देस-परदेस: पश्चिम एशिया की भूल-भुलैया में भारत

Story by  प्रमोद जोशी | Published by  [email protected] | Date 03-02-2026
India in the labyrinth of West Asia
India in the labyrinth of West Asia

 

 

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प्रमोद जोशी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इस महीने संभावित इसराइल-यात्रा से पहले, पिछले शनिवार को अरब विदेश मंत्रियों के साथ दूसरी बैठक की मेजबानी करके भारत ने स्पष्ट कर दिया कि पश्चिम एशिया में हमारी गहरी दिलचस्पी है और इस इलाके के आर्थिक-विकास में हम भी भागीदार हैं.

इस बैठक की पृष्ठभूमि में डॉनल्ड ट्रंप के ‘बोर्ड ऑफ पीस’ के गठन और उसमें शामिल होने के भारत को प्राप्त आमंत्रण और उसपर चुप्पी पर भी ध्यान देना होगा. अकसर लोगों को लगता है कि भारत ने प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की. पश्चिम एशिया की जटिलता को देखते हुए तीखी प्रतिक्रियाएँ संभव नहीं है. संज़ीदा डिप्लोमेसी से ऐसी उम्मीद करनी भी नहीं चाहिए.

ध्यान दें कि गज़ा क्षेत्र के पुनर्निर्माण में भारत के लोगों और कंपनियों को भी काम मिलेगा. दूसरी तरफ ईरान में चल रहे आंदोलन और उसे लेकर अमेरिकी धमकियों पर भी हमें निगाहें रखनी होंगी. विदेश-नीति केवल नैतिक-आधारों पर नहीं चलती हैं. वे राष्ट्रीय हितों पर आधारित होती है. पश्चिम एशिया की डगर आसान नहीं है, क्योंकि वहाँ हर कदम पर जोखिम हैं, फिर भी भारतीय डिप्लोमेसी वहाँ संतुलित और शालीन तरीके से आगे बढ़ रही है.

इस क्षेत्र के देशों के आपसी अंतर्विरोधों के बावज़ूद भारत के सभी देशों के साथ अच्छे रिश्ते हैं. इसराइल, ईरान और अरब देशों के साथ भी. ऐसे में संतुलन बनाना बहुत ज़रूरी है, जिसका ख्याल भारत ने हमेशा रखा है और इसमें सफलता भी हासिल की है.

पेच दर पेच

इन बातों के अलावा हाल में सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात के बीच बढ़ते मतभेदों की अनदेखी भी नहीं की जा सकती है. उधर पाकिस्तान की गतिविधियों पर भी हमें ध्यान देना होगा.

छोटी-छोटी बातें महत्त्वपूर्ण हो रही हैं. हाल में पाकिस्तान और सऊदी अरब के रक्षा-सहयोग समझौते में तुर्की के शामिल होने की संभावनाओं ने भी भविष्य के परिदृश्य पर नज़रें रखने को प्रेरित किया है. दूसरी तरफ भारत भूमध्य सागर में साइप्रस और ग्रीस के साथ सुरक्षा से जुड़े संबंध बना रहा है, जो तुर्की की परेशानी बढ़ा सकते हैं.

भारत और यूरोपीय संघ के बीच हुए समझौतों में एक महत्त्वपूर्ण कारक भारत-पश्चिम एशिया-यूरोप कॉरिडोर की पेशकश भी है, जिसमें सऊदी अरब और इसराइल की भूमिकाएँ भी हैं. चाबहार पोर्ट के रास्ते में अड़ंगे लग जाने के बाद यह रास्ता भारत को यूरोप से जोड़ने में मददगार होगा.

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फलस्तीन का सवाल

पश्चिम एशिया में फलस्तीन एक जटिल समस्या है. भारत ‘टू स्टेट’ समाधान का पक्षधर है, यानी एक स्वतंत्र फलस्तीन और इसराइल. इस समय फलस्तीन प्राधिकरण के रूप में एक निकाय काम कर रहा है, जिसे यासर अरफात के उत्तराधिकारी चला रहे हैं. इसके साथ भारत के काफी मजबूत रिश्ते हैं.

भारत-अरब विदेश मंत्रियों की बैठक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि हम फलस्तीनी लोगों की भावनाओं के साथ गज़ा शांति-योजना का समर्थन भी करते हैं. उन्होंने सम्मेलन में आई फलस्तीनी विदेशमंत्री वारसेन अघबेकियान से मुलाकात भी की.

