ओनिका माहेश्वरी / नई दिल्ली
उत्तर प्रदेश के एक गांव में सरकारी स्कूल की छत पर चॉक से तस्वीरें बनाने वाली बच्ची ने शायद कभी नहीं सोचा होगा कि एक दिन उसकी कला जापान और दक्षिण कोरिया तक पहुंचेगी। बचपन में कागज पर आकृतियां बनाने का शौक धीरे धीरे उसके जीवन का मकसद बन गया। परिवार की आशंकाएं थीं। रिश्तेदारों के सवाल थे। डॉक्टर बनने की अपेक्षा भी थी। लेकिन गजाला परवीन ने अपनी पसंद को छोड़ा नहीं। उन्होंने कला को अपना रास्ता बनाया और मेहनत के दम पर जामिया मिल्लिया इस्लामिया में स्नातक और स्नातकोत्तर की पढ़ाई के दौरान गोल्ड मेडल हासिल किए।
आज वह पेंटिंग और परफॉर्मेंस आर्ट के जरिए महिलाओं के जीवन, ग्रामीण समाज और पितृसत्तात्मक सोच से जुड़े सवाल उठाती हैं। साथ ही आर्ट टीचर के रूप में नई पीढ़ी को अपनी रुचि पहचानने और उसके अनुसार करियर चुनने के लिए प्रेरित करती हैं। उनकी कहानी केवल एक कलाकार की सफलता नहीं है। यह उस लड़की के आत्मविश्वास की कहानी भी है, जिसने अपने सपनों के लिए परिवार और समाज की प्रचलित धारणाओं के बीच अपनी जगह बनाई।

गजाला की कला यात्रा तीसरी कक्षा से शुरू हुई। उस उम्र में उन्हें कागज पर तरह तरह की आकृतियां बनाने का शौक लग गया था। धीरे धीरे यह शौक पोर्ट्रेट बनाने और आसपास की चीजों को चित्रों में उतारने तक पहुंच गया। उनके माता पिता उनकी बनाई तस्वीरों की तारीफ करते थे।
खासकर उनके पिता को बेटी की चित्रकारी पर गर्व था। वह उसकी ड्राइंग फाइल अपने तकिए के पास रखते और घर आने वाले लोगों को उत्साह से दिखाते थे। गजाला को आज भी याद है कि बचपन में उनके पिता ने किताब में छपी बस का चित्र बनाने को कहा था। उन्होंने अपने भाई के साथ इसे बनाने की कोशिश की और जल्दी ही अपना चित्र पूरा कर लिया। पिता के लिए यह छोटी सी घटना थी, लेकिन गजाला की प्रतिभा को पहचानने का एक यादगार अवसर भी बनी।
स्कूल में उनके आर्ट टीचर राजकुमार सिंह ने भी उनकी प्रतिभा को पहचाना। उन्होंने गजाला को चित्रकारी जारी रखने और कला के क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया। वह विद्यार्थियों को यह समझाते थे कि हर किसी का डॉक्टर या इंजीनियर बनना जरूरी नहीं है।
कला में रुचि रखने वाले विद्यार्थियों को भी इस क्षेत्र में अपना भविष्य तलाशना चाहिए। राजकुमार सिंह अब इस दुनिया में नहीं हैं। कैंसर के कारण उनका निधन हो गया, लेकिन गजाला के जीवन पर उनके मार्गदर्शन की गहरी छाप है। गजाला मानती हैं कि शिक्षक का प्रोत्साहन किसी विद्यार्थी की दिशा बदल सकता है। उनके मामले में भी यही हुआ। बचपन के शौक को गंभीरता से लेने और उसे आगे बढ़ाने का भरोसा उन्हें अपने शिक्षक से मिला।

