देस-परदेस : इसराइली चुनाव-परिणामों के फौरी निष्कर्ष

Story by  प्रमोद जोशी | Published by  [email protected] | Date 03-11-2026
Domestic and International: Immediate Takeaways from the Israeli Election Results
Domestic and International: Immediate Takeaways from the Israeli Election Results

 

प्रमोद जोशी

पिछले हफ्ते इसराइल के चुनाव-परिणाम आए हैं और इस हफ्ते अमेरिका के मध्यावधि चुनावों के परिणाम आएँगे. इन दोनों परिणामों का दुनिया में काफी उत्सुकता से इंतज़ार था, क्योंकि इसका वैश्विक-घटनाक्रम पर असर पड़ेगा. अमेरिका में क्या होगा, अभी पता नहीं. इसराइल के परिणामों ने साफ तस्वीर पेश नहीं की है. फिलहाल लग रहा है कि उसकी नीतियों में कोई बड़ा बदलाव आने वाला नहीं है. 

अमेरिका के साथ रिश्ते, जो पिछले एक साल से खराब चल रहे हैं, वे भी जारी रहेंगे. इसकी वजह है, नेतन्याहू सरकार के जारी रहने की संभावना. वह दीर्घकालीन होगी या केवल केयर टेकर होगी, इसे भी देखना होगा. बिन्यामिन नेतन्याहू और उनके मुख्य चैलेंजर गादी आइज़ेनकोट की लीडरशिप वाले किसी भी ग्रुप को 120 सदस्यों वाली संसद (नेसेट) में बहुमत हासिल करने के लिए आवश्यक न्यूनतम 61 सीटें नहीं मिली हैं. 

नेतन्याहू जीते या हारे?

नेतन्याहू के लिए, यह हार भी है और जीत भी. उनके पिछले गठबंधन के पास अपने पीक पर 68 सीटें थीं, इसलिए यह सच में धक्का है, फिर भी वे प्रधानमंत्री बने रहने की स्थिति में हैं. राष्ट्रपति आइज़ैक हर्ज़ोग ने कहा है कि वे अगले हफ़्ते तक सरकार बनाने के बारे में पार्टी नेताओं से सलाह-मशविरा शुरू करेंगे. इसराइली व्यवस्था में, राष्ट्रपति जिस नेता को सरकार चलाने लायक समझता है, उससे कहेगा कि वह सरकार चलाने की कोशिश करे. 

नेतन्याहू, फिलहाल विपक्षी नेता गादी आइज़ेनकोट से आगे हैं. लेकिन वे 53 से 61 सीटों पर कैसे पहुँचेंगे? आठ अतिरिक्त सीटें कहाँ से आएँगी? क्या वे कुछ विपक्षी नेताओं को तोड़ सकते हैं? क्या वे आइज़ेनकोट के साथ मिलकर एक राष्ट्रीय गठबंधन बना सकते हैं, जिसमें कुछ साल बाद उनके हटने की व्यवस्था हो?

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तीन विकल्प

फिलहाल तीन संभावित विकल्प नज़र आते हैं. पहला, नेतन्याहू और आइज़ेनकोट की भागीदारी वाली राष्ट्रीय एकता सरकार बने.दूसरा, नेतन्याहू के नेतृत्व में आइज़ेनकोट के गठबंधन से अलग हुए नेता शामिल हों.तीसरा, आइज़ेनकोट के नेतृत्व वाली सरकार, जिसे अरब पार्टियों का समर्थन मिले. पर आइज़ेनकोट और उनके गठबंधन के एक सदस्य को छोड़कर, सभी नेता अरब पार्टियों के साथ सरकार बनाने से इनकार कर चुके हैं.

नेतन्याहू-सरकार को भ्रष्ट, नाकाबिल और इसराइल की वैश्विक-छवि को नुकसान पहुँचाने वाला बताने के बावजूद, इसराइल का ज़्यादातर यहूदी-विपक्ष उन्हें सत्ता से हटाने के लिए अरब पार्टियों का समर्थन लेने में हिचकिचा रहा है.

चुनाव की रात, पूर्व प्रधानमंत्री नफ्ताली बेनेट और येर लैपिड ने सरकार में फिलिस्तीनी पार्टियों के साथ बैठने से इनकार कर दिया. जबकि 2021-22 के छोटे से दौर में उनकी सरकार में अरब पार्टियाँ भी शामिल थीं. 

कौन हैं अरब वोटर? 

जब पहली बार ये अरब पार्टियाँ सरकार में शामिल हुईं थीं, तब उसे लेकर कई तरह की सकारात्मक बातें कही गई थीं. लेकिन उस सरकार में रा’अम के शामिल होने से कई दक्षिणपंथी यहूदी वोटर नाराज़ हो गए थे. लगभग एक साल बाद जब वह सरकार गिर गई, तो उन्होंने नेतन्याहू का साथ दिया, जिन्होंने आगे चलकर इसराइल के इतिहास में सबसे हार्ड-लाइन सरकार बनाई.

