लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) सैयद अता हसनैन सेना के सबसे मुखर दिग्गजों में से एक हैं. वह उन मुद्दों पर बात करते हैं, जो भारत की आंतरिक सुरक्षा के लिए मायने रखते हैं और वे आम लोगों के लिए सरल शब्दों में रणनीतिक मुद्दों की व्याख्या करते हैं. हसनैन जैसे जनरल हमेशा एक कर्तव्यनिष्ठ सिपाही की छवि के साथ जीते हैं, जो हमेशा ड्यूटी पर तैनात रहता है. टेलीविजन पर उनकी खरी-खरी बातों, समाचार पत्रों में लेख और विश्वविद्यालयों और थिंक टैंक्स में भाषणों ने रक्षा और सशस्त्र बलों के बारे में सार्वजनिक धारणा को बदला है.
जनरल हसनैन तरक्की करते हुए आर्मी कॉर्प्स कमांडर बने और कश्मीर में तैनात हुए. उनका कार्यकाल आज भी उग्रवाद के दौरान कश्मीर में सर्वश्रेष्ठ सेना-नागरिक संबंधों के लिए याद किया जाता है. आज तक जनरल हसनैन घाटी में लोगों द्वारा याद किए जाते हैं. जनरल हसनैन एक फौजी परिवार से आते हैं और वे गढ़वाल रेजिमेंट में उस समय एकमात्र मुस्लिम अधिकारी थे.
उन्होंने आवाज-द वॉयस (अंग्रेजी) की संपादक आशा खोसा से हुई वार्ता में एक सिपाही के तौर पर अपनी यात्रा के बारे बातें साझा कीं और यह भी कि सेना कैसे अपने धर्मनिरपेक्ष लोकाचार को बनाए रखती है. जबकि विभिन्न रेजिमेंटों ने धर्म के आधार पर ही युद्ध लड़े हैं.
प्रस्तुत हैं साक्षात्कार के कुछ चुनिंदा अंशः
स्वागत है, लेफ्टिनेंट जनरल सैयद अता हसनैन. खुशी की बात है कि आप आवाज-द वॉयस के साथ बात कर रहे हैं. मैं आपके एक लेख के बारे में कुछ पूछकर बात की शुरुआत करना चाहती हूं, जो मैंने हाल ही में पढ़ा है, भारतीय सेना में शामिल होने से भी आप कमतर मुस्लिम नहीं हो जाते. आपने यह क्या लिखा है, इसका संदर्भ क्या था?
मैं इस सवाल पर मोहित हो गया हूं. सच कहूं, तो मैं यहां इसका जवाब दिए जाने की उम्मीद नहीं कर रहा था. मैंने यह लेख इसलिए लिखा है कि बहुत सारे भारतीय मुस्लिमों के बीच यह आशंका है कि उनका भारतीय सेना में स्थान (महत्व) नहीं हैं. उन्हें लगता है कि उनके साथ किसी तरह का भेदभाव किया जाएगा, वे महसूस करते हैं कि सेना में उनकी आहार संबंधी आदतों का सम्मान नहीं किया जाएगा. सभी चीजों में, उन्हें लगता है कि सेना में उनसे शराब का सेवन करने की उम्मीद की जाती है. ऐसी चीजों के बारे में गलतफहमी लंबे समय से है, जो विशेष रूप से महानगर (दिल्ली) में रहने वाले लोगों के बीच है, क्योंकि उनके पास सेना और उसकी संस्कृति तक पहुंच नहीं है. भारतीय सेना के सामाजिक और पेशेवर पहलू के बारे में न केवल मुसलमानों, बल्कि समाज के सभी वर्गों को संवेदनशील बनाना महत्वपूर्ण है.
.webp)
लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) सैयद अता हसनैन
आप भी मुसलमान हैं, क्या आप अपने अनुभव हमारे दर्शकों के साथ साझा कर सकते हैं?
मुझे खुशी है कि आपके पोर्टल के माध्यम से मेरी आवाज कई लोगों तक पहुंचेगी. आप हिंदी में कितनी सहज हैं? मैं हिंदी में बोलना चाहता हूं, क्योंकि मेरी आवाज कई लोगों तक पहुंच सकती है.
जरूर, प्लीज सर, आगे बढ़िए.
