मलिक असगर हाशमी
बांग्लादेश एक बार फिर इतिहास के निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। 12 फरवरी 2026 को होने वाले 13वें आम चुनाव और जनमत संग्रह ने देश की राजनीति, शासन व्यवस्था और क्षेत्रीय समीकरणों को एक साथ केंद्र में ला खड़ा किया है। यह चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन का सवाल नहीं है, बल्कि यह तय करेगा कि बांग्लादेश लोकतंत्र, संवैधानिक सुधारों और पड़ोसी देशों, खासकर भारत के साथ अपने रिश्तों को किस दिशा में ले जाएगा।

पिछले कुछ वर्षों में बांग्लादेश ने गहरे राजनीतिक और सामाजिक उथल-पुथल का सामना किया है। जुलाई-अगस्त 2024 के जन आंदोलन के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख हसीना को देश छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा। इसके बाद से देश में एक अंतरिम सरकार कार्यरत है। इसी दौर में भारत-बांग्लादेश संबंधों और विशेषकर बांग्लादेश में अल्पसंख्यक हिंदुओं की सुरक्षा को लेकर लगातार चिंताएं और शिकायतें सामने आती रही हैं। दूसरी ओर, भारत की ओर से यह स्पष्ट प्रयास किए जाते रहे हैं कि चुनाव से पहले ही ढाका के साथ संवाद और रिश्तों को पटरी पर लाया जाए।
इन परिस्थितियों में 12 फरवरी को होने वाले आम चुनाव असाधारण महत्व रखते हैं। इस चुनाव में 51 राजनीतिक दल हिस्सा ले रहे हैं और लगभग 1,967 उम्मीदवार 298 संसदीय क्षेत्रों में अपनी किस्मत आजमा रहे हैं। कुल मतदाताओं की संख्या लगभग 12.77 करोड़ है, जिनमें पुरुष मतदाता करीब 50.76 प्रतिशत और महिला मतदाता 49.24 प्रतिशत हैं।
इसके अलावा, तीसरे लिंग के 1,234 मतदाता भी लोकतांत्रिक प्रक्रिया में भाग लेंगे। चुनाव को शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न कराने के लिए बड़े पैमाने पर सुरक्षा इंतजाम किए गए हैं। चुनावी ड्यूटी में लगभग 5.5 लाख अंसार और विलेज डिफेंस पार्टी के सदस्य, डेढ़ लाख पुलिसकर्मी, एक लाख सशस्त्र बलों के जवान, 35 हजार बॉर्डर गार्ड बांग्लादेश के कर्मी और अन्य सुरक्षा एजेंसियां तैनात रहेंगी।