ज़्यादातर अरब नागरिक उन फलस्तीनियों के वंशज हैं, जिन्होंने 1948 के अरब-इसराइल युद्ध के दौरान यहीं रहने का फैसला किया. वे ज़्यादातर यहूदी इलाकों से अलग रहते हैं.  इसराइल के यहूदी देश होने के कारण दशकों से वे बैलेट बॉक्स से दूर रहे हैं.  अब वे मुख्यधारा में शामिल होते दिखाई पड़ रहे हैं. बहरहाल इसबार के चुनाव में अरब वोटिंग का असर दिखाई पड़ रहा है.

और उनकी भूमिका

चुनाव से दो बातें ज़रूर स्पष्ट हुई हैं. एक, मतदाताओं ने नेतन्याहू को पूरी तरह से खारिज नहीं किया है. उनकी लिकुड पार्टी ने 27 सीटें जीती हैं, जबकि उनके ब्लॉक, जिसमें कई कट्टर दक्षिणपंथी पार्टियाँ शामिल हैं, ने 53 सीटें हासिल की हैं. 

दूसरा बड़ा निष्कर्ष यह है कि देश के अरब नागरिकों द्वारा समर्थित पार्टियों,जॉइंट लिस्ट और यूनाइटेड अरब लिस्ट (रा'अम) ने 19 सीटें जीती हैं, जो अब तक की सबसे ज़्यादा हैं. उनकी वर्तमान 10 सीटों से करीब दोगुनी हैं. 

इसराइल में अरब आबादी करीब बीस लाख के आसपास है, जो कुल आबादी का तकरीबन 20 या 21 प्रतिशत है. इसराइल में आनुपातिक प्रतिनिधित्व से बनने वाली संसद में यह आबादी किस प्रकार से अपनी बात को रखती है, यह देखना कम महत्त्वपूर्ण नहीं है. 

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इस्लामीकरण!

इस बड़े समर्थन को स्वीकार करने के बजाय, इसराइल के बड़े नेताओं ने, इसे विदेशी दखलंदाज़ी बताकर, या तो उनके वोट को गलत ठहराने की कोशिश की है, या फलस्तीनियों के लोकतांत्रिक अधिकार का इस्तेमाल करने को ‘चुनाव चुराने की कोशिश’ बताया है.

इसे ‘इसराइल का इस्लामीकरण’ करने की कोशिश बताते हुए, नेतन्याहू की सत्तारूढ़ लिकुड पार्टी ने आंतरिक सुरक्षा सर्विस, शिन बेट से कहा है कि वह बड़े पैमाने पर फलस्तीनी वोटिंग में विदेशी दखल की संभावना की जाँच करे. ऐसा करके, उन्होंने अरब वोट की वैधानिकता पर भी सवाल उठा दिया है, और अरब पार्टियों के विपक्ष के साथ गठबंधन की किसी भी कोशिश को चौपट कर दिया है.

आइज़ेनकोट का नज़रिया

अरब पार्टियों की नेतन्याहू के प्रति दुश्मनी जगजाहिर है, और आइज़ेनकोट ने भी अपने कैंपेन के दौरान राष्ट्रीय सुरक्षा और गज़ा जैसे मुद्दों पर मतभेदों के कारण उनके साथ गठबंधन करने से मना कर दिया था. आइज़ेनकोट ने फलस्तीनी राज्य का विरोध किया है, और गज़ा में इसराइली  सेना की मौज़ूदगी बनाए रखने की हिमायत की है. ये बातें सऊदी अरब के साथ रिश्ते सामान्य करने और अब्राहम समझौते को लागू कराने में रुकावट डालेंगी. 

वोटों की गिनती पूरी होने के बाद, आइज़ेनकोट ने कहा कि उनका इरादा सबसे बड़ी ज़ायोनी सरकार बनाने का है, जो इसराइल के बुनियादी चरित्र, देश-सेवा की ज़िम्मेदारी लेने और गाज़ा पट्टी में हमास की सेना और सरकार चलाने की काबिलीयत को खत्म करने पर सहमत होंगे. 

आइज़ेनकोट की शर्तें हैं: इसराइल को यहूदी, डेमोक्रेटिक, लिबरल और बराबरी वाला देश मानना; आज़ादी की घोषणा के मूल्यों की प्रतिबद्धता; सभी इसराइली नागरिकों के लिए ज़रूरी मिलिट्री, नेशनल या सिविलियन सर्विस; और हमास को आतंकवादी संगठन मानना ​​और गज़ा पट्टी में उसकी सेना और सरकार को खत्म करने की ज़िम्मेदारी लेना.