(हिंदी में) मेरी यात्रा अलग थी. मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि मैं एक विशेषाधिकार प्राप्त व्यक्ति हूं. मेरे पिता भारतीय सेना में थे, वह एक मेजर जनरल के रूप में सेवानिवृत्त हुए. इस तरह मैं सेना में पैदा हुआ था - स्वतंत्रता के बाद. मेरे पिता स्वतंत्रता-पूर्व भारतीय सेना के थे और वे भारत की स्वतंत्रता के बाद भी (सेना में) बने रहे. उनके पास पाकिस्तान जाने का विकल्प था, हो सकता है, वे वहां जनरल बन गए होते (हंसते हुए). होशपूर्वक, उन्होंने (पिता जी ने) साफ कहा कि यह नहीं. उन्होंने (पिता जी ने) कहा कि मैं भारतीय सेना की एक रेजिमेंट से संबंधित हूं, जिसका मैं सम्मान करता हूै, ये यह मेरा घर है, मेरा पेशा है. जब मुझे चुनाव करना था, तो मैंने कहा कि मैं भी सेना में शामिल हो जाऊंगा. मैं उसी रेजिमेंट (पिता जी की रेजीमेंट) में शामिल हुआ, वही बटालियन.
कुछ चीजें हैं, जो बाहरी लोगों के लिए दिलचस्प हैं. मैं अपनी रेजिमेंट में अकेला मुसलमान था. गढ़वाल राइफल्स एक शुद्ध गढ़वाली बटालियन है. गढ़वाली जवान सबसे उत्कृष्ट हिंदू हैं. आखिरकार, यह ‘चार धाम’ (चार प्रमुख हिंदू तीर्थों) की भूमि है. मैं अक्सर चार धाम जाया करता था. मैंने कई बार बद्रीनाथ के दर्शन किए. सेना में, हम एक दूसरे की आस्था का सम्मान करना सीखते हैं. मैंने टाइम्स ऑफ इंडिया में लिखा कि उनके सैनिकों की आस्था उनके अधिकारी की आस्था है. यदि आपके सभी जवान ईसाई हैं, तो आप ईसाई धर्म का पालन करेंगे या कहें कि सभी हिंदू हैं, तो आपको उनके धर्म का पालन करना होगा. इसका मतलब है कि हर रविवार को आप अपने जवानों के साथ मंदिर में होते हैं. श्रीलंका या सियाचिन में होने वाले ऑपरेशनों से पहले, हम पहले मंदिर में जाते हैं, प्रार्थना करते हैं, हाथ जोड़ते हैं, टीका लगाते हैं, और वापसी पर भी टीका लगाते हैं. हम ‘जय बद्री विशाल’ का युद्ध-घोष करते हैं. सैनिकों के कमांडर के लिए ये बहुत महत्वपूर्ण पहलू हैं. अगर लोगों को यह लगता है कि मैं ऐसा नहीं कर सकता, क्योंकि मैं एक मुस्लिम या ईसाई हूं, मुझे खेद है, सेना में ऐसे लोगों के लिए कोई जगह नहीं है. हम इस पर बहुत दृढ़ हैं, यह हमारा लोकाचार है. सम्मान, पारदर्शिता और विविधता हमारा सम्मान है. इस पर कोई भी किसी भी तरह से समझौता नहीं करता है. सिर्फ इसलिए कि मैं हिंदुओं की कमान संभाल रहा हूं, मैं कमतर मुसलामन नहीं हो जाता. मैं अन्य मुसलमानों के बराबर हूं. सेना में, किसी की आस्था से समझौता करने का कोई रिवाज नहीं है.
आप इसे कैसे करते हैं? एक तरफ, जब हम सेना के आदमी को देखते हैं, तो हमारे दिमाग में संतुलन, वीरता, अनुशासन की छवि कौंध जाती है. फिर भी सभी युद्ध-घोष धर्म पर आधारित हैं. आप एक विशेषाधिकार प्राप्त पृष्ठभूमि से हैं और आपका मामला अलग हो सकता है. लेकिन इस बात की संभावना है कि रूढ़िवादी पृष्ठभूमि से आने वाला कोई व्यक्ति खुद को इस माहौल में अनुपयुक्त महसूस करे?