हालांकि, कला को करियर बनाने का फैसला आसान नहीं था। गजाला पढ़ाई में अच्छी थीं और विज्ञान विषयों पर उनकी पकड़ भी मजबूत थी। परिवार चाहता था कि वह डॉक्टर बनें। समाज में डॉक्टर और इंजीनियर जैसे पेशों को सुरक्षित भविष्य से जोड़कर देखा जाता है, जबकि पेंटिंग को अक्सर शौक माना जाता है।
गजाला के सामने भी यही सवाल रखे गए कि क्या कला से नियमित कमाई हो सकती है और क्या इससे सम्मानजनक करियर बनाया जा सकता है। उनके पिता के निधन के बाद आगे की पढ़ाई और दिल्ली जाने को लेकर परिवार की चिंताएं बढ़ गईं। लेकिन उनकी मां और भाई ने उनका साथ दिया।
गजाला ने जामिया मिल्लिया इस्लामिया में दाखिले के लिए लगातार प्रयास किया। उन्होंने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में भी आवेदन किया था, लेकिन वहां चयन नहीं हुआ। आखिरकार जामिया में दाखिला मिला और उनके भाई ने परिवार को उन्हें अवसर देने के लिए समझाया।
गांव के सरकारी स्कूल से दिल्ली के विश्वविद्यालय तक का बदलाव उनके लिए केवल पढ़ाई का नया चरण नहीं था। उन्हें नए माहौल में अपनी जगह बनानी थी। सहपाठियों के बीच सहज होना था और महानगर की शैक्षणिक संस्कृति को समझना था।
इस बदलाव के साथ आत्मविश्वास विकसित करने में उन्हें कई साल लगे। लेकिन उन्होंने अपनी पढ़ाई पर ध्यान बनाए रखा। जामिया मिल्लिया इस्लामिया में स्नातक की पढ़ाई के दौरान वर्ष 2013 में उन्हें गोल्ड मेडल मिला। वर्ष 2015 में मास्टर की पढ़ाई में भी उन्होंने गोल्ड मेडल हासिल किया। ये उपलब्धियां उनके लिए विशेष महत्व रखती थीं। उन्होंने उन आशंकाओं का जवाब दिया, जिनके अनुसार कला में भविष्य बनाना कठिन माना जाता था।

गजाला की मां का योगदान भी उनकी यात्रा का अहम हिस्सा है। उनकी मां औपचारिक रूप से पढ़ी लिखी नहीं थीं, लेकिन शिक्षा का महत्व समझती थीं। जब गजाला देर रात तक पढ़ाई करतीं, तो उनकी मां पास बैठी रहतीं। परीक्षा के दिनों में वह उनके साथ जागतीं और पढ़ाई जारी रखने के लिए हौसला देतीं।
गजाला ने अपनी मां को समर्पित एक पेंटिंग भी बनाई। यह कलाकृति उनके लिए केवल एक उपहार नहीं, बल्कि उस भावनात्मक सहयोग के प्रति आभार व्यक्त करने का तरीका है, जिसने उन्हें आगे बढ़ने की ताकत दी। गजाला के परिवार में 12 भाई बहन हैं, जिनमें 10 बहनें और दो भाई हैं। इतने बड़े परिवार और सामाजिक अपेक्षाओं के बीच अपनी पसंद का क्षेत्र चुनना उनके लिए एक महत्वपूर्ण व्यक्तिगत फैसला था।
गजाला की कलात्मक यात्रा में वर्ष 2014 एक नया मोड़ लेकर आया। उस समय वह जामिया में मास्टर की पढ़ाई कर रही थीं। जापान से आए एक कलाकार के माध्यम से उन्हें परफॉर्मेंस आर्ट को समझने का अवसर मिला। शुरुआत में वह इस माध्यम से परिचित नहीं थीं।
लोगों के सामने अपनी कला प्रस्तुत करने में झिझक भी होती थी। एक दिन विद्यार्थियों को दो दो मिनट की प्रस्तुति देने का मौका मिला। एक दोस्त ने गजाला का नाम भी दे दिया। उस समय उन्होंने अपने दुपट्टे का इस्तेमाल करते हुए एक छोटी सी प्रस्तुति दी।
उन्होंने दुपट्टा ऊपर उछाला और उसके नीचे आने से पहले जमीन पर लेट गईं। दुपट्टे ने उनके शरीर को ढक लिया। यह उनका पहला परफॉर्मेंस आर्ट अनुभव था। जापानी कलाकार को उनकी प्रस्तुति पसंद आई। वह इसकी वीडियो क्लिप जापान ले गए। बाद में वहां के कुछ कलाकारों ने भी उस प्रस्तुति के बारे में पूछा। गजाला के लिए यह अनुभव अप्रत्याशित था और इससे उन्हें एक नए माध्यम में अपनी पहचान बनाने का अवसर मिला।

