The paradox of video games: The rise of moral consciousness amidst the glorification of violence.
आवाज द वॉयस/नई दिल्ली
1970 के दशक के शुरुआती हिंसक वीडियो गेम के बाद से इनके प्रभाव को लेकर बहस लगातार विभाजनकारी रही है—क्या ये बच्चों को बिगाड़ते हैं या शिक्षित करते हैं? हमारे शोध के अनुसार, असली मुद्दा केवल हिंसा नहीं, बल्कि यह है कि गेम अपने डिजाइन और कथानक के जरिए खिलाड़ियों में, उदासीनता से लेकर नैतिक जागरूकता तक, किस तरह की भावनाएं पैदा करते हैं।
पांच फरवरी 2026 को एक साक्षात्कार के दौरान फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने कहा कि समाज में युवाओं के बीच बढ़ती हिंसा का एक कारण यह भी है कि बच्चे और किशोर वीडियो के माध्यम से हिंसा के अधिक संपर्क में हैं। उन्होंने कहा कि ‘फोर्टनाइट’ सहित अन्य वीडियो गेम वास्तविक जीवन नहीं हैं, क्योंकि वे हिंसा के प्रति दृष्टिकोण को विकृत करते हैं।
हालांकि, हाल में चर्चित गेम ‘क्लेयर ऑब्सकर : एक्सपेडिशन 33’ जिसे 2025 के गेम अवॉर्ड्स और पेगासेस अवॉर्ड्स में उसकी कथा और नैतिक दुविधाओं के लिए सराहा गया, यह दिखाता है कि वीडियो गेम गहन चिंतन का माध्यम भी बन सकते हैं। यह गेम इस बात का उदाहरण है कि कैसे खेल मनोरंजन से आगे बढ़कर जटिल भावनाओं को जन्म दे सकता है।
राष्ट्रपति मैक्रों की टिप्पणी के बाद गेमर्स ने नाराजगी जताई और इससे यह बहस फिर तेज हो गई कि क्या हिंसक गेम युवाओं के व्यवहार को प्रभावित करते हैं। हालांकि उन्होंने यह भी माना कि सभी गेम को एक जैसा नहीं माना जा सकता और कुछ उपयोगी एवं सकारात्मक भी होते हैं।
अर्थशास्त्री एग्ने सुजिएडेलिटे के शोध के अनुसार, नए हिंसक गेम के आने के बाद बच्चों द्वारा की जाने वाली हिंसा में वृद्धि का ठोस प्रमाण मिलना मुश्किल है। ऐसे में नाबालिगों को गेम की बिक्री पर प्रतिबंध जैसी नीतियां हिंसा कम करने में प्रभावी नहीं हो सकतीं।
जब मनोरंजन नैतिकता पर हावी हो जाता है
वीडियो गेम मूल रूप से नियमों और गेमप्ले का संयोजन होते हैं, जिनका उद्देश्य खिलाड़ी को आकर्षित रखना है। डिजाइनर इस संतुलन को बनाए रखते हैं कि खिलाड़ी को चुनौती भी मिले और आनंद भी।
कई युद्ध-आधारित गेम—जैसे ‘कॉल ऑफ ड्यूटी’, ‘काउंटर स्ट्राइक’, ‘बैटलफील्ड’, ‘हलो’ और ‘रैनबो सिक्स’ हिंसा को इस तरह प्रस्तुत करते हैं कि युद्ध की वास्तविकता धुंधली हो जाती है। इनमें अक्सर दुश्मनों को अमानवीय दिखाया जाता है, पीड़ितों को अदृश्य बना दिया जाता है और युद्ध के दुष्परिणामों को छिपा लिया जाता है। इससे हिंसा सामान्य लगने लगती है और सहानुभूति कम हो सकती है।