मैं इससे इनकार नहीं करूंगा (किसी के असहज होने की संभावना है). भारत में बहुत सारे लोग हैं जो इसे (इस विचार को) इस तरह से देखते हैं और मैं उन्हें दोष नहीं देता. उनका सामाजिक परिवेश, शिक्षा का स्तर इसके पीछे कारक हैं. मैं अपने आपको कहता हूं - यह भारतीय सेना को पेश करने का आदर्श तरीका है - मैं एक मुस्लिम के रूप में पैदा हुआ था, एक ईसाई के रूप में शिक्षित - मैं शेरवुड (नैनीताल में एक बोर्डिंग स्कूल) से हूं, मैं एक हिंदू रेजिमेंट से संबंधित हूं और सभी अनुष्ठानों का पालन किया है और मेरे सबसे अच्छे दोस्त सरदार (सिख) हैं. मैं सभी धर्मों के मूल्यों का आदर करता हूं. हालांकि, सभी के लिए ऐसा करना आसान नहीं है और इतनी आसानी से आत्मसात करना. मैं उन्हें दोष नहीं देता, क्योंकि उन्हें बंद माहौल में बड़ा किया जाता है. हालांकि, वे सेना में आने के बाद (अधिकारियों के रूप में) पाते हैं कि जैसा उन्होंने सोचा था, यहां उससे अलग माहौल है. फिर हम उन्हें प्रशिक्षित करते हैं. उन्हें बताया जाता है कि आपका जवान आपका दोस्त है, वह आड़े वक्त पर और लड़ाई के दौरान आपके साथ होता है. उन्हें यह बताया गया है कि यह भारतीय सेना का लोकाचार है और जवानों की आस्था का आदर करना उनके लिए महत्वपूर्ण है और यह भी, कि इसका मतलब यह नहीं है कि आप अपना (धर्म) नहीं मानते हैं.
एक मुस्लिम रेजिमेंट का हिंदू अधिकारी?
ऐसा नहीं है कि मैं हिंदू धर्म का आदर करने वाला अधिकारी था. दूसरा पक्ष भी है, सेना में ग्रेनेडियर्स और राजपूताना राइफल्स शुद्ध मुस्लिम कंपनियां हैं और उनका अधिकारी हिंदू, ईसाई या सिख होगा. इनमें सभी मुस्लिम सैनिक हैं. इसका मतलब है कि 130मुस्लिम जवान हैं, जिनका निरपवाद रूप से एक कमांडर होगा, जो हिंदू, सिख, ईसाई या कोई भी होगा. मैंने एक हिंदू कमांडर को देखा है, जो अपने सभी सैनिकों के साथ पांच बार नमाज अदा करता था, 30रोजा रखता था. ऐसा नहीं है कि मैं हिंदू सैनिकों के बीच एकमात्र मुस्लिम था. हिंदू भी वैसा ही कर रहे हैं. हमें अपनी परंपराओं पर गर्व है और हम बाकी लोगों को भी यह बताना चाहते हैं. उन्हें भारतीय सेना की विविधता को देखना होगा.
आपको जम्मू और कश्मीर लाइट इन्फैंट्री की पासिंग आउट परेड को देखना चाहिए. यह दृश्य देखना बड़ा रोमांचकारी है, मौलवी, पंडित, ग्रन्थी और बौद्ध पुजारी अपने-अपने धर्मों की धार्मिक पुस्तकें लिए जवानों के सामने से गुजरते हैं और जवान जिसे छूकर जीवन भर अपने देश की रक्षा करने के लिए कसम खाते हैं. यह दर्शाता है कि हम धर्म का बहुत सम्मान करते हैं.
.webp)
लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) सैयद अता हसनैन
इसका मतलब यह है कि मुसलमानों को सेना में शामिल होने के लिए कोई गलतफहमी नहीं होनी चाहिए. यहां तक कि जो लोग गलत धारणाओं के साथ आते हैं और फिर भी सेना में शामिल हो जाते हैं, तो उन्हें बदलाव के लिए प्रशिक्षण से गुजरना होगा. धर्म और कर्तव्य बहुत अलग चीजें हैं. क्या मेरी यह बात ठीक है?
बिल्कुल सही. मुझे एक छोटी सी बात स्पष्ट करने दो. लोगों के मन में कभी-कभी संदेह होता है कि जब वे सेना में शामिल होंगे, तो उनकी आहार संबंधी आदतों को संज्ञान में नहीं लिया जाएगा. उन्हें झटके या हलाल का मांस मिलेगा या नहीं, हो सकता है कि उन्हें सूअर का मांस खाना पड़े- ऐसी सभी चिंताएं होंगी. मैं उन्हें और विशेष रूप से भारत के युवाओं को आश्वस्त करना चाहता हूं कि भारतीय सेना जितनी, धर्म के प्रति संवेदनशील कोई अन्य संस्था नहीं है. यह इस तरह है, समझो कि एक कंपनी की स्वीकृत ताकत 120 जवान हैं, तो सैनिकों के धर्म के आधार पर एक मौलवी, एक ग्रंथी या पुजारी की मंजूरी भी होगी. सैनिकों की आहार संबंधी आदतों के अनुसार उन्हें भोजन वितरित किया जाता है. कुछ परिस्थितियों में माना जाता है कि अपेक्षित भोजन की आपूर्ति करना संभव नहीं है, तब इसकी वैकल्पिक भोजन के माध्यम से स्वीकृत कैलोरी मान के साथ भरपाई की जाती है. जैसे उन्हें पनीर या मक्खन मिलेगा.