फरहान इसरायली/ जयपुर
राजस्थान के सीकर की रहने वाली तीस वर्षीय परवीन खान जब14 साल की थीं, तब एक हादसे ने उनकी जिंदगी बदल दी। वह दसवीं कक्षा में पढ़ती थीं। एक सुबह घर में दूध गर्म करते समय उनके दुपट्टे में आग लग गई। आग बुझाने की कोशिश में उनका करीब70 फीसदी शरीर झुलस गया। उन्हें गंभीर हालत में जयपुर के सवाई मानसिंह अस्पताल में भर्ती कराया गया। कई सर्जरी हुईं। इलाज लंबा चला और उनकी पढ़ाई भी प्रभावित हुई।
उस समय परवीन को शायद अंदाजा नहीं था कि अस्पताल में बिताए गए वे कठिन दिन आगे चलकर उनकी जिंदगी का मकसद बन जाएंगे। इलाज के दौरान उन्होंने ऐसे मरीजों को देखा, जिनके पास दवाइयां खरीदने तक के पैसे नहीं थे। किसी के साथ परिवार का कोई सदस्य नहीं था, तो कोई आर्थिक तंगी के कारण जरूरी इलाज नहीं करा पा रहा था। इन हालात ने परवीन के मन पर गहरा असर डाला।
उन्होंने उसी दौरान खुद से एक वादा किया। अगर वह इस मुश्किल दौर से निकलकर स्वस्थ जीवन की ओर लौट सकीं, तो जरूरतमंद लोगों की मदद करेंगी। आज30 वर्ष की परवीन जयपुर में रहकर इसी वादे को निभाने की कोशिश कर रही हैं।
अपनी मां मेहर खान के नाम पर वह'मेहर फाउंडेशन' चलाती हैं। संस्था के जरिए वह आग से झुलसे लोगों की मदद, जरूरतमंदों को भोजन, लड़कियों को सिलाई का प्रशिक्षण और गरीब मरीजों के लिए सहायता जैसे काम कर रही हैं।परवीन की कहानी सिर्फ एक हादसे से उबरने की कहानी नहीं है। यह उस अनुभव की भी कहानी है, जिसने एक व्यक्तिगत पीड़ा को दूसरों के लिए काम करने की प्रेरणा में बदल दिया।

अस्पताल के अनुभव ने दिखाई समाजसेवा की राह
परवीन के परिवार का करीब25 साल से जयपुर में रहना है। उनके मुताबिक, हादसे के बाद उन्हें सवाई मानसिंह अस्पताल में भर्ती कराया गया था। इलाज में तीन से चार साल तक का समय लगा। इस दौरान दसवीं की अंतिम परीक्षा छूट गई। उनके हाथों की सर्जरी वर्ष2019 तक चलती रही। एक सर्जरी अब भी बाकी है, जिसे वह दर्द के डर से फिलहाल टाल रही हैं।
इलाज के दौरान उनकी मुलाकात एक ऐसी लड़की से हुई, जो एसिड अटैक का शिकार हुई थी। उस लड़की के साथ उसकी बुजुर्ग मां ही थीं। अस्पताल में उन्होंने छह महीने के एक बच्चे को भी देखा, जिसके माता पिता आर्थिक परेशानी के कारण बाहर से लिखी गई दवाइयां नहीं खरीद पा रहे थे।
परवीन बताती हैं कि उन्होंने अपने पिता गुलाम नबी को जरूरतमंद मरीजों की आर्थिक मदद करते देखा था। उनके पिता दवाइयों और ड्रेसिंग जैसी जरूरतों में भी सहायता करते थे। इन घटनाओं ने परवीन को सोचने पर मजबूर किया कि बीमारी और हादसे के बाद लोगों को केवल इलाज ही नहीं, बल्कि आर्थिक सहारे और भावनात्मक समर्थन की भी जरूरत होती है।
वह बताती हैं कि उसी समय उन्होंने अल्लाह से दुआ की और मन में ठान लिया कि स्वस्थ होने के बाद दूसरों के लिए काम करेंगी। उनका इलाज करने वाले डॉक्टर विकास कक्कड़ ने भी उनसे कहा था कि ठीक होने के बाद ऐसा काम करना, जिससे माता पिता का नाम रोशन हो। परवीन के मुताबिक, डॉक्टर की यह बात उन्हें आज भी याद है।

