ओनिका माहेश्वरी/ नई दिल्ली
कश्मीर की वादियां अक्सर सुर्खियों में रहती हैं, लेकिन इन चर्चाओं के बीच कुछ ऐसी कहानियां भी जन्म लेती हैं जो समाज की दिशा और दशा दोनों बदल देती हैं। ऐसी ही एक प्रेरणादायक दास्तान मुन्तहा की है। एक साधारण लड़की के रूप में ताइक्वांडो की ट्रेनिंग शुरू करने वाली मुन्तहा आज कश्मीर की बेटियों, युवाओं और शांति की एक मजबूत आवाज बन चुकी हैं। उनका यह सफर केवल व्यक्तिगत सफलता का नहीं है, बल्कि उन तमाम सामाजिक और पारंपरिक बाधाओं को पार करने की कहानी है, जिनका सामना देश के कई हिस्सों में आज भी लड़कियां करती हैं।
बचपन में मुन्तहा को अपने आसपास हो रही घटनाओं की पूरी समझ नहीं थी। परिवार और समाज से जो सुनने को मिलता था, वह उसी के आधार पर आगे बढ़ रही थीं। लेकिन कम उम्र से ही उनके भीतर कुछ अलग करने की जि ल ल थी।
उनका यह सफर खेल से शुरू हुआ था। वह पांच बार राष्ट्रीय स्तर की स्वर्ण पदक विजेता रह चुकी हैं और उन्होंने ताइक्वांडो तथा अन्य मार्शल आर्ट्स में कड़ा प्रशिक्षण लिया है। खेल ने उनके जीवन को एक नई दिशा तो दी, लेकिन जैसे-जैसे वह बड़ी हुईं, समाज के ताने-बाने से जुड़े सवाल भी खड़े होने लगे।

दसवीं और बारहवीं कक्षा के दौरान उन्हें बार-बार यह सुनना पड़ा कि खेल केवल लड़कों के लिए होते हैं। परिवार और रिश्तेदारों की तरफ से सलाह दी गई कि वे सिर्फ पढ़ाई पर ध्यान दें क्योंकि खेलों में कोई भविष्य नहीं है। एक तरफ वह खेल के मैदान पर मेडल जीत रही थीं, तो दूसरी तरफ उन्हें यह साबित करना पड़ रहा था कि उनका यह शौक गलत नहीं है।
लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। अपने घर-परिवार को धीरे-धीरे समझाकर उन्होंने खेल के प्रति अपना समर्पण जारी रखा। इसी संघर्ष ने उन्हें यह अहसास कराया कि जब एक लड़की को आगे बढ़ने के लिए इतनी जद्दोजहद करनी पड़ती है, तो दूरदराज के इलाकों की उन आम लड़कियों का क्या हाल होगा जिन्हें सही मार्गदर्शन तक नसीब नहीं होता।
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यही वह मोड़ था जहां से मुन्तहा के जीवन का असली सामाजिक अध्याय शुरू हुआ। उन्होंने अपनी अकादमी के साथ मिलकर कश्मीर के दूरदराज के इलाकों में लड़कियों के लिए विशेष प्रशिक्षण शिविर लगाने शुरू किए। केरन, उरी, पहलगाम और अन्य ग्रामीण क्षेत्रों का दौरा कर उन्होंने लगभग 250 से अधिक लड़कियों को ताइक्वांडो की ट्रेनिंग दी।
इन शिविरों का मुख्य उद्देश्य केवल खेल सिखाना नहीं था, बल्कि आत्मरक्षा को एक ऐसा हथियार बनाना था जिसे रूढ़िवादी परिवार आसानी से स्वीकार कर सकें। जब परिवार इस बात के लिए राजी हो गए कि बेटियां अपनी सुरक्षा के लिए सीख रही हैं, तो धीरे-धीरे उनके भीतर आत्मविश्वास और अपने फैसले खुद लेने की क्षमता भी विकसित होने लगी।
ग्रामीण इलाकों में काम करते हुए मुन्तहा ने यह महसूस किया कि कई बार सबसे बड़ी बाधा अवसरों की कमी नहीं, बल्कि समाज का यह डर होता है कि लोग क्या कहेंगे। इसी अनुभव ने उन्हें खेल के मैदान से निकालकर सोशल एक्टिविज़्म की दुनिया में ला खड़ा किया।

