डॉ. अनिल कुमार निगम
दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) की हवा एक बार फिर सेहत के लिए गंभीर खतरा बन चुकी है। प्रदूषण का स्तर लगातार बढ़ रहा है। लोगों को सांस लेने में परेशानी हो रही है। आंखों में जलन, गले में खराश और सांस संबंधी तकलीफें आम होती जा रही हैं। सबसे अधिक चिंता बच्चों, बुजुर्गों और पहले से सांस की बीमारियों से जूझ रहे लोगों को लेकर है। ऐसे समय में दीपावली का त्योहार नजदीक आने के साथ ही पटाखों को लेकर बहस भी तेज हो गई है। सवाल केवल आतिशबाजी की अनुमति या प्रतिबंध का नहीं है। असली चिंता करोड़ों लोगों के स्वास्थ्य, पर्यावरण और प्रशासन की जवाबदेही को लेकर है।
इसी गंभीर परिस्थिति को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली-एनसीआर में दीपावली के अवसर पर 7 और 8 नवंबर 2026 को सीमित अवधि के लिए प्रमाणित ग्रीन पटाखे चलाने की अनुमति दी है। अदालत के आदेश के अनुसार, सुबह 6 से 7 बजे और रात 8 से 10 बजे तक ही आतिशबाजी की जा सकेगी। यह अस्थायी छूट 9 नवंबर से समाप्त हो जाएगी। इसके बाद पटाखों पर पहले से लागू पूर्ण प्रतिबंध फिर प्रभावी हो जाएगा।
अदालत ने यह भी साफ कर दिया है कि केवल सीएसआईआर-नीरी (CSIR-NEERI) से प्रमाणित और पेट्रोलियम एवं विस्फोटक सुरक्षा संगठन (PESO) से लाइसेंस प्राप्त निर्माताओं के स्वीकृत ग्रीन पटाखों का ही निर्माण और बिक्री की जा सकेगी।

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला एक संतुलित रास्ता निकालने की कोशिश है। एक तरफ दीपावली की सामाजिक, सांस्कृतिक और धार्मिक परंपराओं का सम्मान है, तो दूसरी तरफ प्रदूषण से होने वाले गंभीर स्वास्थ्य नुकसान को कम करने की जिम्मेदारी। अदालत ने त्योहार मनाने की सीमित छूट तो दी है, लेकिन इसके साथ कई शर्तें भी जोड़ दी हैं। हालांकि, इस फैसले की असली सफलता आदेश जारी होने से नहीं, बल्कि उसके प्रभावी क्रियान्वयन से तय होगी। यही वह बिंदु है जहां दिल्ली-एनसीआर के प्रशासन की सबसे बड़ी परीक्षा शुरू होती है।
ग्रीन पटाखों के नाम पर धोखाधड़ी रोकना बड़ी चुनौती
सुप्रीम कोर्ट ने पटाखों के निर्माण, बिक्री और इस्तेमाल को लेकर इस बार भी स्पष्ट दिशा-निर्देश दिए हैं। केवल उन्हीं निर्माताओं को उत्पादन की अनुमति होगी, जिनके पास सीएसआईआर-नीरी का वैध प्रमाणन और पीईएसओ का लाइसेंस है। एक साथ जोड़े गए पटाखों यानी लड़ियों के निर्माण और बिक्री पर रोक रहेगी। बेरियम युक्त तथा गैर-प्रमाणित पटाखों की बिक्री और इस्तेमाल भी प्रतिबंधित होंगे। इसके अलावा ऑनलाइन पटाखों की बिक्री की अनुमति नहीं दी गई है।
इन शर्तों का उद्देश्य साफ है। आतिशबाजी के नाम पर प्रदूषण फैलाने वाले पारंपरिक और प्रतिबंधित पटाखों की बिक्री को रोकना और केवल निर्धारित मानकों पर खरे उतरने वाले उत्पादों को ही सीमित समय के लिए बाजार में उपलब्ध कराना।
लेकिन सवाल यह है कि क्या प्रशासन इन नियमों का पालन सुनिश्चित कर पाएगा? क्या बाजार में बिकने वाले प्रत्येक पटाखे की वास्तविक पहचान की जा सकेगी? क्या ग्रीन पटाखों के नाम पर सामान्य पटाखे बेचने वाले कारोबारियों पर कार्रवाई होगी? केवल नियम बना देने से समस्या का समाधान नहीं होगा। इसके लिए मजबूत निगरानी तंत्र और अधिकारियों की जवाबदेही भी जरूरी है।
पहले से बाजार में पहुंच चुके पटाखों का क्या होगा?
