अब्दुल्लाह मंसूर
आज़ादी के बाद भारतीय राजनीति जिस मुक़ाम पर पहुँची है, वहाँ मुसलमानों के भीतर पहली बार यह भावना मज़बूत हुई है कि उन्हें अपना एक अलग “मुस्लिम नेता” और “मुस्लिम पार्टी” मिल रही है। अब तक आम तौर पर मुसलमान सेक्युलर कही जाने वाली पार्टियों को वोट देते रहे हैं और उन्हीं दलों के नेताओं को “अपने नेता” मानते रहे हैं, जो असल में किसी बड़े राष्ट्रीय दल का हिस्सा होते थे। लेकिन हाल के वर्षों में यह पैटर्न बदलता दिखाई दे रहा है। असदुद्दीन ओवैसी और उनकी पार्टी एआईएमआईएम का उभार इसी बदलाव का संकेत है। यह उभार सिर्फ़ किसी एक नेता की सफलता नहीं, बल्कि मुस्लिम समाज की राजनीतिक बेचैनी, डर और निराशा का परिणाम है।
महाराष्ट्र के नगर निकाय चुनावों में एआईएमआईएम का उल्लेखनीय प्रदर्शन, शरद पवार की एनसीपी या राज ठाकरे की एमएनएस से बेहतर वोट शेयर हासिल करना, यह बताता है कि ओवैसी को हल्के में नहीं लिया जा सकता। जब सत्ताधारी राजनीति खुले तौर पर आक्रामक धार्मिक भाषा अपनाती है, तब अल्पसंख्यक समाज में असुरक्षा का भाव पैदा होना स्वाभाविक है। ऐसे माहौल में मुस्लिम युवाओं का उन नेताओं की ओर झुकना भी समझ में आता है जो उसी तीखी भाषा में जवाब देने का दावा करते हैं। डर के समय अक्सर विवेक से ज़्यादा आवाज़ सुनी जाती है, और यही पहचान की राजनीति की बुनियाद बनती है।
प्रतिनिधित्व का दावा या ध्रुवीकरण की राजनीति
ओवैसी की राजनीति को केवल धार्मिक उन्माद कह देना एक सरलीकरण होगा। वे खुद को संविधान, नागरिक अधिकार और हिस्सेदारी की भाषा में पेश करते हैं। एक बैरिस्टर के रूप में उनकी छवि यह भरोसा देती है कि वे मुसलमानों के संवैधानिक अधिकारों की बात कर रहे हैं।
उनका सबसे बड़ा आरोप यह है कि सेक्युलर पार्टियाँ मुसलमानों के वोट तो लेती हैं, लेकिन उन्हें न तो सही प्रतिनिधित्व देती हैं और न ही सत्ता की संरचना में कोई वास्तविक जगह। इसी खालीपन में ओवैसी एक मज़बूत विकल्प की तरह सामने आते हैं।
मुस्लिम युवाओं का ओवैसी की ओर आकर्षण इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए। यह सिर्फ़ भाषणों का असर नहीं है, बल्कि उस व्यवस्था के ख़िलाफ़ प्रतिक्रिया है जिसमें मुसलमानों को हमेशा “कमज़ोर समर्थक” की तरह देखा गया। सोशल मीडिया और नए संचार माध्यमों ने युवाओं को अपनी राय बनाने की आज़ादी दी है और ओवैसी इस मंच पर सबसे मुखर आवाज़ बनकर उभरे हैं। यह पारंपरिक नेतृत्व को भी चुनौती देता है, जहाँ कभी घर के बुज़ुर्ग या धार्मिक नेतृत्व तय करता था कि वोट किसे देना है।
