इस्लामी अध्ययन में हिंदू बुद्धिजीवियों का योगदान

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] • 11 Months ago
इस्लामी अध्ययन में हिंदू बुद्धिजीवियों का योगदान
इस्लामी अध्ययन में हिंदू बुद्धिजीवियों का योगदान

 

wasayप्रो. अख़्तरुल वासे
 
मुगल काल के पतन के बाद, इस्लामी अध्ययन की सेवा में हिंदू भाइयों की सेवाओं का दायरा व्यापक हो गया. इस प्रकार, ब्रिटिश काल में और स्वतंत्र भारत में इस्लाम और मुसलमानों के अध्ययन में हिंदू भाइयों द्वारा प्रदान की जाने वाली सेवाएं कई हैं. वे विभिन्न शीर्षकों के तहत नीचे सूचीबद्ध हैं. यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि यह केवल एक परिचय है, विस्तृत अध्ययन नहीं:

पवित्र क़ुरआन के अनुवाद और चयन के संबंध में श्री विनोबा भावे का एक महत्वपूर्ण नाम आता है. उन्होंने रूह अल-क़ुरआन नामक उर्दू, हिंदी और अंग्रेज़ी में एक पुस्तक लिखी. यह पुस्तक अपने समय में बहुत लोकप्रिय हुई थी. इसने पवित्र क़ुरआन से उन आयतों का चयन किया जो सामाजिक जीवन और राष्ट्रीय एकता जैसे विषयों पर मार्गदर्शन प्रदान करती हैं.
 
इस पुस्तक के कई संस्करण प्रकाशित हुए. यह पुस्तक अभी भी उपलब्ध है. श्री विनोबा भावे के अनुसार, यह भी याद रखने योग्य है कि उन्होंने रेडियो के माध्यम से औपचारिक सस्वर पाठ (क़िर्अत) भी सीखा.
 
हिन्दी के प्रसिद्ध कवि भारतेन्दु हरीश चन्द्र भी एक महान व्यक्तित्व हैं. उन्होंने भी पवित्र क़ुरआन का अनुवाद करना शुरू किया लेकिन यह अनुवाद पूरा नहीं हो सका. पंडित कैलाश नाथ ने भी पवित्र क़ुरआन का हिंदी में अनुवाद किया. उसका भी कुछ अंश प्रकाशित हो चुका है.
 
विनोदचंद पांडे हाल के दिनों के एक महान व्यक्तित्व हैं. वे सरकार में उच्च पदों पर भी रहे. उन्होंने पूरे क़ुरआन मजीद का अनुवाद किया. कई अन्य लोगों ने भी हिंदी में पूरा और कुछ भाग का अनुवाद किया. हिंदी के अलावा, क़ुरआन का अनुवाद भारत की क्षेत्रीय भाषाओं में किया गया है.
 
क़ुरआन और हिंदू धर्म की पवित्र पुस्तकों के बीच तुलना का विषय हिंदू भाइयों के बीच काफ़ी लोकप्रिय रहा है. इस तरह की पुस्तकों में प्राणनाथ ने गुजराती में क़ुरआन मजीद और गीता की तुलना की हैं. इसी तरह पंडित सुंदर लाल की लोकप्रिय कृति “गीता और क़ुरआन” एक सदाबहार किताब है. इसके अतिरिक्त इस विषय पर अन्य लोगों की पुस्तकें भी हैं. जैसा कि पंडित श्रीराम ने अंग्रेजी में इसी विषय पर एक पुस्तिका लिखी है.
 