उन्होंने महिलाओं के अधिकारों और उनकी स्वतंत्रताओं के लिए 'खातून' नाम से एक खास पहल की शुरुआत की। श्रीनगर में उन्होंने उन महिलाओं को एक मंच पर इकट्ठा किया जिन्होंने विपरीत परिस्थितियों में भी अपने दम पर मुकाम हासिल किया था। उनका सीधा संदेश यही था कि अगर एक महिला तमाम मुश्किलों को चीरकर आगे बढ़ सकती है, तो बाकी बेटियां भी अपने सपनों को पूरा करने की ताकत रखती हैं।
हालांकि मुन्तहा का दायरा केवल लैंगिक समानता तक सीमित नहीं रहा। कश्मीर के संवेदनशील सामाजिक और राजनीतिक माहौल ने उनके काम को एक व्यापक आयाम दिया। वह आतंकवाद, युवाओं के भविष्य, रोजगार और नीतिगत मुद्दों को सीधे तौर पर क्षेत्र के विकास से जोड़कर देखती हैं।
उनका साफ मानना है कि आतंकवाद का असर केवल सुरक्षा व्यवस्था तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह परिवारों, बच्चों और खास तौर पर महिलाओं के जीवन को गहरे तक प्रभावित करता है। यही वजह है कि उन्होंने अपने अभियानों में पुरुषों और युवाओं को भी शामिल करना शुरू किया।
आतंकवाद के खिलाफ उनका रुख बेहद स्पष्ट और व्यावहारिक है। उन्होंने कई ऐसे युवाओं से लंबी बातचीत की जो अतीत में हिंसा की राह पर भटक गए थे और बाद में मुख्यधारा में लौटने की कोशिश कर रहे थे। उन्होंने एक ऐसे युवक का उदाहरण दिया जिसका पूरा भविष्य एक गलत फैसले के कारण दांव पर लग गया था।

हिंसा के दलदल में फंसने के बाद उसे जेल जाना पड़ा और उसकी नीट की तैयारी से लेकर तमाम सुनहरे अवसर हाथ से निकल गए। ऐसी ही घटनाएं मुन्तहा को यह सोचने पर मजबूर करती हैं कि युवाओं को बंदूक उठाने से पहले सही रास्ता और उम्मीद दिखाना कितना जरूरी है।
वह मानती हैं कि दशकों पुरानी मानसिक और सामाजिक धारणाओं को रातों-रात बदलना मुमकिन नहीं है। शांति कोई ऐसी मंजिल नहीं है जिसे एक बार हासिल करके छोड़ दिया जाए, बल्कि यह एक लगातार चलने वाली प्रक्रिया है। इसकी शुरुआत इंसान के अपने भीतर से होती है और फिर परिवार व समाज तक फैलती है। कश्मीर की महिलाएं मानसिक रूप से पहले से ही बहुत मजबूत हैं। जरूरत सिर्फ इस बात की है कि उनके दबे हुए आत्मविश्वास को एक सही मंच और दिशा दी जाए।
सार्वजनिक जीवन में आने के बाद मुन्तहा को भी आसान रास्ता नहीं मिला। जब कोई महिला समाज की लीक से हटकर आगे बढ़ती है, तो उसे अक्सर आलोचना, ट्रोलिंग और चरित्र पर उठने वाले सवालों का सामना करना पड़ता है। लेकिन उनका मानना है कि ऐसे दबावों से डरकर घर बैठ जाना किसी समस्या का हल नहीं है।
उनके शब्दों में कहें तो यदि कोई महिला डरकर रुक जाती है, तो वह उसके लिए चुनौती बन जाती है, और अगर वह लगातार आगे बढ़ती रहती है, तो यह उन लोगों के लिए चुनौती बन जाती है जो उसे रोकना चाहते हैं। सोशल मीडिया ने आज उन्हें अपनी बात देश के दूसरे कोनों तक पहुंचाने का एक मजबूत जरिया दिया है।

खातून इनिशिएटिव के बैनर तले वह लगातार महिला सशक्तिकरण, स्किल डेवलपमेंट, मासिक धर्म स्वास्थ्य और नशा मुक्ति जैसे गंभीर विषयों पर काम कर रही हैं। उनका यह मिशन सिर्फ भाषणों तक सीमित नहीं है, बल्कि जमीनी स्तर पर बदलाव लाने की एक ईमानदार कोशिश है।
मुन्तहा का यह सफर हमें यह सिखाता है कि बदलाव किसी एक दिन में नहीं आता, बल्कि इसके लिए लगातार प्रयास करने पड़ते हैं। कश्मीर की बेटियां अब रुकने वाली नहीं हैं, और मुन्तहा की यह आवाज इस बात का सबसे बड़ा सबूत है।