Kari-Kalamdani : कश्मीर की विलुप्त होती कला को ज़िंदा रखे हैं फ़ैयाज़ अहमद जान

Story by  दयाराम वशिष्ठ | Published by  [email protected] | Date 09-02-2026
Kari-Kalamdani: Fayaz Ahmed Jan is keeping this dying art of Kashmir alive.
Kari-Kalamdani: Fayaz Ahmed Jan is keeping this dying art of Kashmir alive.

 

दयाराम वशिष्ठ

कश्मीर की सांस्कृतिक विरासत में ऐसी कई कलाएं शामिल हैं, जिनका नाम आज की तेज़ रफ्तार ज़िंदगी में धीरे-धीरे ओझल होता जा रहा है। इन्हीं में से एक दुर्लभ और बेहद खूबसूरत कला है ‘कर-ए-कलामदानी’, जिसे कारी-कलमदानी या Kari-Kalamdani भी कहा जाता है। हैरानी की बात यह है कि देश के भीतर ही बहुत से लोग इस कला के नाम और महत्व से अनजान हैं, जबकि कभी यह कश्मीर की पहचान मानी जाती थी। आज इस विलुप्त होती कला को ज़िंदा रखने की लड़ाई श्रीनगर, जम्मू-कश्मीर के प्रसिद्ध शिल्पकार फ़ैयाज़ अहमद जान लड़ रहे हैं, जो न सिर्फ़ इसे सहेज रहे हैं बल्कि इसे दुनिया तक पहुंचाने का काम भी कर रहे हैं।

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कर-ए-कलामदानी मूल रूप से एक पेपर माशे कला है, जिसकी शुरुआत तेरहवीं सदी में कश्मीर में मानी जाती है। इस कला का नाम ‘कलामदानी’ यानी पेन रखने के डिब्बे से पड़ा, क्योंकि सबसे पहले इसी शिल्प के ज़रिए कलमदान बनाए गए थे। उस दौर में कश्मीर का विशेष कागज़, जिसे ‘खोसुर कागज़’ कहा जाता था, अपनी बेहतरीन गुणवत्ता के लिए दूर-दूर तक मशहूर था। इसी कागज़ से बने कलमदानों की मांग बढ़ी और उन्हें आकर्षक बनाने के लिए उन पर कारी-कलमदानी की बारीक और नाज़ुक सजावट की जाने लगी। यही वजह है कि इसे ‘कर-ए-मुनाकाशी’ यानी सजावट की कला भी कहा जाता है।

फ़ैयाज़ अहमद जान बताते हैं कि करीब 700 साल पहले मीर सईद हमरानी इस कला को ईरान से भारत लेकर आए थे। शुरुआती दौर में इसका प्रयोग शॉलों पर किया गया, लेकिन समय के साथ यह कला लकड़ी और कागज़ पर भी अपनाई जाने लगी। धीरे-धीरे यह कश्मीर की पहचान बन गई। हालांकि, बदलते समय के साथ मशीनों ने हस्तकला की जगह ले ली और युवाओं की रुचि भी इस मेहनत-तलब कला से कम होती चली गई। यही कारण है कि आज कर-ए-कलामदानी विलुप्ति की कगार पर खड़ी है।

फ़ैयाज़ अहमद जान का इस कला से रिश्ता पीढ़ियों पुराना है। वे बताते हैं कि यह हुनर उन्हें विरासत में मिला है। उनके परदादा सबदरजान, दादा अलीजान और पिता मोहम्मद वसीर जान सभी इस कला से जुड़े रहे। बचपन से ही उन्होंने अपने घर में कागज़, रंग और ब्रश के बीच ज़िंदगी को आकार लेते देखा। महज़ दसवीं तक पढ़े फ़ैयाज़ ने 15 साल की उम्र से ही इस कला को सीखना शुरू कर दिया था। जब वे सातवीं कक्षा में थे, तभी उनके पिता का इंतकाल हो गया। परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा, लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। उनकी मां फातिमा चरखा चलाकर पश्मीना साड़ियों के लिए धागा बनाती थीं। मां-बेटे ने मिलकर मेहनत की और इसी कला को अपना सहारा बनाया।