यह चुनाव इसलिए भी अनोखा है क्योंकि आम चुनाव के साथ-साथ एक राष्ट्रीय जनमत संग्रह भी कराया जा रहा है। जनमत संग्रह का सवाल जुलाई नेशनल चार्टर 2025 से जुड़ा है, जिसमें संवैधानिक सुधारों को लागू करने की मंजूरी जनता से मांगी जा रही है।
मतदाताओं को केवल ‘हां’ या ‘न’ में जवाब देना होगा कि वे इस संवैधानिक सुधार पैकेज को स्वीकार करते हैं या नहीं। इस पहल की जड़ें 2024 के जन आंदोलन में हैं, जब देश में “राज्य की मरम्मत” और “तानाशाही प्रवृत्तियों के खात्मे” की मांग जोर पकड़ गई थी। इसके बाद 11 सुधार आयोग बनाए गए, राष्ट्रीय सहमति आयोग ने 30 राजनीतिक दलों से संवाद किया और अंततः जुलाई नेशनल चार्टर 2025 का मसौदा तैयार हुआ।
प्रस्तावित सुधारों में सबसे अहम मुद्दा है कार्यवाहक सरकार प्रणाली की पुनर्बहाली, ताकि भविष्य के चुनाव निष्पक्ष और स्वतंत्र तरीके से कराए जा सकें। इसके साथ ही चुनाव आयोग की नियुक्ति प्रक्रिया में पारदर्शिता और तटस्थता सुनिश्चित करने की बात कही गई है। दूसरा बड़ा सुधार द्विसदनीय संसद की स्थापना से जुड़ा है, जिसमें 100 सदस्यों वाला उच्च सदन बनाने का प्रस्ताव है। यह उच्च सदन आनुपातिक प्रतिनिधित्व के आधार पर गठित होगा और संवैधानिक संशोधनों को उसकी मंजूरी भी अनिवार्य होगी।
सुधार एजेंडे में कार्यपालिका और विधायिका के बीच संतुलन, प्रधानमंत्री के कार्यकाल को अधिकतम दो बार तक सीमित करना, प्रधानमंत्री और पार्टी प्रमुख के पदों को अलग करना, तथा विपक्ष की भूमिका को संस्थागत रूप से मजबूत करना भी शामिल है।
न्यायपालिका की स्वतंत्रता, सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों की नियुक्ति की पारदर्शी प्रक्रिया और भ्रष्टाचार निरोधक आयोग को सशक्त बनाने जैसे मुद्दे भी इस सुधार पैकेज का हिस्सा हैं। यदि जनमत संग्रह में यह प्रस्ताव पारित हो जाता है, तो नई संसद एक संवैधानिक सुधार परिषद के रूप में काम करेगी और 180 से 270 दिनों के भीतर सभी संशोधनों को अंतिम रूप दिया जाएगा।
राजनीतिक परिदृश्य की बात करें तो बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी), जमात-ए-इस्लामी, जातीय पार्टी, नेशनल सिटिजन पार्टी और कई वामपंथी व क्षेत्रीय दल इस चुनावी समर में उतर चुके हैं। अतीत के चुनावी आंकड़े बताते हैं कि बीएनपी और अवामी लीग के बीच सत्ता की लड़ाई हमेशा कड़ी रही है।

आंकड़ों में बांग्लादेश चुनाव
1991 और 1996 के चुनावों में सत्ता का पलड़ा कभी बीएनपी तो कभी अवामी लीग के पक्ष में झुका। 2001 में बीएनपी को बड़ी जीत मिली, जबकि 2008 में अवामी लीग ने भारी बहुमत हासिल किया। हालांकि इस बार अवामी लीग की स्थिति कमजोर मानी जा रही है और सत्ता की दौड़ कहीं अधिक खुली दिखाई दे रही है।
डिजिटल राजनीति भी इस चुनाव में अहम भूमिका निभा रही है। राजनीतिक दल और नेता सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के जरिए मतदाताओं तक पहुंचने की कोशिश कर रहे हैं। बीएनपी, जमात-ए-इस्लामी और नए उभरते दलों की ऑनलाइन मौजूदगी तेजी से बढ़ी है। युवा मतदाता, जो देश की बड़ी आबादी का हिस्सा हैं, डिजिटल माध्यमों से प्रभावित हो रहे हैं और यह चुनावी परिणामों को प्रभावित कर सकता है।
भारत के लिए यह चुनाव विशेष रूप से संवेदनशील है। बांग्लादेश में जो भी सरकार बनेगी, उसका रुख सीमा सुरक्षा, अवैध घुसपैठ, व्यापार, कनेक्टिविटी और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा जैसे मुद्दों पर भारत-बांग्लादेश संबंधों की दिशा तय करेगा। अंतरिम सरकार के दौरान दोनों देशों के रिश्तों में आई तल्खी के बावजूद, नई दिल्ली ने यह संकेत दिया है कि वह लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई किसी भी सरकार के साथ रचनात्मक संवाद के लिए तैयार है।

कुल मिलाकर, 12 फरवरी 2026 का चुनाव बांग्लादेश के लिए केवल एक राजनीतिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि उसके लोकतांत्रिक भविष्य, संवैधानिक ढांचे और क्षेत्रीय भूमिका का फैसला करने वाला क्षण है। यह देखना दिलचस्प होगा कि जनता किसे सत्ता सौंपती है, जनमत संग्रह में सुधारों को कितनी स्वीकृति मिलती है और आने वाली सरकार पड़ोसी भारत के साथ रिश्तों को टकराव की दिशा में ले जाती है या सहयोग और स्थिरता के रास्ते पर आगे बढ़ाती है।