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उदार लोकतंत्र

इसराइल को समझने के लिए दो और बातों के समझने की ज़रूरत है. पहली यह कि यह यहूदी देश है. दूसरे यह लिबरल डेमोक्रेसी भी है. नेतन्याहू की नीतियाँ, भले ही कट्टरपंथी हैं, पर पूरा देश कट्टरपंथी नहीं है. इसराइल के भीतर कई तरह की धारणाएँ हैं. यह बात भी सही है कि 7 अक्तूबर 2023 के हमास के हमले ने पूरे देश को हिला दिया था.

इसबार के चुनाव में भी नेतन्याहू के विरोधी उस हमले में नेतन्याहू सरकार की सुरक्षा से जुड़ी खामियों की जाँच कराने के एजेंडा के साथ खड़े हुए थे. फिर भी इसराइलियों के लिए यह विदेश-नीति वाला चुनाव नहीं था. गज़ा, लेबनान, सीरिया और ईरान समेत कई मुद्दों पर इसराइल में आमराय है. इस चुनाव ने देश के भीतर के दूसरे अंतर्विरोधों को उजागर किया है.

अनिवार्य भर्ती

इसराइली सेना में अल्ट्रा-ऑर्थोडॉक्स (हरेदी) नौजवानों की भर्ती एक बड़ा मुद्दा है. नेतन्याहू उन्हें भर्ती से मिली छूट बनाए रखना चाहते हैं. वे हरेदी समुदाय को नाराज करके गठबंधन खोने का जोखिम नहीं लेना चाहते. 

विपक्ष और ज्यादातर आम इसराइली जनता बड़े पैमाने पर समान भर्ती की माँग करती है. बड़े गठबंधन के लिए, आइज़ेनकोट और दूसरी विपक्षी पार्टियों को यह माँग छोड़नी होगी और शायद अपना गठबंधन तोड़ना होगा. या फिर नेतन्याहू को हरेदी नौजवानों की भर्ती के लिए सहमत होना होगा, जिससे उनका गठबंधन टूटने का खतरा है. 

हिब्रू में ‘हरेदी’ का मतलब है ‘ईश्वर से डरने वाले’. इनके पुरुष आमतौर पर काले कोट, काली टोपी, दाढ़ी और साइड-लॉक्स रखते हैं. स्त्रियाँ सादे, ढके हुए वस्त्र पहनती हैं. पुरुषों का मुख्य काम अक्सर तोरा (यहूदी धर्मग्रंथ) का पूर्णकालिक अध्ययन होता है. 

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पृष्ठभूमि

हरेदी युवाओं की सेना में अनिवार्य भर्ती का मुद्दा लंबे समय से चली आ रही सामाजिक, धार्मिक और राजनीतिक विवाद है. देश में ज्यादातर यहूदी नागरिकों के लिए कुछ समय के लिए सैन्य सेवा अनिवार्य है.1948 में राज्य की स्थापना के समय डेविड बेन-गुरियों ने येशिवा (धार्मिक मठ) में पूर्णकालिक तोरा अध्ययन करने वाले कुछ सौ हरेदी छात्रों को छूट दी थी. तब हरेदी आबादी छोटी थी.

समय के साथ हरेदी आबादी तेजी से बढ़ी. हजारों युवा येशिवा में पढ़ते हुए सेवा से बचते रहे. इससे वस्तुतः यह छूट बन गई. मुख्यधारा का हरेदी नेतृत्व बड़े पैमाने पर भर्ती का विरोध करता है। सुप्रीम कोर्ट ने बार-बार छूट को अवैध ठहराया है. 2024 में महत्वपूर्ण फैसला आया कि बिना कानूनी आधार के छूट नहीं दी जा सकती और भर्ती शुरू करनी होगी. उसके बाद नोटिस भेजे गए, लेकिन ज्यादातर ने नजरअंदाज किया. 

कुछ गिरफ्तारियाँ हुईं, विरोध प्रदर्शन और झड़पें हुईं. हरेदी पार्टियाँ (जैसे शास और यूनाइटेड तोरा यहूदीवाद) छूट वाले कानून की माँग करती रही हैं और गठबंधन राजनीति में दबाव बनाया। 

लंबी प्रक्रिया

अब वहाँ संभावित गठबंधन की बातचीत में हफ़्ते लग सकते हैं, उसमें भी सफलता नहीं मिली, तो चुनाव फिर से होंगे. 2019 से 2021 तक, नाकाम बातचीत की वजह से तीन साल में चार चुनाव हुए थे. नेतन्याहू के लिए, गठबंधन की चर्चा का फेल होना, और एक और चुनाव होना बेहतर विकल्प होगा. इससे होगा यह कि जब तक बातचीत चलेगी, वे प्रधानमंत्री बने रहेंगे. 

राष्ट्रपति हर्ज़ोग का सात साल का कार्यकाल 2028 में खत्म होने वाला है. एक कयास है कि नेतन्याहू उनकी जगह राष्ट्रपति बन सकते हैं. उनके पास नेसेट में वोट हैं, जो राष्ट्रपति का चुनाव करेगा. फिलहाल इंतज़ार कीजिए वक्त का और अमेरिका के नतीज़ों का. 

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