इस पूरे मामले का सबसे महत्वपूर्ण और व्यावहारिक सवाल यह है कि जो पारंपरिक और अवैध पटाखे पहले ही दिल्ली-एनसीआर के बाजारों, दुकानों और गोदामों तक पहुंच चुके हैं, उनका क्या होगा? क्या प्रशासन के पास ऐसे पटाखों की पहचान करने, उन्हें जब्त करने और उनकी बिक्री रोकने की कोई प्रभावी व्यवस्था है?
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में दिल्ली-एनसीआर के बाहर से अवैध और पारंपरिक पटाखों की आपूर्ति रोकने के लिए आवश्यक कदम उठाने के निर्देश दिए हैं। अवैध पटाखे मिलने पर उन्हें तत्काल जब्त करने और संबंधित निर्माताओं तथा कारोबारियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई करने की बात भी कही गई है। पुलिस को वाहनों की जांच करने और पटाखों की अवैध आपूर्ति पर अंकुश लगाने की जिम्मेदारी सौंपी गई है।
हालांकि, जमीनी हकीकत इतनी सरल नहीं है। पटाखों का अवैध कारोबार केवल दुकानों तक सीमित नहीं रहता। छोटे-बड़े गोदामों, अस्थायी दुकानों, आवासीय परिसरों और अनधिकृत बाजारों के जरिए भी इनकी बिक्री होती है। कई बार प्रतिबंधित पटाखों को वैध उत्पादों के बीच छिपाकर बाजार में उतार दिया जाता है। ऐसे में केवल लाइसेंस प्राप्त दुकानों पर निगरानी करने से समस्या का समाधान नहीं हो सकता।
प्रशासन को उन पटाखों के भंडार की भी पहचान करनी होगी, जो प्रतिबंध लागू होने से पहले ही बाजार में पहुंच चुके हैं। गोदामों की नियमित जांच, संदिग्ध वाहनों की तलाशी और दिल्ली की सीमाओं पर सख्त निगरानी जरूरी है। इसके लिए दिल्ली पुलिस के साथ-साथ एनसीआर के संबंधित राज्यों और जिलों की पुलिस तथा प्रशासन के बीच बेहतर तालमेल भी होना चाहिए।
Delhi: On the Supreme Court allowing green firecrackers to be burst during Diwali, environmentalist Bhavreen Kandhari says, "Today is a day when we are actually moving towards very poor and severe air quality because the north-northwesterly winds are now becoming calm. The winds are slowing down, trapping all the particles close to us, which is obviously increasing the pollution levels. We are all feeling and seeing it. So, it is very unfortunate that something that happened last year, when the court order came just around Diwali..."
