रोजगार परिदृश्यः एआइ के जमाने में 2026 में नौकरी किसे मिलेगी और क्यों?

Story by  मलिक असगर हाशमी | Published by  [email protected] | Date 02-01-2026
Employment landscape: In the age of AI, who will get jobs in 2026 and why?
Employment landscape: In the age of AI, who will get jobs in 2026 and why?

 

tमंजीत ठाकुर

भारत आज काम और रोज़गार की परिभाषा को नए सिरे से गढ़ रहा है. जिस देश में दशकों तक यह मान्यता रही कि अच्छी डिग्री यानी अच्छी नौकरी, वहाँ अब यह समीकरण धीरे-धीरे टूट रहा है. उसकी जगह एक नया पैमाना उभर रहा है कि आप क्या कर सकते हैं, कितनी जल्दी सीख सकते हैं और बदलती तकनीक के साथ खुद को ढाल सकते हैं.

नियोक्ता अब यह नहीं पूछ रहे कि आपने कहाँ से पढ़ाई की या कितने साल का अनुभव है, बल्कि यह देख रहे हैं कि आप समस्या हल कर सकते हैं या नहीं.काम के इस नए युग में, योग्यता का मतलब डिग्री नहीं, बल्कि प्रमाणित क्षमता बनती जा रही है.

काम का बदलता स्वभाव

इस बदलाव के पीछे सिर्फ एक तकनीक नहीं, बल्कि कई समानांतर बदलाव हैं. जिनमें आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस का तेज विस्तार, भारत में ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स (जीसीसी) का उभार, जो अब केवल बैक-ऑफ़िस नहीं, बल्कि प्रोडक्ट और रिसर्च कर रहे हैं, कड़े होते नियामक कायदे-कानून और सततता (सस्टेनेबिलिटी) की बढ़ती मांग शामिल है.इन सबका असर यह हुआ है कि काम की प्रकृति ही बदल गई है. आज का काम सिर्फ टूल चलाने का नहीं, बल्कि निर्णय लेने, जिम्मेदारी निभाने और व्यावसायिक समझ से जुड़ा है.

डिग्री नहीं, कौशल क्यों ज़रूरी हो गए?

पिछले कुछ वर्षों में कंपनियों ने महसूस किया कि सिर्फ अकादमिक ज्ञान से काम नहीं चलता. उन्हें ऐसे लोग चाहिए जो नई तकनीक सीख सकें, बदलते माहौल में फौरन निर्णय ले सकें और मशीन और इंसान के बीच संतुलन बना सकें. यही वजह है कि भर्ती का फ़ोकस अब एप्लाइड स्किल्स, एडैप्टेबिलिटी और डिजिटल फ़्लुएंसी पर है.

2026 में काम आएँगी ये पाँच स्किल क्लस्टर

1. एआइ फ्लुएंसी और एजेंटिक इंटेलिजेंस

एआइ अब सिर्फ रिसर्च का विषय नहीं रहा. यह ऑफिस का रोज़मर्रा का औज़ार बन चुका है. डेटा एनालिसिस से लेकर रिपोर्ट ड्राफ्टिंग तक हर कोई एआइ की इस्तेमाल करने लगा है. अब फर्क वहाँ पड़ता है जहाँ इंसान सिर्फ एआइ इस्तेमाल नहीं करता, बल्कि एआइ सिस्टम को डिज़ाइन, मॉनिटर और नियंत्रित करता है.

एंट्री-लेवल प्रोफेशनल्स को एआइ लिटरेसी, प्रॉम्प्टिंग और आउटपुट की जांच आनी चाहिए. मिड-लेवल प्रोफेशनल्स को मॉडल डिप्लॉयमेंट और एआइ वर्कफ़्लो डिज़ाइन करने होंगे. सीनियर लीडर्स को तय करना होगा कि कहाँ एआइ पर भरोसा किया जा सकता है और कहाँ इंसानी निगरानी ज़रूरी है. एआइ में असली बढ़त उसे मिलेगी जो मानव विवेक और मशीनी स्वायत्तता को साथ जोड़ पाएगा.

