ओनिका माहेश्वरी
साहित्य और समाज में जब भी मातृत्व की बात आती है, अक्सर एक आदर्शीकृत छवि सामने रख दी जाती है। लेकिन लेखिका, कवयित्री और स्वतंत्र पत्रकार ज़ेहरा नक़वी इस पारंपरिक ढांचे को चुनौती देते हुए अपनी बात पूरी बेबाकी से रखती हैं। वे स्पष्ट रूप से मानती हैं कि समाज महिलाओं को यह बताने के लिए मजबूर करता है कि वे सबसे ऊपर एक मां हैं, जबकि उनकी पहली और असली पहचान एक स्वतंत्र इंसान की है। पिछले एक दशक से अधिक समय से जेंडर, साहित्य और सामाजिक-राजनीतिक मुद्दों पर लगातार लिख रहीं ज़ेहरा नक़वी का लेखन महिलाओं को केवल बेटी, पत्नी या मां के तख्ते पर रखने के बजाय उनकी संपूर्ण मानवीय पहचान के साथ समझने की जोरदार पैरवी करता है।

ज़ेहरा नक़वी की रचनात्मक और अकादमिक यात्रा का एक बड़ा हिस्सा अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से जुड़ा रहा, जहां उन्होंने पत्रकारिता में उत्कृष्ट प्रदर्शन करते हुए चार गोल्ड मेडल हासिल किए। हालांकि, अलीगढ़ उनके लिए सिर्फ डिग्रियों का केंद्र नहीं था, बल्कि वहां उनके विचारों को विस्तार मिला और रचनात्मकता को एक खुला आकाश।
स्कूल के दिनों से ही कविताएं लिखने वाली नक़वी ने यूनिवर्सिटी में नाटक, संगीत और रचनात्मक लेखन में गहरी रुचि दिखाई। फ्रेशर्स पार्टी के दौरान पढ़ी गई उनकी कविता 'ओ अब्दुल्ला' आज भी उनके शुरुआती अभिव्यक्ति मंचों में याद की जाती है। वुमेंस कॉलेज की अपनी यादों में वे शिक्षकों और छात्राओं के आत्मीय रिश्ते को याद करते हुए मानती हैं कि शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य सिर्फ रोजगार पाना नहीं, बल्कि स्वतंत्र रूप से सोचने और दुनिया को अपनी दृष्टि से समझने की क्षमता विकसित करना है।
ज़ेहरा की लेखन शैली की एक बड़ी खासियत यह है कि वे आधी रात से लेकर सुबह की पहली किरण तक लिखना पसंद करती हैं। एक मां के तौर पर दिनभर की भागदौड़ के बाद रात के ये शांत लम्हे ही उन्हें सुकून देते हैं। वे अपने फोन के नोटपैड में दिनभर आने वाले विचारों को दर्ज करती हैं और जब लिखने बैठती हैं, तो दुनिया से दूर होकर पूरी तरह अपने लेखन में खो जाती हैं।

उनके लेखन का मुख्य उद्देश्य सच की खोज करना और उसे बिना किसी झिझक के बयां करना है। उनके लेख और कॉलम इंडियन एक्सप्रेस, द हिंदू, रीडर्स डाइजेस्ट, द वायर, आउटलुक, द क्विंट, फाइनेंशियल क्रॉनिकल, चाइल्ड मैगज़ीन और विमेंस वेब जैसे प्रतिष्ठित राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय प्रकाशनों में लगातार प्रकाशित होते रहे हैं।
उनकी पहली संस्मरण पुस्तक 'द रिलक्टेंट मदर: अ स्टोरी नो वन वांट्स टू टेल', जिसे हे हाउस द्वारा प्रकाशित किया गया है, मातृत्व के उस रूप को सामने लाती है जिससे समाज अक्सर आंखें मूंद लेता है। यह किताब उनके जीवन के तीन वर्षों के अनुभवों पर आधारित है, जो बेटे के गर्भधारण से लेकर शुरुआती मातृत्व तक के सफर को दर्ज करती है।
यह एक ऐसी युवा महिला का संस्मरण है जो अपनी नई जिम्मेदारियों और अपने व्यक्तिगत सपनों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश करती है। समाज मां से हर त्याग की उम्मीद करता है, लेकिन ज़ेहरा इस बात को रेखांकित करती हैं कि मां बनने के अनुभव में प्रेम के साथ-साथ थकान, झुंझलाहट, तनाव, अकेलापन और अपनी पहचान खोने का डर भी शामिल होता है। इन भावनाओं को महसूस करना किसी महिला को बुरी मां नहीं बनाता, क्योंकि मां भी आख़िरकार एक इंसान है जिसकी अपनी सीमाएं और इच्छाएं हैं।
ज़ेहरा नक़वी का स्पष्ट मानना है कि बच्चे के जन्म के बाद किसी महिला की अपनी दुनिया खत्म नहीं होनी चाहिए। वे विवाह, अंतरंगता, आर्थिक स्वतंत्रता और महिलाओं के करियर पर खुलकर लिखती हैं। उनके अनुसार करियर सिर्फ कमाई का साधन नहीं, बल्कि आत्मसम्मान और पहचान का जरिया है।

इसी तरह, शिक्षा को वे केवल डिग्री तक सीमित न मानकर आत्मनिर्णय की स्वतंत्रता मानती हैं। वे समाज के विकास का मूल्यांकन केवल जीडीपी या तकनीक से करने के बजाय लैंगिक समानता और सामाजिक न्याय के स्तर पर करने का आह्वान करती हैं।
उनकी इस प्रतिबद्धता और उत्कृष्ट लेखन के लिए उन्हें कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पहचान मिली है। उन्हें वर्ष 2020 और 2021 के लिए 'I.N.S.P.I.R.E राइटर ऑफ द ईयर' पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
इसके अलावा, उनका नाम उत्तर प्रदेश की 100 सबसे प्रेरणादायक मुस्लिम महिलाओं की RBTC सूची में शामिल हुआ और वे राज्य की सफल महिलाओं पर केंद्रित राज्यसभा टीवी की डॉक्यूमेंट्री का हिस्सा भी रहीं। ज़ेहरा नक़वी का लेखन पाठकों से बस यही बुनियादी सवाल पूछता है कि क्या हम महिलाओं को उनकी वास्तविक पहचान के साथ स्वीकार करने के लिए तैयार हैं—एक ऐसी पहचान जो वे खुद अपने शब्दों में रचती हैं।