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पैग़ंबर की जीवनी पर हिंदू भाइयों ने कई किताबें लिखी हैं. यदि देखा भी जाए तो नात-गोई (कविता) भी जीवन का एक अंग है. क्योंकि नात वास्तव में पैग़ंबर की महानता का नाम है. नात-गोई में हिंदू भाइयों ने अभूतपूर्व काम किया है. पंडित हरिचंद अख़्तर की एक बहुत ही सुंदर नात है. इसमें ये दो शेर भी हैं:
 
किसकी हिकमत ने यतीमों को किया दुर्रे-यतीम
और ग़ुलामों को ज़माने भर का मौला कर दिया
आदमीयत का ग़रज़ सामाँ मुहैया कर दिया
इक अरब ने आदमी का बोलबाला कर दिया

इसी तरह कुंवर महेंद्र सिंह बेदी की इस कविता को बहुत प्रसिद्धि प्राप्त हुई:
 
इश्क़ हो जाए किसी से कोई चारा तो नहीं
सिर्फ़ मुस्लिम का मुहम्मद पे इजारा तो नहीं

हिन्दू भाइयों में बहुत से ऐसे लोग हुए हैं जिन्होंने नात-ए-रसूल (सल्ल.) पर निरंतर पुस्तकें लिखी हैं. जैसा कि दिलूराम कौसरी ने निरंतर नातों का संग्रह लिखा. इसी प्रकार राजा महेन्द्र प्रताप ने नात में कई संग्रह लिखे जो प्रकाशित हो चुके हैं.
 
ये संग्रह उर्दू और फ़ारसी दोनों भाषाओं में हैं. जगन्नाथ आज़ाद का एक नातिया संग्रह भी है. डॉ धर्मेंद्र नाथ ने “हमारे रसूल” नामक एक मोटी किताब लिखी है, इस किताब में उन्होंने सौ से अधिक नात-गो शोअरा का उल्लेख किया है और उनकी चुनी हुई कविताओं को भी प्रस्तुत किया है.
 
नात-गोई के अतिरिक्त जहाँ तक सीरत-निगारी का प्रश्न है, इस विषय पर भी हिन्दू भाइयों की अनेक पुस्तकें मौजूद हैं. इनमें से कुछ किताबें बहुत लोकप्रिय भी हैं. जैसे स्वामी लक्ष्मण की पुस्तक “अरब का चांद” सीरत निगारी की एक महत्वपूर्ण पुस्तक है. इस पुस्तक में अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के व्यक्तित्व और संदेश को बड़े सम्मान और भक्ति के साथ पेश किया गया है.
 
पंडित सुंदर लाल ने भी सीरत पर एक मशहूर किताब लिखी है. इस किताब का नाम है “हज़रत मुहम्मद और इस्लाम”, यह एक मोटी किताब है. इसमें रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के अच्छे जीवन और इस्लाम के संदेश को बहुत ही भक्तिपूर्ण तरीके से प्रस्तुत किया गया है.
 
चूंकि लेखक एक हिंदू हैं, इसलिए वह कुछ ऐसे पहलुओं पर ग़ौर करते हैं, जिन्हें मुसलमान अक़ीदत (भक्ति) में भूल जाते हैं. इसलिए, यह पुस्तक सीरत की एक महत्वपूर्ण पुस्तक है और मानव समाज की समस्याओं को हल करने में इस्लाम की भूमिका पर विशेष ध्यान दिया गया है.
 
एमएन रॉय की किताब “मुहम्मद एंड हिज़ टीचिंग्स: हिस्टोरिकल रोल ऑफ इस्लाम” भी अपने समय की मशहूर किताब है. इस पुस्तक में इस बात पर विशेष ध्यान दिया गया है कि इस्लाम ने मानव समाज को कैसे उन्नत किया है और विशेष रूप से समाज के कमज़ोर सदस्यों के उत्थान और विकास के लिए क्या तरीक़ा अपनाया गया है.
 
इसी प्रकार मारवाड़ी भाषा में राजीव शर्मा ने एक पुस्तक लिखी है जो मारवाड़ी भाषा की पहली सीरत की पहली पुस्तक मानी जाती है. हाल ही में एक सिख श्री सुरजीत सिंह ने “क़ुरआन नातिक़” के नाम से सीरत की एक पुस्तक लिखी है, इसका शीर्षक ही कितना ग़ैर-मामूली है और पूरी किताब अत्यन्त भक्ति और सम्मान के साथ लिखी गई है.
 