पीएम मोदी ने इस क्षेत्र के देशों के साथ व्यापार और निवेश, ऊर्जा, तकनीक, स्वास्थ्य और दूसरे क्षेत्रों में सहयोग को गहरा करने के लिए भारत की प्रतिबद्धता को दोहराया. इसके अलावा भारत ने अरब देशों को आतंकवाद से जुड़ी अपनी चिंताओं को समझाने का प्रयास भी किया है.

आतंक पर ज़ीरो टॉलरेंस

इस बैठक के बाद जारी दिल्ली घोषणापत्र में आतंकवाद के प्रति ‘ज़ीरो टॉलरेंस’ के सिद्धांत को दोहराया गया, सीमा पार आतंकवाद की निंदा की गई और सभी देशों से दूसरे देशों के खिलाफ आतंकवाद का इस्तेमाल न करने का आग्रह किया गया.

अरब विदेशमंत्रियों ने पहलगाम में हुए आतंकवादी हमले की कड़ी निंदा की और  आतंकवाद से हर रूप में लड़ने में 'पूर्ण और अटूट समर्थन' देने की पुष्टि की. विदेशमंत्री एस जयशंकर ने भी सीमा पार आतंकवाद समेत हर तरह के आतंकवाद को साझा चुनौती बताया और कहा कि आतंकवाद से पीड़ित देशों  आत्मरक्षा के उपाय करने का अधिकार है.

जयशंकर ने कहा कि हम ऐसे वक्त मिल रहे हैं जब ग्लोबल ऑर्डर में बदलाव आ रहा है. राजनीति, अर्थव्यवस्था, तकनीक और डेमोग्राफी जैसे हर क्षेत्र में जो बदलाव हो रहा है, वह पश्चिम एशिया में साफ नज़र आ रहा है. उन्होंने सूडान और यमन के साथ सीरिया, लेबनान और लीबिया का जिक्र भी किया. इन सभी इलाकों में हलचल मची हुई है. 

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सहयोग का व्यापक एजेंडा

भारत और अरब देश सहयोग के ऐसे एजेंडा पर विचार कर रहे हैं, जिसमें ऊर्जा, पर्यावरण, कृषि, पर्यटन, मानव संसाधन विकास, संस्कृति और शिक्षा वगैरह शामिल हैं। सहयोग के नए आयाम खुल रहे हैं, जैसे डिजिटल, स्पेस, स्टार्ट-अप, इनोवेशन वगैरह. इस लिहाज से भारत-अरब चैंबर ऑफ कॉमर्स, इंडस्ट्री और एग्रीकल्चर लॉन्च किया गया है.

यह घटनाक्रम भारत की पश्चिम एशिया रणनीति में चल रहे एक शांत लेकिन महत्वपूर्ण बदलाव को दर्शाता है. इससे यह भी स्पष्ट हो रहा है कि भारत सरकार, अरब जगत के साथ विश्वास, संवाद और साझा हितों का एक आधार तैयार कर रही है, जो ठोस सुरक्षा सहयोग को दीर्घकालिक कूटनीतिक और आर्थिक सोच के साथ जोड़ेगा.

इस बैठक में 22अप्रैल 2025के पहलगाम हमले और नई दिल्ली में लाल किले के पास 10नवंबर 2025की घटना का स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया. ये केवल प्रतीकात्मक उल्लेख नहीं थे. ये पीड़ित होने और असुरक्षा की भावना की साझा समझ को दर्शाते थे.

सऊदी सहयोग

पिछले एक दशक में, सऊदी अरब ने आतंकवाद और गंभीर आपराधिक मामलों में भारतीय अधिकारियों द्वारा वांछित कई व्यक्तियों का प्रत्यर्पण किया है, जो बढ़ते विश्वास और राजनयिक-समन्वय को दर्शाते हैं.

यह बैठक 10साल के अंतराल के बाद हुई है. पहली बैठक 2016में बहरीन में हुई थी. 2016में उस पहली बैठक में भारत ने पहली बार एक सुगठित प्रारूप में अरब लीग के साथ उस स्तर पर बातचीत की. अर्थव्यवस्था, ऊर्जा, शिक्षा, मीडिया और संस्कृति जैसे पाँच प्राथमिकता वाले क्षेत्रों की पहचान ने एक खाका प्रदान किया, जिसने दूसरी बैठक को दिशा दी है.

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इसराइल-यात्रा

अरब देशों के साथ रचनात्मक बातचीत के बाद राजनयिक क्षेत्र में प्रधानमंत्री मोदी की इसराइल की जल्द यात्रा की उम्मीदें लगाई जा रही हैं. भारत दोनों पक्षों के बीच सेतु की भूमिका निभा सकता है.ऐसा लगता है कि घटनाक्रम में तेजी से बदलाव आएगा. इसराइली प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू की भारत-यात्रा का भी काफी समय से इंतज़ार है.