कारोबार से जुटाया समाजसेवा का सहारा
वर्ष2013 में परवीन की शादी जयपुर के इमरान खान से हुई। शादी के बाद उन्होंने अपनी पढ़ाई दोबारा शुरू की और बारहवीं की शिक्षा पूरी की। वर्ष2018 में उन्होंने ट्रेडिंग का काम शुरू किया। आज वह सोने और चांदी की ट्रेडिंग करती हैं। उनका कारोबार थोक और खुदरा दोनों स्तरों पर चलता है।
जब कारोबार कुछ स्थिर हुआ, तो उन्होंने समाजसेवा के लिए अलग संस्था बनाने के बारे में सोचा। वर्ष2019 में एक परिचित से बातचीत के बाद एनजीओ शुरू करने का विचार आगे बढ़ा और उसी साल मेहर फाउंडेशन का पंजीकरण कराया गया। परवीन के अनुसार, संस्था के जरूरी पंजीकरण पूरे हैं और हर साल उसका ऑडिट भी कराया जाता है।
फाउंडेशन का नाम उन्होंने अपनी मां मेहर खान के नाम पर रखा। मां के प्रति उनका लगाव कारोबार के नामों में भी दिखाई देता है। उनका व्यापार मेहर ट्रेडिंग और मेहर ज्वेलरी के नाम से चलता है। घर का नाम भी मेहर हाउस है। संस्था का कार्यालय आमेर में कुंडा चौराहे के पास दिल्ली हाईवे रोड पर स्थित है।
परवीन के लिए कारोबार केवल आमदनी का जरिया नहीं है। वह इससे होने वाली कमाई का एक हिस्सा जरूरतमंदों की मदद में लगाती हैं। उनके मुताबिक, अब तक फाउंडेशन के अधिकांश खर्च उन्होंने अपनी जेब से उठाए हैं। कुछ सहयोगियों ने भी अपनी तरफ से आर्थिक और अन्य मदद दी है।

रेस्टोरेंट से खाना जुटाकर अस्पतालों तक पहुंचाया
मेहर फाउंडेशन की शुरुआत छोटे स्तर पर हुई थी। परवीन ने एक पुरानी गाड़ी खरीदी और उस पर संस्था का नाम लिखवाया। इसके बाद जयपुर के कुछ रेस्टोरेंट संचालकों से संपर्क किया। वहां बचा हुआ ऐसा भोजन, जो खाने के लिए सुरक्षित था, इकट्ठा करके अस्पतालों में मरीजों और उनके परिजनों तक पहुंचाया जाने लगा।
कभी30 लोगों के लिए खाना मिलता, तो कभी50 लोगों के लिए। सप्ताह में एक दिन फाउंडेशन की टीम खुद भी दाल चावल या कढ़ी चावल बनाकर जरूरतमंदों में बांटती थी।वर्ष2020 में कोरोना महामारी के दौरान इस काम का दायरा बढ़ा। परवीन के मुताबिक, फाउंडेशन ने अपनी टीम के सहयोग से सुबह करीब100 और शाम को करीब100 लोगों के भोजन की व्यवस्था की। यह सिलसिला दो महीने तक चला। इस दौरान संस्था को अधिक लोगों ने जाना और उसके काम से जुड़ने लगे।
अस्पतालों में भोजन पहुंचाने का यह प्रयास परवीन के अपने अनुभव से भी जुड़ा है। वह जानती हैं कि बीमारी के दौरान मरीज के साथ आए परिजन कई बार इलाज की चिंता में अपनी जरूरतों पर ध्यान नहीं दे पाते। ऐसे में एक समय का भोजन भी उनके लिए राहत बन सकता है।

