पश्चिम एशिया संकट के बीच यूएई पहुंचे डोभाल, राष्ट्रपति अल नाहयान से अहम मुलाकात

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 27-04-2026
Doval Arrives in UAE Amid West Asia Crisis; Holds Key Meeting with President Al Nahyan
Doval Arrives in UAE Amid West Asia Crisis; Holds Key Meeting with President Al Nahyan

 

आवाज द वाॅयस/ दुबई

पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और बदलते कूटनीतिक समीकरणों के बीच भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल ने रविवार को संयुक्त अरब अमीरात के राष्ट्रपति शेख मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान से मुलाकात की। इस बैठक को क्षेत्रीय हालात और भारत यूएई संबंधों के लिहाज से बेहद अहम माना जा रहा है। दोनों नेताओं के बीच व्यापक रणनीतिक साझेदारी को और मजबूत करने, क्षेत्रीय सुरक्षा और साझा हितों से जुड़े मुद्दों पर विस्तार से चर्चा हुई।

यूएई में भारतीय दूतावास ने बताया कि अजीत डोभाल ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से राष्ट्रपति अल नाहयान को शुभकामनाएं दीं। इसके साथ ही भारत और यूएई के बीच तेजी से बढ़ते रिश्तों को नई दिशा देने पर भी बातचीत हुई। दूतावास के अनुसार बैठक सौहार्दपूर्ण माहौल में हुई और दोनों पक्षों ने मौजूदा चुनौतियों पर मिलकर काम करने की जरूरत दोहराई।

भारत और यूएई के रिश्ते पिछले कुछ वर्षों में नई ऊंचाई पर पहुंचे हैं। व्यापार, ऊर्जा, निवेश, रक्षा, समुद्री सुरक्षा, तकनीक और प्रवासी भारतीयों से जुड़े मुद्दों पर दोनों देशों के बीच लगातार सहयोग बढ़ा है। ऐसे समय में डोभाल की यह यात्रा सिर्फ एक औपचारिक मुलाकात नहीं, बल्कि व्यापक रणनीतिक संवाद का हिस्सा मानी जा रही है।

पश्चिम एशिया इस समय कई स्तरों पर अस्थिरता से गुजर रहा है। ईरान और अमेरिका के बीच रिश्तों में अनिश्चितता बनी हुई है। गाजा संघर्ष के बाद पूरे क्षेत्र में सुरक्षा चिंताएं बढ़ी हैं। समुद्री मार्गों की सुरक्षा, ऊर्जा आपूर्ति और क्षेत्रीय गठबंधनों को लेकर कई देशों की नजरें घटनाक्रम पर टिकी हैं। ऐसे माहौल में भारत की सक्रिय कूटनीति यह संकेत देती है कि नई दिल्ली क्षेत्रीय शांति और स्थिरता को लेकर गंभीर है।

भारत के लिए यूएई सिर्फ खाड़ी का एक मित्र देश नहीं, बल्कि रणनीतिक साझेदार है। लाखों भारतीय वहां काम करते हैं। दोनों देशों के बीच अरबों डॉलर का व्यापार होता है। ऊर्जा जरूरतों से लेकर निवेश तक, यूएई भारत के लिए एक महत्वपूर्ण सहयोगी है। यही वजह है कि सुरक्षा और विदेश नीति से जुड़े बड़े मुद्दों पर दोनों देशों के बीच लगातार संवाद बना रहता है।

डोभाल की यह यात्रा ऐसे समय हुई है जब इसी महीने उन्होंने सऊदी अरब का भी दौरा किया था। वहां उन्होंने सऊदी विदेश मंत्री फैसल बिन फरहान, ऊर्जा मंत्री अब्दुलअजीज बिन सलमान और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार मुसाएद अल ऐबान से मुलाकात की थी। उन बैठकों में भी द्विपक्षीय संबंधों, क्षेत्रीय हालात और साझा हितों पर चर्चा हुई थी। इससे साफ है कि भारत खाड़ी क्षेत्र के प्रमुख देशों के साथ उच्च स्तर पर लगातार संपर्क बनाए हुए है।

विशेषज्ञों का मानना है कि भारत अब पश्चिम एशिया को केवल ऊर्जा आपूर्ति के नजरिये से नहीं देखता। अब यह क्षेत्र भारत की सुरक्षा, व्यापार, निवेश और वैश्विक कूटनीति का केंद्रीय हिस्सा बन चुका है। इसी कारण भारत एक संतुलित और सक्रिय भूमिका निभाने की कोशिश कर रहा है।

डोभाल की यूएई यात्रा के पीछे एक और महत्वपूर्ण संदर्भ है। ईरान और अमेरिका के बीच संभावित दूसरे दौर की वार्ता को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है। इस बीच ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची रविवार को तीन दिनों में दूसरी बार पाकिस्तान पहुंचे। वहां उन्होंने पाकिस्तान के सेना प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर से मुलाकात की। हालांकि पाकिस्तान की ओर से इस बैठक पर आधिकारिक बयान सामने नहीं आया, लेकिन माना जा रहा है कि चर्चा का केंद्र अमेरिका और ईरान के बीच संभावित संवाद को आगे बढ़ाना था।

इस पूरे घटनाक्रम में भारत की भूमिका संतुलित और व्यावहारिक दिखती है। भारत के ईरान से भी संबंध हैं और अमेरिका से भी रणनीतिक साझेदारी है। वहीं यूएई और सऊदी अरब जैसे देशों के साथ भी भारत के रिश्ते मजबूत हैं। यही वजह है कि भारत क्षेत्रीय शक्ति संतुलन में एक भरोसेमंद और संवादप्रिय देश के रूप में देखा जा रहा है।

भारत की विदेश नीति पिछले कुछ वर्षों में अधिक सक्रिय हुई है। संकट के समय संवाद, संतुलन और संपर्क इसकी पहचान बने हैं। डोभाल जैसे वरिष्ठ अधिकारी की लगातार यात्राएं इस बात का संकेत हैं कि भारत सिर्फ घटनाओं को देख नहीं रहा, बल्कि हालात को समझते हुए अपनी भूमिका तय कर रहा है।

यूएई के साथ भारत के संबंधों में सुरक्षा सहयोग भी तेजी से बढ़ा है। आतंकवाद विरोधी प्रयास, खुफिया सूचनाओं का आदान प्रदान, साइबर सुरक्षा और समुद्री निगरानी जैसे क्षेत्रों में दोनों देश साथ काम कर रहे हैं। ऐसे में डोभाल और अल नाहयान की बैठक को सुरक्षा सहयोग के नजरिये से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

इस मुलाकात का एक संदेश यह भी है कि वैश्विक अनिश्चितता के दौर में भारत अपने भरोसेमंद साझेदारों के साथ खड़ा है। नई दिल्ली खाड़ी क्षेत्र के साथ अपने रिश्तों को और मजबूत करना चाहती है, क्योंकि आने वाले वर्षों में यही क्षेत्र वैश्विक अर्थव्यवस्था और रणनीतिक राजनीति का बड़ा केंद्र बना रहेगा।

पश्चिम एशिया में हालात तेजी से बदल रहे हैं। गठबंधन बदल रहे हैं। संवाद के नए रास्ते खुल रहे हैं। ऐसे समय में अजीत डोभाल की यूएई यात्रा केवल एक कूटनीतिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि भारत की व्यापक रणनीतिक सोच का हिस्सा है। यह बताता है कि भारत अब दूर से देखने वाला देश नहीं, बल्कि निर्णायक संवाद का सहभागी बन चुका है।