इस्लामफोबिया के दौर में ‘टाइम हॉपर्स - द सिल्क रोड’ की खास कोशिश

Story by  हरजिंदर साहनी | Published by  [email protected] | Date 08-02-2026
To change children's thinking
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कुछ समय पहले हमने इसी काॅलम में अमेरिका में रहने वाली सीमा यास्मीन की बात की थी। अमेरिकी समाज में लगातार बढ़ रहा इस्लामफोबिया कम हो इसके लिए उन्होंने एक विकलांग मुस्लिम लड़की की कहानी पर एक किताब लिखी है ‘द ट्रयू स्टोरी आॅफ मेसून जईद‘। उनका इरादा था मुस्लिम पात्रों को मुख्यधारा के नैरेटिव में लाना।

इसी काम को अब आगे बढ़ाया है फ्लोरडेलिज़ा डेरिट ने। उन्होंने एक एनीमेशन फीचर फिल्म बनाई है जिसमें मुख्य भूमिका में मुस्लिम बच्चे हैं। डेरिट ने फिल्म में मुस्लिम बच्चों की पूरी विभिन्निता को भी सामने रखने की कोशिश की है। ये सारे बच्चे अरब, पश्चिमी एशिया और दक्षिण पूर्व एशिया की पृष्ठभूमि के हैं।

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dडेरिट ने एक इंटरव्यू में यह कहा भी यह बदलाव इसलिए भी जरूरी था कि फिल्मों में इस तरह के पात्र अगर आते भी हैं तो वे सहायक भूमिका में ही होते हैं। लेकिन इस फिल्म में उन्हें मुख्य भूूमिका दी गई है।

cइस फिल्म का नाम है- ‘टाॅइम हाॅपर्स - द सिल्क रोड‘। यह फिल्म सात और आठ फरवरी को पूरे अमेरिका के सिनेमाघरों में रिलीज़ होगी।

फिल्म की खासियत सिर्फ उसके मुस्लिम पात्र ही नहीं हैं बल्कि यह दर्शकों को उस दौर में ले जाती है मुस्लिम इतिहास का स्वर्णकाल कहा जाता है।

फिल्म में ये बच्चे किसी तरह टाईम ट्रैवल करके सातवीं से 13वीं सदी के बगदाद में पहंुच जाते हैं।

इसके बाद यह फिल्म हमारा परिचय उन तमाम हस्तियों से कराती है जिन्होंने ऐलजेबरा की इजाद की। अंतरिक्षशास्त्र के नियम बनाए और विज्ञान के तमाम क्षेत्रों में काम किया।

जाहिर है कि फिल्म अपनी खासियत को को सिर्फ मुस्लिम पात्रों तक ही सीमित नहीं रखना चाहती हैं बल्कि पूरे इस्लाम के बारे ही लोगों की धारणा बदलना चाहती हैं।

अमेरिका में बहुत से लोगों की प्रचलित धारणाओं को बदलने का तरीका उन्हें यह बताना भी है कि इस सभ्यता में ज्ञान विज्ञान की एक पुरानी परंपरा रही है। डेरिट की फिल्म यही काम करती है।

इसके अलाव फिल्म में अमेरिका में रहने वाले कईं मुस्लिम विद्वानों की आवाज को भी शामिल किया गया है।फिल्म को सिनेमाघरों में रिलीज़ करने के पीछे मकसद यह है कि इसे अमेरिका के मुख्यधारा के दशर्क देख सकें।

किसी भी अन्य मीडियम से इसे प्रसारित करने में खतरा यह रहता कि इसकी पहंुच सीमित हो सकती थी।

ऐसा होता तो इसका मकसद शायद पूरा न हो पाता।  डेरिट इसके पहले दो फिल्में और बन चुकी हैं। इसके अलावा 2016 में उन्होंने ‘मुस्लिम किड टीवी‘ नाम से बच्चों के लिए एक स्ट्रीमिंग प्लेटफाॅर्म भी शुरू किया था। 

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

 

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