अन्य घरेलू वस्तुएँ बनाने में किया जाता है. इसकी छाल, पत्ते, और फूल कई औषधीय गुणों से भरपूर हैं, जिनका उपयोग आयुर्वेद में विभिन्न बीमारियों के इलाज के लिए किया जाता है.
सेमल के तने पर काँटे होते हैं, जो इसे एक सुरक्षात्मक घेरा प्रदान करते हैं, जैसे कोई योद्धा अपनी सुरक्षा के लिए हथियार धारण किए हो. यह काँटेदार तना, इसे “जंगल का रक्षक” बनाता है.
मान्यता है कि जब भक्त प्रह्लाद को खंभे से बांधा गया था, तो वह खंभा सेमल का ही था. भगवान की कृपा से वे कांटे प्रह्लाद के लिए कोमल बन गए. आज भी कई गाँवों में होली जलने के बाद उस सेमल के डंडे को जलने से बचाकर सुरक्षित निकाल लिया जाता है, जो प्रह्लाद की विजय का प्रतीक माना जाता है.
इसकी दृढ़ता और विशालता भी इसे एक विशेष स्थान देती है. यह एक ऐसा पेड़ है जो विपरीत परिस्थितियों में भी अपना अस्तित्व बनाए रखता है, और एक अनूठे तरीके से सौंदर्य और उपयोगिता दोनों प्रदान करता है. सेमल का पेड़, अपनी रक्तिम मशाल और श्वेत सपनों के साथ, हमारे लिए प्रकृति की उस शक्ति का प्रतीक है जो विपरीत परिस्थितियों में भी अपना अस्तित्व बनाए रखती है और एक अनूठे तरीके से सौंदर्य और उपयोगिता दोनों प्रदान करती है.

आज जब हम सेमल के मौसम का आनंद ले रहे हैं, तो हमें इस बहुमूल्य विरासत को सहेजने और उसे आगे बढ़ाने की आवश्यकता है. यह केवल एक पेड़ नहीं है, बल्कि हमारी संस्कृति, हमारे साहित्य, और हमारी परंपराओं का एक अभिन्न हिस्सा है.
सेमल का मौसम हमें यह याद दिलाता है कि सौंदर्य और उपयोगिता दोनों एक साथ रह सकते हैं, और यह कि प्रकृति के हर पहलू में एक गहरा संदेश छिपा होता है. आइए, इस रक्तिम और श्वेत उत्सव को मनाएँ, और सेमल की विरासत को अगली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रखें. सेमल का मौसम एक बार फिर आएगा, अपनी रक्तिम मशाल और श्वेत सपनों के साथ, और हमें फिर से एक नया संदेश देगा.
( लेखक आवाजद वाॅयस एवी के संपादक हैं.)