एक अच्छी कोशिश जो भटक गई

Story by  हरजिंदर साहनी | Published by  [email protected] | Date 05-01-2026
A good attempt that went astray.
A good attempt that went astray.

 

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हरजिंदर

पश्चिमी देशों की एक दिक्कत यह है कि वे बाकी सभ्यताओं को किसी भी सूरत में ठीक से समझ नहीं पाते। जब वे काफी प्रगतिशील ढंग से सोचते हैं और उनके हक में फैसला लेने की कोशिश करते हैं तब भी बात उलटी दिशा में ही चल पड़ती है।पश्चिमी देशों के मुसलमान पिछले कुछ समय से जिस चीज से खासकर परेशान हैं उसे कहा जाता है इस्लामफोबिया। यानी इस्लाम मानने वालों से बेवजह भय खाना और फिर प्रतिक्रिया में उन्हें परेशान करना, यहां तक कि उनके खिलाफ हिंसा करना। इस सोच और ऐसी प्रतिक्रिया पर काबू कैसे पाया जाए इस बारे में भी कईं जगह सोचा जाने लगा है।

काफी समय से इसकी चर्चा ब्रिटेन में भी चल रही थी। पिछले साल फरवरी में सरकार ने सोचा कि इस पर कुछ ठोस किया जाए और उसने एक वर्किंग ग्रुप बनाया। जिसे यह जिम्मेदारी दी गई कि वह मुसलमानों के खिलाफ नफरत और इस्लामफोबिया को नियंत्रित करने के रास्ते सुझाए जिससे इन सबके लिए कानून बनाए जा सकें।

वर्किंग ग्रुप ने तय समय में ही अपनी रिपोर्ट दे दी लेकिन उस रिपोर्ट केा सार्वजनिक नहीं किया गया। लेकिन यह रिपोर्ट बीबीसी के हाथ लग गई और उसने रिपोर्ट को पूरी तरह प्रसारित कर दिया। बीबीसी के अनुसार रिपोर्ट में इस्लाम शब्द को पूरी तरह हटा दिया गया है। इसके अलावा इस्लाम या मुसलमानों की किसी भी तरह की आलोचना और मुसलमानों के खिलाफ किसी भी तरह के नफरती शब्दों के इस्तेमाल को गैर कानूनी बनाने और उसके लिए सजा के प्रावधान की सिफारिश की गई है।
इस रिपोर्ट में आलोचना को जिस तरह परिभाषित किया गया है उसने कईं दूसरी समुदायों और यहां तक कि शिक्षा जगत के कान खड़े कर दिए। इसमें आलोचना के बारे में बहुत अस्पष्ट ढंग से कहा गया है और इसलिए इसके दायरे में ऐसी बहुत सी चीजें भी आ जाएंगी जिन्हें आलोचना तो कहा जा सकता है लेकिन वह निंदा नहीं हैं।

इस मसले को उठाने वालें में ब्रिटेन के सिख और हिंदू संगठन सबसे आगे हैं। वे भी ब्रिंटेन में अल्पसंख्यक हैं हालांकि उनकी संख्या मुस्लिम समुदाय से कम है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की बात करने वाले भी उनके साथ खड़े हो गए हैं। इन संगठनों ने जो कहा है उसे सिर्फ दो समुदायों के आपसी वैमनस्य और स्पर्धा का मामला कह कर खारिज नहीं किया जा सकता।

इस पूरी बहस में कबीरदास का उदाहरण दिया गया है। कबीर ने अपनी वाणी में हिंदू कुरीतियों की भी आलोचना की है और मुस्लिम समाज की कुरीतियों की भी। अगर इस संदर्भ से अलग करके सिर्फ आलोचना के पक्ष को ले लिया जाए तो कबीर के दोहों के पाठ को भी अपराध ठहराया जा सकता है। यही गुरु नानक की वाणी के बारे में भी कहा जा सकता है।

भारतीय समुदाय से ही एक आवाज यह भी आई कि इस लिहाज से तो मिर्जा ग़ालिब के कुछ शेरों का पाठ भी अपराध घोषित हो जाएगा। शिक्षा जगत में बेचैनी इसलिए है कि कबीर, नानक और ग़ालिब किसी न किसी रूप में ब्रिटेन के कईं विश्वविद्यालयों में पढ़ाए भी जाते हैं।

इस्लामफोबिया को रोकने के लिए कुछ किया जाना चाहिए पहले यह बात कहने वाले भी अब तर्क दे रहे हैं कि बात इस्लाम मानने वालों के खिलाफ नफरत और हिंसा रोकने की थी और इसे आलोचना रोकने का औजार बनाया जा रहा है।
यह सच है कि वर्किंग ग्रुप बनाने के पीछे जो सोच थी वह बहुत अच्छी थी लेकिन आलोचकों की बात मानें तो पूरा मुद्दा ही बदल दिया गया है। वैसे डर यह भी है कि इन आलोचनाओं के चलते कहीं नफरत को रोकने की यह कोशिश ही बीच रास्ते न रोक दी जाए। 
 

( लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)


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