सड़क हादसे ने परिवार को फिर कठिन दौर में डाला
समाजसेवा के इसी सफर के बीच वर्ष2021 में परवीन और उनके परिवार को एक और गंभीर हादसे का सामना करना पड़ा। वह अपने पति इमरान के साथ एक्टिवा पर दिल्ली हाईवे से गुजर रही थीं। उनके मुताबिक, गलत दिशा से आई एक कार ने उन्हें टक्कर मार दी।
उस समय उनकी बेटी पांच से छह साल की थी और बेटा महज छह महीने का था। हादसे में इमरान गंभीर रूप से घायल हो गए। वह करीब25 दिन तक कोमा में रहे। उनके दोनों पैरों में रॉड डालनी पड़ी। परवीन की कमर की हड्डी में भी गंभीर चोट आई। डॉक्टरों ने लकवा होने की आशंका जताई थी।
इस हादसे ने परिवार के सामने एक बार फिर स्वास्थ्य और भविष्य से जुड़ी बड़ी चुनौतियां खड़ी कर दीं। परवीन कहती हैं कि अब उनका परिवार स्वस्थ है। वह इसे अल्लाह की मेहरबानी और लोगों की दुआओं का नतीजा मानती हैं।

सिलाई सेंटर से500 से अधिक लड़कियों को प्रशिक्षण
स्वास्थ्य में सुधार के बाद परवीन ने मेहर फाउंडेशन के जरिए महिलाओं और लड़कियों को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में काम किया। आमेर में सिलाई सेंटर शुरू किए गए। इसके लिए एक बड़ा परिसर किराए पर लिया गया, जहां25 से30 सिलाई मशीनें लगाई गईं और प्रशिक्षण देने के लिए शिक्षिका रखी गई।
परवीन के अनुसार, इन केंद्रों में500 से अधिक लड़कियों को मुफ्त सिलाई सिखाई गई। जिन लड़कियों ने आगे इस काम को रोजगार बनाना चाहा, उन्हें घर बैठे काम दिलाने की कोशिश भी की गई। इस पहल का खर्च फाउंडेशन ने उठाया।
उनका मानना है कि जरूरतमंद परिवारों की लड़कियों के लिए हुनर सीखना आर्थिक आत्मनिर्भरता की दिशा में अहम कदम हो सकता है। प्रशिक्षण के बाद यदि उन्हें काम के अवसर मिलें, तो वे अपने परिवार की आमदनी में योगदान दे सकती हैं।

बर्न सर्वाइवर्स की मदद से खास जुड़ाव
मेहर फाउंडेशन के काम में आग से झुलसे लोगों की सहायता पर विशेष ध्यान दिया जाता है। परवीन खुद बर्न सर्वाइवर हैं। इसलिए वह जानती हैं कि जलने का हादसा केवल शारीरिक चोट तक सीमित नहीं रहता। इसका असर आत्मविश्वास, सामाजिक जीवन और परिवार के व्यवहार पर भी पड़ सकता है।
परवीन के मुताबिक, सवाई मानसिंह अस्पताल और दूसरे अस्पतालों से मरीजों की जानकारी मिलने पर उनकी टीम जरूरतमंद परिवारों से संपर्क करती थी। जिन लोगों को आर्थिक या मानसिक सहारे की जरूरत होती, उनकी मदद करने का प्रयास किया जाता था।
वह कहती हैं कि कुछ मामलों में जलने के बाद परिवार भी लड़की को बोझ समझने लगता है। ऐसे में इलाज के खर्च में मदद के साथ उसका आत्मविश्वास लौटाना भी जरूरी होता है। परवीन खुद लड़कियों से बातचीत करती थीं। उनके अनुसार, वह अब तक करीब12 लड़कियों की काउंसलिंग कर चुकी हैं और वे आज भी उनके संपर्क में हैं।
वह इस काम के लिए किसी बाहरी मोटिवेशनल स्पीकर पर निर्भर नहीं रहना चाहतीं। उनका मानना है कि ऐसे अनुभव से गुजर चुके व्यक्ति की बात पीड़ित को अलग तरह का भरोसा दे सकती है। उनका अपना जीवन उन लड़कियों के लिए एक उदाहरण है, जो हादसे के बाद सामान्य जीवन में लौटने की कोशिश कर रही हैं।