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सीरत पर हिंदी, अंग्रेज़ी और भारत की स्थानीय भाषाओं में और भी कई किताबें लिखी गई हैं. पुस्तकों के अतिरिक्त लेखों और आलेखों की संख्या बहुत अधिक है. स्वामी विवेकानंद जैसे महान व्यक्तित्व ने जीवनी पर नियमित रूप से लेख लिखे हैं जो उनकी चुनी हुई रचनाओं में शामिल हैं.
 
हिंदू बुद्धिजीवियों का प्रमुख कार्य मुस्लिम व्यक्तित्वों और इस्लामी इतिहास का अध्ययन करना है. इस क्षेत्र में उनकी सेवाएं असंख्य हैं. शुरुआती इस्लामी काल में, उन्होंने विभिन्न पहलुओं में हज़रत इमाम हुसैन के प्रति अपनी भक्ति व्यक्त की है,
 
लेकिन बड़ी संख्या में हिंदू मर्सिया-गो (शोकगीत लिखने वाले) हैं. डॉ धर्मेंद्र नाथ “हमारे रसूल” की तरह “हमारे हुसैन” के नाम से भी एक किताब लिखना चाहते थे, लेकिन वह काम पूरा नहीं हो सका.इमाम हुसैन के व्यक्तित्व पर ज़्यादातर शायरी लिखी गई है.
 
किसी ने मनक़बत लिखी है तो किसी ने मर्सिया लिखी है, लेकिन इमाम हुसैन के व्यक्तित्व पर बड़ी संख्या में कविताएँ हैं. इमाम हुसैन के अलावा हिंदू बुद्धिजीवियों की महान उपलब्धि का संबंध भारत के मुस्लिम राजाओं और राजवंशों के इतिहास से है.
 
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उन्होंने फ़ारसी, उर्दू, हिंदी और अंग्रेज़ी के अलावा विभिन्न स्थानीय भाषाओं में मुस्लिम राजाओं और उनकी सेवाओं पर कई किताबें लिखी हैं. बल्कि, प्रत्येक राजा और प्रत्येक परिवार और राज्य पर कई महत्वपूर्ण पुस्तकें हैं. केवल राजाओं पर ही नहीं बल्कि मुस्लिम युग के संपूर्ण इतिहास, सभ्यता, संस्कृति, विज्ञान और विचारों और कला और निर्माणों पर महत्वपूर्ण शोध कार्य हुए हैं और अभी भी चल रहे हैं.
 
कुछ विद्वानों ने ऐसी पुस्तकें लिखी हैं जिनमें भारत पर इस्लाम के प्रभाव का मूल्यांकन किया गया है और कुछ ने इंडो-इस्लामिक सभ्यता के निर्माण में इस्लाम की भूमिका पर प्रकाश डाला है. डॉ. तारा चंद की लोकप्रिय पुस्तक “हिंदुस्तान पर मुसलमानों के प्रभाव” इस श्रृंखला की सबसे महत्वपूर्ण पुस्तक है. हालाँकि, ऐसी और भी कई किताबें हैं.
 
इसी तरह महात्मा गांधी और पंडित जवाहरलाल नेहरू का लेखन भी बहुत महत्वपूर्ण है, उन्होंने भी इस्लाम और मुसलमानों के बारे में बहुत कुछ लिखा है.इस अवसर पर यह कहना उचित होगा कि कुछ हिंदू बुद्धिजीवियों ने मुस्लिम राजाओं की आलोचना की है और इस्लाम पर भी आपत्ति जताई है.
 
हालांकि यह एक नकारात्मक बात है, लेकिन अगर ध्यान से देखा जाए तो यह भी वास्तव में इंडो-इस्लामिक सभ्यता के अध्ययन का एक हिस्सा है. उदाहरण के लिए केएस लाल और हर्ष नारायण आदि की पुस्तकें आलोचनात्मक हैं लेकिन वे भी इस्लाम और मुसलमानों के अध्ययन का ही हिस्सा हैं.
 
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(लेखक जामिया मिल्लिया इस्लामिया के प्रोफेसर एमेरिटस (इस्लामिक स्टडीज़) हैं)