पेंटिंग और परफॉर्मेंस आर्ट में अंतर समझाते हुए गजाला कहती हैं कि पेंटिंग में कलाकार रंगों, रेखाओं और आकृतियों के माध्यम से विचार व्यक्त करता है। परफॉर्मेंस आर्ट में कलाकार का शरीर, गतिविधियां और आसपास की वस्तुएं अभिव्यक्ति का माध्यम बन जाती हैं।
इसमें पारंपरिक नाटक की तरह संवाद या पहले से लिखी पटकथा होना जरूरी नहीं है। कलाकार अपने अनुभव और विचारों को शारीरिक गतिविधियों के जरिए सामने रख सकता है। गजाला के लिए यह माध्यम खास है, क्योंकि इससे वह उन सामाजिक मुद्दों को उठाती हैं जिन्हें केवल शब्दों में व्यक्त करना हमेशा आसान नहीं होता।
जापान और दक्षिण कोरिया में कला प्रस्तुत करने के अवसर ने उनके अनुभवों को व्यापक बनाया। वह अपने परिवार की पहली लड़की थीं, जो विदेश गईं। अलग अलग देशों के कलाकारों से मिलना और उनके काम को समझना उनके लिए सीखने का अवसर था।
जापान में उन्होंने भारतीय विवाह संस्कृति और महिलाओं की जिंदगी से जुड़े विषयों पर प्रस्तुति दी। एक प्रस्तुति में वह दुल्हन के रूप में नजर आईं। बिंदी और दुल्हन के पारंपरिक रूप के माध्यम से उन्होंने विवाह से जुड़ी सामाजिक अपेक्षाओं तथा विवाहित महिलाओं की स्थिति पर सवाल उठाए। उनकी कला में भारतीय संस्कृति की पहचान के साथ नारीवादी दृष्टिकोण भी दिखाई देता है। वह परंपराओं को केवल सुंदर प्रतीकों के रूप में नहीं देखतीं, बल्कि उनके भीतर महिलाओं के अनुभवों और सामाजिक दबावों को भी समझने की कोशिश करती हैं।
आज गजाला परवीन आर्ट टीचर के रूप में काम करने के साथ स्वतंत्र कलाकार की भूमिका भी निभा रही हैं। वह पेंटिंग बनाती हैं, थीम आधारित कलाकृतियों पर काम करती हैं और परफॉर्मेंस आर्ट प्रस्तुत करती हैं। उनके काम में व्यावसायिक परियोजनाएं, ऑर्डर पर बनाई गई पेंटिंग और विभिन्न कला कार्यक्रम शामिल हैं। स्कूल के दिनों में उनकी एक छोटी पेंटिंग 500 रुपये में बिकी थी।
वह उस अनुभव को यादगार मानती हैं। उनके लिए यह इस बात का संकेत था कि कला केवल व्यक्तिगत संतुष्टि तक सीमित नहीं रहती, बल्कि आजीविका का आधार भी बन सकती है। उनका मानना है कि कला में आगे बढ़ने के लिए प्रतिभा के साथ अनुशासन, निरंतर अभ्यास और सीखने की इच्छा जरूरी है।
आर्ट टीचर के रूप में गजाला को ऐसे विद्यार्थियों से मिलने का अवसर मिलता है, जिनमें चित्रकारी की अच्छी क्षमता होती है, लेकिन उन्हें फाइन आर्ट्स में आगे बढ़ने की अनुमति नहीं मिलती। कई अभिभावक मानते हैं कि कला में करियर के अवसर सीमित हैं।
गजाला विद्यार्थियों और उनके माता पिता से बात करके उन्हें समझाने की कोशिश करती हैं कि बच्चों की रुचि को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। वह ग्यारहवीं और बारहवीं कक्षा के विद्यार्थियों को पढ़ाती हैं। उनके अनुसार, हर साल उनके स्कूल के लगभग तीन से चार विद्यार्थी फाइन आर्ट्स का कोर्स पूरा करके आगे बढ़ते हैं। उनके लिए यह एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है, क्योंकि इससे विद्यार्थियों को अपनी पसंद के क्षेत्र में आगे जाने का अवसर मिलता है।
ग्रामीण महिलाओं का जीवन, सामाजिक रूढ़ियां और पितृसत्तात्मक व्यवस्था गजाला की कला के प्रमुख विषय हैं। वह चाहती हैं कि उनकी कलाकृतियां देखने वाले लोगों को सोचने पर मजबूर करें। उनके लिए कला केवल किसी दृश्य को सुंदर बनाना नहीं, बल्कि समाज के उन अनुभवों को सामने लाना है जिन्हें अक्सर अनदेखा कर दिया जाता है।

वह युवाओं को सलाह देती हैं कि वे जिस क्षेत्र में भी जाएं, पूरी लगन और ईमानदारी से काम करें। उनके अनुसार, सफलता किसी एक पेशे तक सीमित नहीं है। जरूरी यह है कि व्यक्ति अपनी रुचि पहचाने, मेहनत करे और सीखना जारी रखे।
गांव की छत पर चॉक से चित्र बनाने वाली गजाला परवीन की यात्रा इसी विश्वास को सामने लाती है। उनकी कहानी बताती है कि एक शिक्षक का प्रोत्साहन, परिवार का भरोसा और अपने फैसले पर कायम रहने का साहस किसी साधारण शुरुआत को अंतरराष्ट्रीय पहचान तक पहुंचा सकता है।