डॉ. सरफराज़ : एमबीबीएस में दाखिला नहीं मिला, तो फार्म डी से बनाया मुकाम

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 20-10-2026
Dr. Sarfaraz: Didn't get admission to MBBS, so carved out a career through PharmD
Dr. Sarfaraz: Didn't get admission to MBBS, so carved out a career through PharmD

 

योगेश जगताप

महाराष्ट्र के धाराशिव जिले के डॉ. सरफराज़ बशीर तांबोली ने मेडिकल एजुकेशन और क्लिनिकल रिसर्च के क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बनाई है। 29साल की उम्र में फार्म डी यानी डॉक्टर ऑफ फार्मेसी की डिग्री हासिल करने के बाद उन्होंने पीएचडी भी पूरी कर ली है। उनकी डॉक्टरेट रिसर्च का विषय टाइप 2डायबिटीज और डायबिटिक रेटिनोपैथी है। यह बीमारी लंबे समय तक रक्त में शुगर का स्तर बढ़ा रहने के कारण आंखों के पर्दे यानी रेटिना को नुकसान पहुंचा सकती है।

डॉ. सरफराज़ धाराशिव के केटी पाटिल कॉलेज ऑफ फार्मेसी में असिस्टेंट प्रोफेसर के रूप में काम कर रहे हैं। उन्होंने राजस्थान के अलवर स्थित सनराइज यूनिवर्सिटी से पीएचडी हासिल की है। उनका शोध डायबिटीज के मरीजों में आंखों की जटिलताओं, बीमारी से जुड़े जोखिम और समय पर जांच के महत्व को समझने पर केंद्रित है।

उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, फार्म डी की डिग्री के बाद 30साल की उम्र से पहले पीएचडी पूरी करने वाले वह महाराष्ट्र के पहले व्यक्ति हैं। हालांकि, इस दावे की स्वतंत्र पुष्टि के लिए आधिकारिक रिकॉर्ड उपलब्ध होना जरूरी है।

फिर भी उनकी शैक्षणिक यात्रा खास है। यह कहानी बताती है कि मेडिकल क्षेत्र में करियर बनाने का रास्ता केवल एमबीबीएस तक सीमित नहीं है। फार्मेसी, क्लिनिकल फार्मेसी और मेडिकल रिसर्च में भी ऐसे अवसर हैं, जिनसे मरीजों की देखभाल और चिकित्सा विज्ञान को आगे बढ़ाया जा सकता है।

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शिक्षित परिवार से मिली आगे बढ़ने की प्रेरणा

डॉ. सरफराज़ का पुश्तैनी गांव धाराशिव का समतानगर है। उनके पिता जिला परिषद के स्कूल में हेडमास्टर हैं। उनकी मां रेशमा तांबोली ने भी शिक्षा के क्षेत्र में डिग्री हासिल की है। वह गृहिणी हैं। परिवार में पढ़ाई लिखाई के माहौल ने बच्चों को अपनी रुचि के अनुसार आगे बढ़ने की प्रेरणा दी।

सरफराज़ की बहन डॉ. तबस्सुम ने एमबीबीएस की पढ़ाई की है। उनकी पत्नी डॉ. अलीशा शेख भी चिकित्सा क्षेत्र से जुड़ी हैं। उन्होंने बीएएमएस की डिग्री हासिल की है। वर्ष 2024में महाराष्ट्र लोक सेवा आयोग यानी एमपीएससी के माध्यम से हुई चयन प्रक्रिया के बाद उन्हें मेडिकल ऑफिसर, क्लास वन के पद पर नियुक्ति मिली। वह फिलहाल अंदूर के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में सेवाएं दे रही हैं।

इस तरह परिवार के कई सदस्य स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्र से जुड़े हैं। लेकिन सरफराज़ का रास्ता शुरुआत से तय नहीं था। मेडिकल की पढ़ाई करने का उनका सपना था। परिस्थितियों ने उन्हें दूसरा विकल्प चुनने पर मजबूर किया। उन्होंने उसी विकल्प को अपनी ताकत बनाया और आगे चलकर रिसर्च को अपने करियर का अहम हिस्सा बना लिया।