इलाज, रोजगार और सरकारी योजनाओं में भी मदद
फाउंडेशन ने जयपुर में मुफ्त दवा वितरण शिविर आयोजित किए हैं। परवीन के अनुसार, संस्था ने नियमित रक्तदान शिविर नहीं लगाए, लेकिन जरूरत पड़ने पर टीम के सदस्य रक्तदान के लिए पहुंचते हैं। वह खुद भी दो बार ऐसे लोगों को रक्त दे चुकी हैं, जिनसे उनका कोई पारिवारिक संबंध नहीं था।
नाई की थड़ी, मुरलीपुरा और दूसरी बस्तियों में शिविर लगाकर लोगों को सरकारी योजनाओं की जानकारी देने का प्रयास भी किया गया। परवीन के मुताबिक, संस्था ने तीन कैंसर मरीजों के इलाज में मदद की। इलाजके बाद इन मरीजों को फल और सब्जियों के ठेले लगवाकर रोजगार से जोड़ने में भी सहयोग किया गया। इसके अलावा कई युवकों को जयपुर में निजी कंपनियों में नौकरी दिलाने में मदद की गई।
परवीन के मुताबिक, महाराष्ट्र में रहने वाले एक सहयोगी ने भी मरीजों के इलाज और जरूरी सामान के लिए करीब तीन से चार लाख रुपये की मदद की है। वह अपना नाम सार्वजनिक नहीं करना चाहते। इसलिए परवीन ने भी उनकी पहचान उजागर नहीं की।
उनके अनुसार, देश के अलग अलग शहरों में करीब250 लोग फाउंडेशन से जुड़े हैं। इनमें मुंबई, दिल्ली, गुरुग्राम, अहमदाबाद और कोल्हापुर के लोग भी शामिल हैं। परवीन संस्था की संस्थापक और अध्यक्ष हैं। उनके पति इमरान खान उपाध्यक्ष की जिम्मेदारी संभालते हैं। दीपेंद्र सिंह राव सचिव और आदिल खान उपसचिव हैं।

अब कैंसर मरीजों और शिक्षा के लिए काम करने का सपना
परवीन की मां मेहर खान ने उन्हें अदब और मर्यादा के साथ काम करने की सीख दी। परवीन कहती हैं कि वह खुद को हर मामले में परिपूर्ण नहीं मानतीं, लेकिन अपनी मां की सीख को जीवन में अपनाने की कोशिश करती हैं।
हाल में उन्होंने सोशल मीडिया पर भी सक्रियता बढ़ाई है। इंस्टाग्राम पर उन्होंने एक वीडियो साझा किया था, जिसमें सड़क किनारे कचरे में पड़ी मूर्तियों को साफ करके सम्मानजनक जगह पर रखा गया। उन्होंने लोगों से अपील की कि पुरानी या खंडित मूर्तियों को कचरे में न फेंकें, क्योंकि हर व्यक्ति की अपनी आस्था होती है। उनके मुताबिक, इस वीडियो को करीब45 से50 हजार लोगों ने देखा। इसके बाद उन्होंने यूट्यूब, इंस्टाग्राम, एक्स और फेसबुक पर भी अपनी गतिविधियां साझा करनी शुरू कीं।
अब उनका अगला लक्ष्य कैंसर मरीजों की मदद करना है। इसकी एक निजी वजह भी है। परवीन के एक चचेरे भाई का22 वर्ष की उम्र में कैंसर से जूझते हुए निधन हो गया था। इस घटना ने उन्हें भीतर तक प्रभावित किया।
वह भविष्य में कैंसर मरीजों के लिए काम का दायरा बढ़ाना चाहती हैं। इसके साथ ही शिक्षा के क्षेत्र में स्कूल या अकादमी खोलने का सपना भी देख रही हैं। इसके लिए उन्हें जमीन, जगह और सहयोग की जरूरत है।
परवीन की जिंदगी में दो बड़े हादसे आए। पहले आग ने उन्हें गंभीर रूप से झुलसा दिया। फिर सड़क दुर्घटना ने उनके परिवार को मुश्किल में डाल दिया। इन अनुभवों के बावजूद उन्होंने जरूरतमंदों की मदद करने का अपना संकल्प नहीं छोड़ा।
आज मेहर फाउंडेशन के जरिए उनका प्रयास है कि किसी मरीज को पैसों की कमी के कारण दवा से वंचित न रहना पड़े, किसी जरूरतमंद को भूखा न सोना पड़े और कोई लड़की हुनर की कमी के कारण अपने पैरों पर खड़े होने का मौका न गंवाए। उनके सामने संसाधनों की सीमाएं जरूर हैं, लेकिन अस्पताल में किया गया वह पुराना वादा आज भी उनके काम की बुनियाद बना हुआ है।