लेकिन यहीं से समस्या शुरू होती है। ओवैसी की राजनीति चाहे संविधान की भाषा में लिपटी हो, उसका व्यावहारिक असर धार्मिक ध्रुवीकरण को ही मज़बूत करता है। जब मुस्लिम समाज एक अलग राजनीतिक पहचान के रूप में सामने आता है, तो बहुसंख्यकवादी ताक़तों के लिए “80बनाम 20” की राजनीति और आसान हो जाती है।
हिंदू सांप्रदायिकता को आगे बढ़ने के लिए मुस्लिम सांप्रदायिकता की ज़रूरत पड़ती है। ओवैसी या उनके जैसे नेता जब तीखी धार्मिक बयानबाज़ी करते हैं, तो उसका सीधा फ़ायदा हिंदू ध्रुवीकरण को मिलता है। यही कारण है कि राइट-विंग तंत्र ओवैसी के बयानों को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाता है एक तरफ़ हिंदू समाज को डराकर गोलबंद किया जाता है और दूसरी तरफ़ मुसलमानों में ओवैसी को “निडर नेता” के रूप में स्थापित किया जाता है। यह एक ऐसा दुष्चक्र है जिसमें दोनों छोर एक-दूसरे को ताक़त दे रहे हैं।
इतिहास हमें चेतावनी देता है। मुस्लिम लीग और जिन्ना की राजनीति ने भी प्रतिनिधित्व के नाम पर धार्मिक पहचान को केंद्र में रखा था, जिसका नतीजा देश के बँटवारे के रूप में सामने आया। आज भी सत्ता में बैठे लोगों के लिए यह ज़्यादा फ़ायदेमंद है कि मुसलमानों को एक “कट्टर धार्मिक समूह” के रूप में देखा जाए, न कि समान नागरिक के रूप में। पहचान की राजनीति इसी सोच को मज़बूत करती है।
पसमांदा समाज और पहचान की राजनीति का असली नुकसान
इस पूरी राजनीति का सबसे बड़ा नुकसान पसमांदा और वंचित तबकों को होता है। जब राजनीति सिर्फ़ “मुस्लिम पहचान” के इर्द-गिर्द घूमने लगती है, तो समाज के भीतर मौजूद जातिगत असमानता, ग़रीबी, शिक्षा और रोज़गार जैसे सवाल पीछे छूट जाते हैं। एक पसमांदा नज़रिए से देखा जाए तो सवाल यह नहीं है कि कोई नेता कितनी तेज़ भाषा बोलता है, बल्कि यह है कि उसकी राजनीति किसके हक़ में जाती है।
मुस्लिम समाज कोई एकसमान इकाई नहीं है। उसके भीतर पसमांदा और अशराफ़ का गहरा फ़ासला है। आबादी के लिहाज़ से भारत के 80प्रतिशत से ज़्यादा मुसलमान पसमांदा हैं, लेकिन नेतृत्व हमेशा ऊपरी तबकों के हाथ में रहा है।
मरहूम अशफ़ाक हुसैन अंसारी जो लोक सभा सांसद भी रहे ने जानकारी दी है कि अगर पहली से लेकर चौदहवीं लोकसभा की लिस्ट उठा कर देखें तो पाएंगे कि तब तक चुने गए सभी 7,500प्रतिनिधियों में 400मुसलमान थे; इन 400 में 340 अशराफ और केवल 60पसमांदा तबके से थे।
पहचान की राजनीति इस असमानता पर बात करने की गुंजाइश ही खत्म कर देती है। मॉब लिंचिंग हो या पुलिसिया ज़्यादती, उसका शिकार ज़्यादातर वही लोग होते हैं जो सामाजिक और आर्थिक रूप से सबसे कमज़ोर हैं, जबकि नेतृत्व करने वाले सुरक्षित रहते हैं।
