The State holds public resources not as a 'private owner,' but as a trustee on behalf of the people: Court
आवाज द वॉयस/नई दिल्ली
उच्चतम न्यायालय ने सोमवार को कहा कि राज्य सार्वजनिक संसाधनों को ‘‘निजी मालिक’’ की तरह नहीं, बल्कि लोगों की ओर से एक न्यासी के रूप में अपने पास रखता है।
न्यायमूर्ति विक्रम नाथ की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि जब भी राज्य सार्वजनिक संसाधनों के आवंटन, सार्वजनिक ठेकों को देने या सार्वजनिक कार्यों के क्रियान्वयन का काम करता है, तब वह इस तरह से काम करने के लिए बाध्य है, जो पारदर्शी, निष्पक्ष एवं संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत समानता की गारंटी के अनुरूप हो।
शीर्ष अदालत ने अरुणाचल प्रदेश में सार्वजनिक निर्माण कार्यों के ठेके मुख्यमंत्री पेमा खांडू के परिजनों के कथित स्वामित्व वाली या उनसे जुड़ी कंपनियों को तरजीही आधार पर दिए जाने के आरोपों की केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) से दो सप्ताह के भीतर प्रारंभिक जांच कराने का निर्देश देते समय यह टिप्पणी की।
न्यायमूर्ति संदीप मेहता और न्यायमूर्ति एन वी अंजारिया भी इस पीठ में शामिल थे।
पीठ ने कहा कि शासन में जनता का भरोसा इस आश्वासन पर टिका होता है कि राज्य द्वारा सृजित अवसरों का संचालन ऐसी संस्थाओं के जरिये किया जाता है, जो समानता, सत्यनिष्ठा और जवाबदेही का सम्मान करती हैं।
पीठ ने कहा, ‘‘जहां सार्वजनिक संसाधनों का वितरण भाई-भतीजावाद, पक्षपात या अपारदर्शी निर्णय प्रक्रिया के आरोपों से घिर जाता है, वहां मामला केवल प्रशासनिक अनियमितता का नहीं रह जाता। इससे उन चिंताओं का जन्म होता है, जो इस संवैधानिक वादे के मूल तक जाती हैं कि राज्य की कार्रवाई निष्पक्ष, पक्षपात रहित और तर्क से निर्देशित होगी।’’
पीठ ने कहा कि इसलिए इस वादे के संरक्षक के रूप में यह सुनिश्चित करना संवैधानिक अदालतों का दायित्व है कि सार्वजनिक प्राधिकार का इस्तेमाल वैधता, पारदर्शिता और संस्थागत जवाबदेही पर आधारित रहे।
पीठ ने 35 पृष्ठ के अपने फैसले में कहा, ‘‘कानून के शासन से संचालित संवैधानिक लोकतंत्र में सार्वजनिक शक्ति का इस्तेमाल हमेशा संवैधानिक अनुशासन के अधीन होता है। राज्य सार्वजनिक संसाधनों को किसी निजी स्वामी की तरह नहीं, बल्कि लोगों की ओर से एक न्यासी के रूप में अपने पास रखता है।’’
उसने कहा कि शीर्ष न्यायालय के न्यायशास्त्र ने लगातार इस बात पर जोर दिया है कि सीबीआई द्वारा जांच का निर्देश देने की शक्ति का प्रयोग संयम के साथ किया जाना चाहिए।
पीठ ने कहा कि ऐसी जांच तब आवश्यक हो सकती है, जब राज्य के उच्च अधिकारी इसमें शामिल हों, जब आरोप जांच एजेंसी के शीर्ष अधिकारियों के खिलाफ हो, ताकि वे जांच की दिशा को प्रभावित कर सकें या जब प्रथम दृष्टया जांच पक्षपातपूर्ण पाई जाए।
पीठ ने कहा कि आदेश के तहत राज्य में एक जनवरी 2015 से 31 दिसंबर 2025 तक सार्वजनिक कार्यों, ठेकों और कार्य आदेशों के आवंटन और उनके क्रियान्वयन की जांच की जाए। उसने सीबीआई को निर्देश दिया कि वह इस मामले में 16 सप्ताह में अपनी स्थिति रिपोर्ट अदालत में दाखिल करे।