नीट में चार अंक कम मिले, फिर चुनी फार्म डी की राह

डॉ. सरफराज़ ने दसवीं तक की पढ़ाई धाराशिव में की। इसके बाद उन्होंने लातूर से ग्यारहवीं और बारहवीं की पढ़ाई पूरी की। स्कूल के दिनों से ही उन्हें जीव विज्ञान में दिलचस्पी थी। बारहवीं में पढ़ते समय उन्होंने मेडिकल क्षेत्र में अपना करियर बनाने का फैसला कर लिया था।

उनकी पहली पसंद एमबीबीएस थी। इसके लिए उन्होंने नीट की परीक्षा दी। लेकिन परीक्षा में चार अंक कम रहने के कारण उन्हें सरकारी मेडिकल कॉलेज में दाखिला नहीं मिल सका। उनके सामने सेमी गवर्नमेंट कॉलेज में प्रवेश लेने का विकल्प था, मगर उन्होंने वह रास्ता नहीं चुना।

इसी दौरान कुछ परिचितों ने उन्हें फार्मेसी की पढ़ाई करने की सलाह दी। सरफराज़ के लिए यह फैसला केवल किसी दूसरे कोर्स में दाखिला लेने का नहीं था। वह स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़े रहना चाहते थे। उनकी दिलचस्पी दवाओं के काम करने के तरीके, मरीजों के इलाज और क्लिनिकल रिसर्च में थी।

इसी सोच के साथ उन्होंने डॉक्टर ऑफ फार्मेसी यानी फार्म डी का विकल्प चुना। वर्ष 2016में उन्होंने छत्रपति संभाजीनगर के गवर्नमेंट कॉलेज ऑफ फार्मेसी में दाखिला लिया। फार्म डी छह साल का पेशेवर पाठ्यक्रम है। इसमें दवाओं के सुरक्षित और प्रभावी इस्तेमाल, मरीजों की दवा संबंधी समस्याओं, क्लिनिकल फार्मेसी और अस्पताल आधारित प्रशिक्षण पर विशेष ध्यान दिया जाता है।

एमबीबीएस में दाखिला नहीं मिलना उनके लिए निराशा का कारण हो सकता था। लेकिन उन्होंने अपने करियर की दिशा बदलते हुए मेडिकल क्षेत्र में आगे बढ़ने का दूसरा रास्ता तलाश लिया।

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पढ़ाई के साथ पढ़ाने का सिलसिला भी जारी रखा

कॉलेज में पढ़ाई के दौरान सरफराज़ ने शिक्षण के प्रति अपनी रुचि को भी बनाए रखा। दूसरे वर्ष से ही वह छत्रपति संभाजीनगर में बारहवीं कक्षा के विद्यार्थियों को जीव विज्ञान पढ़ाने लगे। वर्ष 2017से 2021के बीच उन्होंने सैकड़ों विद्यार्थियों को ऑनलाइन और ऑफलाइन माध्यम से मार्गदर्शन दिया।

इस अनुभव ने उन्हें विषय को गहराई से समझने और उसे सरल भाषा में दूसरों तक पहुंचाने का अवसर दिया। मेडिकल शिक्षा में केवल जानकारी हासिल करना ही जरूरी नहीं है। कठिन विषयों को समझना और विद्यार्थियों को समझाना भी महत्वपूर्ण है। सरफराज़ ने अपनी पढ़ाई के साथ इस जिम्मेदारी को निभाया।

वर्ष 2021में फार्म डी की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने छत्रपति संभाजीनगर के सरकारी घाटी अस्पताल में एक साल की इंटर्नशिप की। अस्पताल में प्रशिक्षण के दौरान उन्हें मरीजों की देखभाल और दवाओं के व्यावहारिक इस्तेमाल को करीब से समझने का अवसर मिला।