— IANS (@ians_india) November 2, 2026
क्यूआर कोड और प्रमाणन की वास्तविकता की जांच जरूरी
एक अन्य महत्वपूर्ण चुनौती ग्रीन पटाखों की प्रमाणिकता सुनिश्चित करना है। क्या प्रशासन के पास क्यूआर कोड की वास्तविकता जांचने के लिए पर्याप्त तकनीकी और मानवीय संसाधन उपलब्ध हैं? केवल किसी पटाखे के डिब्बे पर क्यूआर कोड छपा होना उसकी प्रामाणिकता की गारंटी नहीं हो सकता। उसकी जांच संबंधित आधिकारिक रिकॉर्ड से होनी चाहिए।
यह भी संभव है कि कुछ कारोबारी प्रमाणित ग्रीन पटाखों के डिब्बों में पारंपरिक या प्रतिबंधित पटाखे रखकर बेचने की कोशिश करें। ऐसे मामलों में केवल पैकेट देखकर कार्रवाई करना पर्याप्त नहीं होगा। उत्पादों के नमूनों की जांच, बैच के आधार पर निगरानी और प्रमाणन संबंधी दस्तावेजों का सत्यापन जरूरी है।
प्रशासन को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि ग्रीन पटाखों के नाम पर उपभोक्ताओं के साथ धोखाधड़ी न हो। यदि प्रमाणित उत्पादों की आड़ में प्रतिबंधित पटाखे बेचे जाते हैं तो इसके लिए जिम्मेदार कारोबारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई होनी चाहिए।
जवाबदेही तय हो, केवल आदेश दोहराने से काम नहीं चलेगा
इस पूरे विवाद का सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या दिल्ली-एनसीआर का प्रशासन सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का पूरी तरह पालन करा पाएगा? क्या पहले से बाजार में पहुंच चुके अवैध पटाखों को जब्त किया जा सकेगा? क्या दूसरे राज्यों से होने वाली अवैध आपूर्ति पर रोक लगेगी? क्या ग्रीन पटाखों के नाम पर होने वाली धोखाधड़ी को रोका जा सकेगा? और सबसे महत्वपूर्ण, निर्धारित समय सीमा समाप्त होने के बाद आतिशबाजी करने वालों के खिलाफ वास्तव में कार्रवाई होगी?
इन सवालों के जवाब प्रशासन के कामकाज से ही मिलेंगे।
सुप्रीम कोर्ट ने अपनी ओर से दिशा-निर्देश जारी कर दिए हैं। अब जिम्मेदारी सरकार और प्रशासन की है। अधिकारियों को यह समझना होगा कि इस मामले में उनकी भूमिका केवल पुलिस गश्त, छापेमारी और औपचारिक रिपोर्ट तैयार करने तक सीमित नहीं हो सकती। उन्हें वास्तविक परिणाम देने होंगे। यह भी जरूरी है कि कार्रवाई केवल छोटे दुकानदारों तक सीमित न रहे, बल्कि अवैध आपूर्ति के पीछे सक्रिय बड़े कारोबारियों और नेटवर्क की भी पहचान की जाए।

साथ ही नागरिकों की भागीदारी भी महत्वपूर्ण है। लोगों को यह समझना होगा कि त्योहार की खुशी दूसरों के स्वास्थ्य की कीमत पर नहीं मनाई जानी चाहिए। खासकर बच्चों और युवाओं को पटाखों के दुष्प्रभावों के बारे में जागरूक करना जरूरी है। सामाजिक संगठनों, आवासीय समितियों और स्थानीय निकायों को भी इस दिशा में अपनी भूमिका निभानी चाहिए।
दीपावली का मूल संदेश अंधकार पर प्रकाश की विजय है। यह खुशियों, उम्मीदों और सकारात्मकता का त्योहार है। लेकिन यदि हमारे उत्सव की चमक किसी दूसरे की सांसों पर भारी पड़ने लगे, तो अपनी उत्सव मनाने की शैली पर पुनर्विचार करना ही होगा।
दिल्ली-एनसीआर को इस समय केवल ग्रीन पटाखों की नहीं, बल्कि ग्रीन सोच, जिम्मेदार नागरिकता और जवाबदेह प्रशासन की भी जरूरत है। त्योहार मनाने की आजादी के साथ दूसरों के स्वास्थ्य और पर्यावरण की रक्षा करना भी हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है।
आखिरकार, दीपावली की असली रोशनी तभी सार्थक होगी, जब घरों में दीप जलें, चेहरों पर खुशियां हों, आसमान में उत्सव का उल्लास दिखाई दे और हर व्यक्ति को खुलकर सांस लेने के लिए स्वच्छ हवा भी मिले।
(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)