कूचबिहार रास उत्सव की अनूठी परंपरा निभा रहे कारीगर अमिनुर हुसैन

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 02-11-2026
Muslim artisan Aminur Hussain is upholding the unique tradition of the Cooch Behar Raas Utsav.
Muslim artisan Aminur Hussain is upholding the unique tradition of the Cooch Behar Raas Utsav.

 

जावेद अख्तर/ कोलकाता

पश्चिम बंगाल के कूचबिहार में रास उत्सव केवल धार्मिक आस्था का पर्व नहीं। यह सदियों से चली आ रही सांस्कृतिक विरासत, आपसी भाईचारे और हिंदू मुस्लिम सद्भाव की भी एक अनूठी मिसाल है। भगवान मदनमोहन को समर्पित इस ऐतिहासिक उत्सव में एक ऐसी परंपरा आज भी जीवित है, जो लोगों का ध्यान खींचती है। यहां रास चक्र बनाने की जिम्मेदारी एक मुस्लिम परिवार निभाता आ रहा है। परिवार की कई पीढ़ियों ने इस काम को अपनी विरासत की तरह संभाला है। अब अमिनुर हुसैन अपने पूर्वजों के हुनर को आगे बढ़ा रहे हैं।

कूचबिहार में 24नवंबर 2026से शुरू होने वाले रास उत्सव की तैयारियां तेज हो गई हैं। लगभग दो सप्ताह तक चलने वाले इस आयोजन के लिए अमिनुर हुसैन ने पारंपरिक रास चक्र बनाने का काम शुरू कर दिया है। इस चक्र का निर्माण लक्ष्मी पूजा के दिन शुरू होता है और इसे पूरा करने में करीब एक महीने का समय लगता है।

बांस, कागज और जूट की रस्सियों से तैयार होने वाला यह चक्र रास मेले की सबसे खास पहचान है। रास पूर्णिमा के अवसर पर श्रद्धालु मदनमोहन मंदिर में इसे घुमाते हैं। स्थानीय मान्यता के अनुसार, इस धार्मिक परंपरा में भाग लेने से आध्यात्मिक पुण्य मिलता है।

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अमिनुर हुसैन कूचबिहार शहर के बाहरी इलाके में हरिन चौरा के पास रहते हैं। तोरसा नदी के तटबंध के नजदीक स्थित उनके साधारण घर में इन दिनों रास चक्र बनाने का काम चल रहा है। घर की ताजा लीपी गई मिट्टी की जमीन पर बांस और कागज के साथ दूसरी जरूरी सामग्री रखी है। इसी जगह पर वह अपनी टीम और परिवार के सदस्यों की मदद से चक्र को आकार दे रहे हैं। यह काम केवल शिल्पकारी नहीं है। इसमें धार्मिक परंपरा की समझ, बारीक कारीगरी और पीढ़ियों से सीखा गया अनुभव भी शामिल है।

अमिनुर बताते हैं कि इस परंपरा को अपनाने के लिए उनके परिवार पर कभी कोई दबाव नहीं रहा। उन्होंने अपने पिता को काम करते देखा और धीरे धीरे इसे सीख लिया। उनके पिता अल्ताफ मियां रास चक्र बनाते समय शाकाहारी भोजन करते थे।

अमिनुर भी उसी परंपरा का पालन करते हैं। उनका कहना है कि परिवार में किसी ने उन्हें अलग से यह निर्देश नहीं दिया कि इस अवधि में क्या खाना चाहिए। उन्होंने अपने पूर्वजों की जीवनशैली देखकर इसे अपनाया। उनके लिए यह अपने परिवार की विरासत का सम्मान करने का स्वाभाविक तरीका है।

अमिनुर के पिता अल्ताफ मियां का 2023में निधन हो गया था। उनसे पहले उनके दादा अजीज मियां और परदादा पान मामुद मियां रास चक्र बनाने का काम करते थे। परिवार के अनुसार, महाराजा नृपेंद्र नारायण के शासनकाल में पान मामुद मियां को यह जिम्मेदारी सौंपी गई थी।

इस तरह यह परंपरा कई पीढ़ियों से परिवार के साथ जुड़ी हुई है। पिता के निधन के बाद अमिनुर ने इस जिम्मेदारी को संभाला। उनके लिए यह रास चक्र बनाने का चौथा वर्ष है। वह इसे केवल आजीविका का साधन नहीं, बल्कि अपने पूर्वजों की पहचान और कूचबिहार की साझा संस्कृति का हिस्सा मानते हैं।

रास चक्र का निर्माण मेहनत और धैर्य का काम है। इसमें इस्तेमाल होने वाली सामग्री को सावधानी से जोड़ा जाता है। इसकी बनावट और सजावट में पारंपरिक शैली का ध्यान रखा जाता है। इस चक्र का धार्मिक महत्व भगवान मदनमोहन की पूजा से जुड़ा है।