इसके बाद उनके सामने विदेश में पीएचडी करने और नौकरी पाने का अवसर भी आया। लेकिन इसी समय उनके पिता को हार्ट अटैक आया। परिवार की आर्थिक परिस्थितियां भी चुनौतीपूर्ण थीं। ऐसे में उन्होंने विदेश जाने की योजना छोड़ दी और अपने परिवार के साथ रहने का फैसला किया।

यह उनके जीवन का महत्वपूर्ण मोड़ था। विदेश में आगे बढ़ने का अवसर छोड़ने के बावजूद उन्होंने अपने शैक्षणिक लक्ष्य से समझौता नहीं किया। वह महाराष्ट्र लौट आए और अपने क्षेत्र में रहते हुए आगे की पढ़ाई तथा शोध का काम जारी रखा।

टाइप 2डायबिटीज और आंखों की रोशनी पर शोध

धाराशिव लौटने के बाद डॉ. सरफराज़ ने केटी पाटिल कॉलेज ऑफ फार्मेसी में असिस्टेंट प्रोफेसर के रूप में काम शुरू किया। अध्यापन के साथ उन्होंने पीएचडी के लिए पंजीकरण कराया। उनके शोध का केंद्र टाइप 2डायबिटीज से पीड़ित लोगों में डायबिटिक रेटिनोपैथी और इससे जुड़े जोखिम कारक रहे।

डायबिटिक रेटिनोपैथी मधुमेह की एक गंभीर जटिलता है। इसमें रक्त में लंबे समय तक शुगर का स्तर अधिक रहने के कारण आंखों के रेटिना की रक्त वाहिकाओं को नुकसान पहुंच सकता है। शुरुआती चरण में कई मरीजों को स्पष्ट लक्षण महसूस नहीं होते। बीमारी बढ़ने पर नजर धुंधली होने और गंभीर मामलों में दृष्टि खोने का खतरा पैदा हो सकता है।

डॉ. सरफराज़ ने अपने शोध के तहत अहमदाबाद के एक नेत्र संस्थान के लगभग 200मरीजों के नमूनों और क्लिनिकल आकलन से जुड़े आंकड़ों का अध्ययन किया। उनका उद्देश्य यह समझना था कि डायबिटीज की अवधि, रक्त में शुगर का नियंत्रण और अन्य जैविक संकेतक आंखों की बीमारी से किस तरह जुड़े हो सकते हैं।

उनके शोध में सीआरपी, टीएनएफ अल्फा और वीईजीएफ जैसे बायोमार्कर्स पर भी ध्यान दिया गया। ये शरीर में सूजन और रक्त वाहिकाओं से जुड़ी प्रक्रियाओं को समझने में उपयोगी संकेतक हैं। हालांकि, किसी एक बायोमार्कर के बढ़ने से बीमारी की स्थिति तय नहीं की जा सकती। इसके लिए मरीज की पूरी चिकित्सकीय स्थिति, जांच और विशेषज्ञ की राय को साथ में देखना जरूरी होता है।

डॉ. सरफराज़ के मुताबिक, डायबिटीज की अवधि बढ़ने और रक्त में शुगर का पर्याप्त नियंत्रण न रहने का डायबिटिक रेटिनोपैथी से संबंध है। वह कहते हैं कि नियमित आंखों की जांच, एचबीए1सी की निगरानी और दूसरे जोखिम कारकों का नियंत्रण बेहद जरूरी है।

उनकी रिसर्च का महत्व इस बात में है कि डायबिटीज के मरीजों में आंखों की जटिलताओं को समय रहते पहचानने की जरूरत पर ध्यान दिया जाए। हालांकि, किसी शोध के आधार पर बीमारी की रोकथाम या इलाज में निश्चित लाभ का दावा करने के लिए उसके निष्कर्षों, प्रकाशन और आगे के वैज्ञानिक परीक्षणों का आकलन जरूरी है।

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भारत में फार्म डी को लेकर जागरूकता बढ़ाने की जरूरत