जज़्बाती और पहचान-आधारित राजनीति में पसमांदा आबादी जो ज़्यादातर कारीगर, दस्तकार और मेहनतकश है के सवालों के लिए जगह ही नहीं बचती। मुस्लिम संस्कृति की मुख्यधारा में क़व्वाली, ग़ज़ल और बड़े नामों का ज़िक्र मिलता है, लेकिन जुलाहों के करघे, बख़्खो के गीत और पसमांदा नायकों की विरासत गायब रहती है। इसलिए ‘मुस्लिम एकता’ का नारा पसमांदा मुसलमानों के लिए अक्सर घाटे का सौदा बन जाता है।
ओवैसी की अपील भी मुख्य रूप से शहरी मुसलमानों तक सीमित दिखती है। ग्रामीण और हाशिए के तबकों में उनकी पकड़ उतनी गहरी नहीं है। यह इस बात का संकेत है कि पहचान की राजनीति तेज़ शोर तो पैदा कर सकती है, लेकिन व्यापक सामाजिक बदलाव की गारंटी नहीं देती।
आम मुसलमान भी अन्य नागरिकों की तरह बिजली, पानी, सड़क, शिक्षा और रोज़गार के सवालों पर वोट करता है। सिर्फ़ धार्मिक भावनाओं के सहारे स्थायी राजनीतिक ताक़त नहीं खड़ी की जा सकती। भारत जैसे बहुलतावादी और असमान समाज में मुसलमानों की अलग राजनीतिक पार्टी बनाना व्यावहारिक रूप से फ़ायदेमंद नहीं है।
अल्पसंख्यक होने और भीतर से जाति, वर्ग और क्षेत्र के आधार पर बँटे होने के कारण ऐसी राजनीति उनकी ताक़त को और बिखेर देती है। अलग पार्टी उन्हें मुख्यधारा से काटकर एक राजनीतिक घेट्टो में बदल देती है, जिसका सीधा फ़ायदा बहुसंख्यकवाद को मिलता है।

यह मानना ज़रूरी है कि ओवैसी का उभार मुस्लिम समाज की निराशा और सेक्युलर दलों की विफलताओं का नतीजा है। इसे सिर्फ़ किसी की “बी-टीम” कहकर खारिज करना ग़लत होगा। लेकिन उतना ही ख़तरनाक होगा इसे मुस्लिम मुक्ति की आख़िरी राजनीति मान लेना। धार्मिक पहचान की राजनीति अंततः उसी कट्टरता को मज़बूत करती है, जिससे लड़ने का वह दावा करती है।
Also Watch:
पसमांदा आंदोलन सिर्फ़ सामाजिक न्याय की लड़ाई नहीं है, बल्कि यह एक वैकल्पिक राष्ट्रवादी दृष्टि भी पेश करता है। यह मुसलमानों को उनके भारतीय मूल से जोड़ने की कोशिश है, न कि उन्हें किसी विदेशी पहचान में क़ैद करने की।
मुस्लिम लीग की राजनीति ने हिंदू और मुसलमान को मूलतः अलग क़ौमें बताया, जबकि पसमांदा आंदोलन कहता है कि हम इस देश की मिट्टी से पैदा हुए लोग हैं हमारी आस्था इस्लाम में है, लेकिन हमारी संस्कृति, भाषा, पहनावा और जीवन भारतीय है।
इस आंदोलन की चिंता यह है कि कोई भी राजनीति भारतीय राष्ट्र को कितना मज़बूत करती है, उसे कितना लाभ पहुँचाती है और कहीं वह बँटवारे व अलगाव की सोच को तो बढ़ावा नहीं दे रही। पसमांदा नज़रिए से यह देखना ज़रूरी है कि किसी राजनीतिक दिशा से मूल भारतीय समाज, खासकर पसमांदा तबकों, को कितना वास्तविक फ़ायदा मिल रहा है और वह सामाजिक न्याय को कितना आगे बढ़ा रही है। इसलिए सवाल यह नहीं कि ओवैसी कितनी सीटें जीतते हैं, बल्कि यह है कि उनकी राजनीति सामाजिक न्याय, आंतरिक बराबरी और लोकतांत्रिक साझेदारी को कितनी जगह देती है।
(अब्दुल्लाह मंसूर, एक लेखक और पसमांदा बुद्धिजीवी हैं।)