पेपर माशे कला की प्रक्रिया बेहद धैर्य और कौशल की मांग करती है। सबसे पहले पुराने कागज़ को पानी में गलाया जाता है, फिर उसे अच्छी तरह पीसकर बिल्कुल बारीक आटे जैसा बना लिया जाता है। इसके बाद इसमें चावल के मांड का मिश्रण किया जाता है, ताकि तैयार सामग्री मज़बूत और टिकाऊ बने।

इस मिश्रण को अलग-अलग मोल्ड्स में डालकर मनचाहे आकार दिए जाते हैं। जब ये आकार सूख जाते हैं, तब उन पर कश्मीर की पारंपरिक चित्रकारी की जाती है। फ़ैयाज़ बताते हैं कि इसमें प्राकृतिक रंगों के साथ-साथ मेटैलिक और एक्रेलिक रंगों का भी इस्तेमाल होता है। कई बार सोने और चांदी का प्रयोग भी किया जाता है, जिससे ये कलाकृतियां और अधिक बेशकीमती बन जाती हैं। अंत में इन पर वार्निश किया जाता है, जिससे चमक बढ़ जाती है और ये पानी से भी सुरक्षित रहती हैं।

फ़ैयाज़ अहमद जान की बनाई कलाकृतियां आज देश-विदेश में अपनी अलग पहचान बना चुकी हैं। उनके काम की झलक मुंबई इंटरनेशनल एयरपोर्ट की दीवारों पर भी देखने को मिलती है, जहां कर-ए-कलामदानी की चित्रकारी यात्रियों को कश्मीर की सांस्कृतिक गहराई से रू-बरू कराती है। यूरोप में इस कला को लेकर खासा क्रेज़ है। वहां लकड़ी और कागज़ से बने इन सजावटी सामानों को मखमल के कपड़ों में लपेटकर उपहार के रूप में दिया जाता है। जूलरी बॉक्स और सजावटी डिब्बों की खास मांग रहती है।

फ़ैयाज़ अपने पुराने दिनों को याद करते हुए बताते हैं कि पहले रंग बनाने के लिए पत्थरों को कूटा जाता था। यह काम बेहद मेहनत-तलब था, लेकिन रंगों की चमक और गहराई बेमिसाल होती थी। अब समय के साथ मशीनों से बने रंगों का इस्तेमाल होने लगा है, जिससे काम आसान तो हुआ है, लेकिन वे आज भी पारंपरिक तकनीक और डिज़ाइन को बचाए रखने की पूरी कोशिश करते हैं।

उनकी मेहनत और समर्पण को देश ने भी पहचाना है। फ़ैयाज़ अहमद जान को 1985 में नेशनल मेरिट सर्टिफिकेट, 1988 में राष्ट्रीय पुरस्कार और 2019 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया। ये सम्मान सिर्फ़ एक कलाकार के लिए नहीं, बल्कि कश्मीर की उस पारंपरिक कला के लिए भी हैं, जिसे वे बचाने की कोशिश कर रहे हैं।

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फ़ैयाज़ केंद्र सरकार के सहयोग के लिए भी आभार जताते हैं। वे बताते हैं कि सरकार की ओर से समय-समय पर मिलने वाली मदद और देश भर में लगने वाले मेलों में भाग लेने के अवसरों ने उन्हें आगे बढ़ने का हौसला दिया। आज उनके बनाए उत्पाद 100 रुपये से लेकर 3500 रुपये तक की कीमत में बिकते हैं।

फ़ैयाज़ अहमद जान का मानना है कि अगर आज भी इस कला को सही संरक्षण और प्रोत्साहन मिले, तो कर-ए-कलामदानी फिर से अपनी खोई हुई पहचान हासिल कर सकती है। वे चाहते हैं कि आने वाली पीढ़ियां भी इस हुनर को अपनाएं और इसे सिर्फ़ रोज़गार का साधन ही नहीं, बल्कि अपनी सांस्कृतिक विरासत के रूप में देखें। फ़ैयाज़ की कहानी इस बात का प्रमाण है कि अगर जज़्बा सच्चा हो, तो हालात चाहे कितने भी मुश्किल क्यों न हों, परंपरा और कला को ज़िंदा रखा जा सकता है।