डॉ. सरफराज़ की शैक्षणिक यात्रा का एक अहम पहलू फार्म डी और क्लिनिकल फार्मासिस्ट की भूमिका को लेकर जागरूकता फैलाने की उनकी इच्छा है। भारत में कई विद्यार्थी और परिवार अब भी फार्म डी तथा डी फार्मेसी को एक जैसा समझ लेते हैं। जबकि दोनों पाठ्यक्रमों की अवधि, पढ़ाई और पेशेवर प्रशिक्षण अलग हैं।

डी फार्मेसी एक डिप्लोमा पाठ्यक्रम है। इसके विपरीत, फार्म डी एक छह वर्षीय पेशेवर डिग्री कार्यक्रम है, जिसमें क्लिनिकल प्रशिक्षण और मरीजों की दवा संबंधी जरूरतों को समझने पर जोर दिया जाता है। भारत में फार्म डी पाठ्यक्रम की शुरुआत वर्ष 2008में हुई थी।

क्लिनिकल फार्मासिस्ट का काम दवाओं के सुरक्षित इस्तेमाल में सहयोग देना, दवाओं के संभावित दुष्प्रभावों पर नजर रखना और मरीज की दवा संबंधी जरूरतों के बारे में स्वास्थ्य विशेषज्ञों के साथ काम करना है। उनकी भूमिका अस्पतालों और स्वास्थ्य सेवाओं में महत्वपूर्ण हो सकती है। हालांकि, भारत में दवा लिखने और इलाज तय करने से जुड़े अधिकार संबंधित कानूनों, पेशेवर नियमों और चिकित्सकीय जिम्मेदारियों के अनुसार निर्धारित होते हैं।

सरफराज़ चाहते हैं कि विद्यार्थियों को फार्म डी के बारे में सही जानकारी मिले। वह चाहते हैं कि युवा मेडिकल क्षेत्र में करियर चुनते समय उपलब्ध विकल्पों को समझें। उनका मानना है कि क्लिनिकल फार्मेसी और रिसर्च के क्षेत्र में रुचि रखने वाले विद्यार्थियों को सही मार्गदर्शन मिले तो वे स्वास्थ्य सेवाओं में योगदान दे सकते हैं।

ग्रामीण महाराष्ट्र के युवाओं के लिए एक मिसाल

डॉ. सरफराज़ तांबोली की कहानी केवल एक डिग्री हासिल करने की कहानी नहीं है। इसमें करियर की निराशा, पारिवारिक जिम्मेदारी, आर्थिक चुनौतियां और अपने क्षेत्र में रहकर आगे बढ़ने का फैसला शामिल है।

नीट में चार अंक कम मिलने के बाद उन्होंने अपना लक्ष्य नहीं छोड़ा। फार्म डी की पढ़ाई पूरी की। अस्पताल में प्रशिक्षण लिया। पढ़ाने का काम किया और फिर डायबिटीज से जुड़ी आंखों की बीमारी पर शोध करके पीएचडी हासिल की।

आज वह धाराशिव में अध्यापन और रिसर्च के काम से जुड़े हैं। उनका सफर उन विद्यार्थियों के लिए प्रेरणा बन सकता है जो मेडिकल क्षेत्र में जाना चाहते हैं, लेकिन एमबीबीएस में प्रवेश नहीं मिलने पर अपने भविष्य को लेकर परेशान हो जाते हैं।

उनकी यात्रा यह संदेश देती है कि करियर में एक रास्ता बंद होने का मतलब सभी रास्तों का बंद हो जाना नहीं है। सही जानकारी, मेहनत और लगातार सीखने की इच्छा से दूसरे अवसर भी तलाशे जा सकते हैं।

डॉ. सरफराज़ के सामने अब क्लिनिकल फार्मेसी को बढ़ावा देने, विद्यार्थियों को मार्गदर्शन देने और मेडिकल रिसर्च में योगदान करने की चुनौती है। उनके लिए उपलब्धि का अर्थ केवल अपनी पढ़ाई पूरी करना नहीं, बल्कि अपने अनुभव से दूसरे युवाओं को भी आगे बढ़ने का रास्ता दिखाना है। यही उनके सफर की सबसे उल्लेखनीय बात है।