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मदनमोहन को कूचबिहार के पूर्ववर्ती राजपरिवार का आराध्य देवता माना जाता है। रास उत्सव के दौरान चक्र को घुमाकर मेले की औपचारिक शुरुआत की जाती है। पहले यह जिम्मेदारी महाराजा निभाते थे। वर्तमान में जिला मजिस्ट्रेट पूजा और अन्य धार्मिक अनुष्ठानों के बाद इसे घुमाते हैं। इसके साथ ही उत्सव का मुख्य आयोजन शुरू हो जाता है।

अमिनुर हुसैन को इस वर्ष भी कूचबिहार देवोत्तर ट्रस्ट बोर्ड ने रास चक्र बनाने का काम शुरू करने के लिए कहा था। हालांकि, उन्हें इस बार मिलने वाली राशि की जानकारी अभी नहीं दी गई है। अमिनुर के अनुसार, पिछले साल उन्हें इस काम के लिए 18,000 रुपये मिले थे। भुगतान की राशि स्पष्ट नहीं होने के बावजूद उन्होंने तय समय पर काम शुरू कर दिया। लक्ष्मी पूजा के दिन काम शुरू करना उनके परिवार की पुरानी परंपरा है। इसलिए वह इसे हर वर्ष उसी तरीके से निभाते हैं।

स्थानीय लोगों के लिए अमिनुर और उनके परिवार की यह भूमिका धार्मिक सीमाओं से आगे बढ़कर आपसी सम्मान का संदेश देती है। कूचबिहार में रास उत्सव को हिंदू, मुस्लिम, सिख और बौद्ध समुदायों के लोग मिलकर मनाते हैं। यहां त्योहार की पहचान केवल पूजा और मेले तक सीमित नहीं है।

यह साझा सांस्कृतिक जीवन का हिस्सा है। रास चक्र बनाने वाले मुस्लिम परिवार की भागीदारी इस बात का उदाहरण है कि स्थानीय परंपराएं कई बार समुदायों को एक साथ जोड़ती हैं। अमिनुर भी मानते हैं कि कूचबिहार में सांप्रदायिक सद्भाव की पुरानी परंपरा रही है और रास उत्सव इसकी प्रमुख मिसाल है।

कूचबिहार रॉयल फैमिली सक्सेसर्स वेलफेयर ट्रस्ट के प्रवक्ता और पूर्ववर्ती राजपरिवार के सदस्य कुमार मृदुल नारायण भी इस विरासत को महत्वपूर्ण मानते हैं। उनके अनुसार, अल्ताफ मियां के बाद उनके बेटे अमिनुर और परिवार के दूसरे सदस्य रास चक्र बनाने की परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं।

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यह परंपरा दिखाती है कि सांस्कृतिक विरासत को सुरक्षित रखने में किसी एक धर्म या समुदाय की भूमिका तक सीमित नहीं होती। जब कोई परिवार पीढ़ियों तक किसी परंपरा को निभाता है, तो वह स्थानीय इतिहास का भी हिस्सा बन जाता है।

कूचबिहार के रास उत्सव का इतिहास भी काफी पुराना है। जिला प्रशासन के रिकॉर्ड के अनुसार, रास मेले की शुरुआत 1812में दिनहाटा के भेटागुड़ी में महाराजा हरेंद्र नारायण के शासनकाल में हुई थी। बाद में इसे कूचबिहार शहर में स्थानांतरित कर दिया गया।

मदनमोहन मंदिर का निर्माण महाराजा नृपेंद्र नारायण के शासनकाल में 1885से 1889के बीच हुआ था। वर्ष 1890में रास उत्सव को मंदिर के पास बैरागी दिघी इलाके में आयोजित किए जाने का उल्लेख भी मिलता है। इस तरह रास मेला समय के साथ कूचबिहार की सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान का अहम हिस्सा बन गया।

इस परंपरा की जड़ें इससे भी पुराने इतिहास से जुड़ी बताई जाती हैं। कोच राजवंश के शासक महाराजा नर नारायण ने 16वीं शताब्दी में भगवान मदनमोहन की पूजा शुरू की थी। बाद के शासकों के समय रास उत्सव का विस्तार हुआ।

राजपरिवार के सदस्यों के अनुसार, धार्मिक आयोजनों में सभी समुदायों की भागीदारी को महत्व दिया जाता था। कुमार मृदुल नारायण के मुताबिक, रास उत्सव कूचबिहार की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का प्रतिनिधित्व करता है। आज भी रास चक्र घुमाने की परंपरा उसी ऐतिहासिक सिलसिले को आगे बढ़ाती है।

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रास मेला अपनी धार्मिक पहचान के साथ स्थानीय अर्थव्यवस्था के लिए भी महत्वपूर्ण है। उत्सव के दौरान मदनमोहन मंदिर और एमजेएन स्टेडियम के आसपास के मैदानों में बड़ी संख्या में लोग जुटते हैं। पश्चिम बंगाल के विभिन्न जिलों के अलावा पड़ोसी क्षेत्रों से भी श्रद्धालु,पर्यटक और व्यापारी यहां पहुंचते हैI