2. डेटा स्टूवर्डशिप और एनालिटिक्स ट्रांसलेशन

डेटा आज सिर्फ रिकॉर्ड नहीं, बल्कि रणनीतिक संपत्ति है. लेकिन कच्चा डेटा तब तक बेकार है, जब तक वह निर्णयों में न बदले. फ्रेशर्स के लिए डेटा क्लीनिंग और सरल विज़ुअलाइज़ेशन ज़रूरी होंगे. मिड-करियर प्रोफेशनल्स को एनालिटिक्स ट्रांसलेटर बनना होगा, जो बिज़नेस सवालों को डेटा मॉडल में बदल सकें, वहीं सीनियरों को डेटा गवर्नेंस, और डेटा वैल्यूएशन समझनी होगी 3. सस्टेनेबिलिटी और ग्रीन इंडस्ट्रियल स्किल्स भारत अब सिर्फ असेंबली लाइन वाला देश नहीं रहा. सेमीकंडक्टर्स, इलेक्ट्रिक व्हीकल्स और सोलर मैन्युफैक्चरिंग जैसे क्षेत्रों में देश डीप-टेक इंडस्ट्रियल बेस बना रहा है.

इसके साथ ही, पर्यावरण और ईएसजी (पर्यावरण, सामाजिक और प्रशासन) रिपोर्टिंग अनिवार्य होती जा रही है. इसके मद्देनजर एंट्री-लेवल वर्कर्स को ग्रीन टेक्निकल स्किल्स जैसे सोलर इंस्टॉलेशन, बैटरी हैंडलिंग आनी चाहिए. मिड-लेवल मैनेजर्स को ईएसजी डैशबोर्ड, सप्लायर स्कोरकार्ड और एनर्जी मॉनिटरिंग संभालनी होगी. वरिष्ठों को क्लाइमेट रिस्क को कॉर्पोरेट रणनीति में शामिल करना होगा अब सततता कोई अलग विभाग नहीं, बल्कि रोज़मर्रा के फैसलों का हिस्सा बन चुकी है.

4. साइबर सिक्योरिटी और डिजिटल रिस्क

डिजिटल इंडिया और क्लाउड इकोनॉमी ने काम तेज़ किया है, लेकिन जोखिम भी बढ़ाए हैं.  डीपफेक, सिंथेटिक पहचान और एआइ सिस्टम पर हमले इसके हाथ-पां की तरह आगे बढ़े हैं और खतरनाक होता जा रहा है. फ्रेशर्स को साइबर हाइजीन और सिक्योर कोडिंग आनी चाहिए. मिड-लेवल प्रोफेशनल्स को हाइब्रिड क्लाउड और एआइ पाइपलाइन सुरक्षित करनी होंगी.  सीनियर लीडर्स को साइबर क्राइसिस प्लेबुक और बिज़नेस कंटिन्युइटी प्लान बनाना होगा

5. एडैप्टिव लीडरशिप और क्रॉस-फंक्शनल एग्ज़ीक्यूशन

ऑटोमेशन ने इंसानी निर्णय और नेतृत्व का महत्व और बढ़ा दिया है. आज टीमें सिर्फ लोगों की नहीं, लोगों और इंटेलिजेंट सिस्टम्स की होती हैं.एंट्री-लेवल प्रोफेशनल्स को सेल्फ-मैनेजमेंट और सहयोग सीखना होगा. मिड-लेवल मैनेजर्स को कोचिंग, रिवर्स मेंटरिंग और हाइब्रिड टीम लीड करनी होगी. सीनियर एग्ज़ीक्यूटिव्स को नई वैल्यू स्ट्रीम्स के हिसाब से टीमें फिर से बनानी होंगी

अच्छा लीडर वही होगा जो अनुशासन और सहानुभूति को साथ लेकर चले.

इनके अलावा कुछ क्षमताएँ भी उभर रही हैं. मिसाल के तौर पर, सेमीकंडक्टर और बैटरी मैन्युफैक्चरिंग जैसी इंडस्ट्रियल स्किल्स, प्रॉम्प्ट इंजीनियरिंग, प्रोडक्ट मैनेजमेंट और ह्यूमन-सेंटर्ड एआइ डिज़ाइन, रेगुलेटरी और कमर्शियल समझ, तेज़ी से बदलते बाज़ार में माइक्रो-क्रेडेंशियल्स और प्रोजेक्ट पोर्टफोलियो नई पहचान बनते जा रहे हैं.

(लेखक आवाज द वायस के एवी संपादक हैं)