नई दिल्ली ने अभी तक अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप के गज़ा शांति बोर्ड में शामिल होने के निमंत्रण पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है. माना जा रहा है कि अरब देशों और इसराइल के नेतृत्व के साथ इस विषय पर भी चर्चा हुई है. इसराइल और पाकिस्तान सहित 20से अधिक देश इसमें शामिल हो चुके हैं, जिनमें आठ इस्लामिक देश भी हैं.

औपचारिक रूप से भारत ने इस पहल का स्वागत किया है. हाल में संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि पर्वतनेनी हरीश ने कहा कि इसराइल-फलस्तीन संघर्ष को सुलझाने और गज़ा के लिए शांति बोर्ड की स्थापना का भारत स्वागत करता है.

सिद्धांततः इसमें शामिल होने में भी दिक्कत नहीं है, पर इसमें पाकिस्तान के साथ बैठना होगा, जिसके साथ कुछ पेचीदगियाँ जुड़ी हैं.

ईरान और भारत

अमेरिका-इसराइल और ईरान के रिश्तों के द्वंद को देखते हुए भारत के ईरान के साथ रिश्तों पर भी नज़र डालनी चाहिए. संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद (यूएनएचआरसी) में पश्चिमी देशों द्वारा ईरान के खिलाफ लाए गए प्रस्ताव के विरोध में भारत ने वोट देकर न केवल अपनी राजनयिक स्वतंत्रता का प्रदर्शन किया है, साथ ही यह भी स्पष्ट किया है कि हम ईरान के साथ अपने सांस्कृतिक और राजनयिक-संबंधों पर कायम रहेंगे.

यह प्रस्ताव पश्चिमी देशों, विशेष रूप से अमेरिका और उसके सहयोगियों ने पेश किया था, जिसमें ईरान की सरकार पर महिलाओं के अधिकारों, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और राजनीतिक असहमति के दमन के आरोप लगाए गए थे.

ईरान के संदर्भ में भारत ने अमेरिकी बंदिशों को लागू ज़रूर किया है, पर अपने नज़रिए को भी स्पष्ट किया है. हाल में अमेरिकी सरकार ने ईरान के साथ कारोबार करने वाले हर देश पर 10प्रतिशत का अतिरिक्त टैक्स लगाने का फैसला किया है.

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चाबहार बंदरगाह

चाबहार पोर्ट में भारतीय गतिविधियाँ रुक गई हैं, क्योंकि अमेरिका ने भारत को मिली छूट वापस ले ली है. अमेरिकी दबाव के कारण भारत पहले ही ईरान से खनिज तेल की खरीद बंद कर चुका है. 2019में शुरू हुए प्रतिबंधों के बाद से भारत ने ईरान के साथ व्यापारिक संबंधों को सीमित कर रखा है, जिसमें ऊर्जा क्षेत्र से लेकर अन्य कारोबारी गतिविधियां शामिल हैं.

रविवार को संसद में रखे गए भारतीय बजट में चाबहार बंदरगाह के लिए किसी धनराशि का आबंटन नहीं किया गया है. पिछले साल के बजट में भारत ने चाबहार बंदरगाह के लिए चार सौ करोड़ रुपए का प्रावधान किया था. ऐसा पहली बार हुआ है जब भारत ने ईरान के साथ इस साझा परियोजना के लिए बजट में कोई प्रावधान नहीं किया है.

दस साल पहले मई 2016में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ईरान दौरा किया था. 15साल में किसी भारतीय प्रधानमंत्री की वह पहली ईरान यात्रा थी. उस दौरे में मोदी ने भारत, ईरान और अफ़ग़ानिस्तान के बीच एक त्रिपक्षीय संबंध के लिए ईरान में चाबहार पोर्ट को विकसित और संचालित करने के लिए 55करोड़ डॉलर निवेश की घोषणा की थी.

लगता है कि हमें अब अपनी नीतियों में सिरे से कुछ बदलाव करने होंगे. भारत के लिए यह बंदरगाह इसलिए महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि इसके मार्फत अफ़ग़ानिस्तान और मध्य एशिया के बाज़ारों तक भारत पहुँच सकता है. फिलहाल यह रास्ता बंद होता नज़र आ रहा है.

( लेखक हिंदी दैनिक हिन्दुस्तान के संपादक रहे हैं)


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