मेले में हस्तशिल्प, घरेलू उपयोग की वस्तुएं, सर्दियों के कपड़े, फर्नीचर, धार्मिक पुस्तकें और खाने पीने के सामान की दुकानें लगती हैं। बांस, लकड़ी, पत्थर और धातु से बनी वस्तुओं की भी मांग रहती है। स्थानीय लेखक रंजीत देब के अनुसार, यह मेला क्षेत्रीय कला और हस्तशिल्प को बाजार उपलब्ध कराने का महत्वपूर्ण अवसर है।

रास मेले में मनोरंजन और सांस्कृतिक कार्यक्रमों की भी खास जगह है। यहां लोक संगीत, नृत्य, नाटक और जादू के शो आयोजित किए जाते हैं। बच्चों और परिवारों के लिए झूले लगाए जाते हैं। खाने पीने के स्टॉल के अलावा स्वास्थ्य जांच शिविर भी आयोजित किए जाते हैं।

मेले की आधिकारिक अवधि लगभग 15दिन बताई जाती है, हालांकि कई बार इसका आयोजन इससे अधिक समय तक चलता है। विभिन्न क्षेत्रों से आने वाले व्यापारी इस मेले को अपने उत्पादों की बिक्री के लिए उपयोगी अवसर मानते हैं। रास उत्सव इस तरह धार्मिक आस्था के साथ सामाजिक मेलजोल और व्यापार को भी बढ़ावा देता है।

कूचबिहार के रास चक्र की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसकी परंपरा में धार्मिक प्रतीकों और स्थानीय कारीगरी का मेल दिखाई देता है। उपलब्ध विवरणों में इस चक्र पर देवी देवताओं की तस्वीरों और अलग अलग सजावटी आकृतियों का उल्लेख मिलता है।

इसे बनाने में बांस और कागज जैसी हल्की सामग्री का इस्तेमाल किया जाता है। इसके निर्माण में परिवार के दूसरे सदस्य भी मदद करते हैं। हालांकि, चक्र के आकार और सजावट से जुड़े विवरण अलग अलग वर्षों के हो सकते हैं, लेकिन इसकी पारंपरिक भूमिका स्पष्ट है। रास मेले में यह चक्र धार्मिक अनुष्ठान और उत्सव की पहचान का केंद्र बना रहता है।

अमिनुर हुसैन की कहानी इस विरासत को एक मानवीय चेहरा देती है। उनके परिवार ने लंबे समय तक इस काम को संभाला है। अब वह इसे अगली पीढ़ी तक पहुंचाने की जिम्मेदारी निभा रहे हैं। उनके लिए यह परंपरा किसी औपचारिक दावे से अधिक रोजमर्रा के जीवन से जुड़ी है।

हर साल लक्ष्मी पूजा के दिन काम शुरू करना, निर्माण के दौरान शाकाहारी भोजन करना और निर्धारित समय तक चक्र तैयार करना उनकी पारिवारिक परंपरा का हिस्सा है। पिता की मृत्यु के बाद इस जिम्मेदारी को संभालना उनके लिए भावनात्मक रूप से भी महत्वपूर्ण है।

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आज जब देश के अलग अलग हिस्सों में धार्मिक पहचान और सामाजिक संबंधों पर बहस होती रहती है, तब कूचबिहार का रास उत्सव एक ऐसी स्थानीय परंपरा की याद दिलाता है, जिसमें साझी विरासत को व्यवहार में निभाया जाता है।

यहां एक मुस्लिम कारीगर हिंदू धार्मिक उत्सव के लिए रास चक्र तैयार करता है और स्थानीय समाज इसे अपनी सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा मानता है। इस परंपरा का महत्व केवल इसकी उम्र में नहीं, बल्कि उस भरोसे में है जो एक परिवार और पूरे समाज के बीच लंबे समय से बना हुआ है।

24 नवंबर 2026 से शुरू होने वाले रास उत्सव में एक बार फिर श्रद्धालु मदनमोहन मंदिर में जुटेंगे। पूजा के बाद रास चक्र घुमाया जाएगा और मेले की रौनक बढ़ेगी। इस आयोजन के बीच अमिनुर हुसैन की मेहनत शायद हर आगंतुक के लिए अलग से चर्चा का विषय न बने, लेकिन उनके हाथों से तैयार होने वाला चक्र कूचबिहार के इतिहास की एक जीवित कड़ी है। यह बताता है कि परंपराएं केवल पुस्तकों और स्मारकों में सुरक्षित नहीं रहतीं। उन्हें उन लोगों के हाथ जीवित रखते हैं, जो पीढ़ी दर पीढ़ी अपने काम, विश्वास और अनुभव से उन्हें आगे बढ़ाते हैं।