The court ordered a CBI and NIA probe into the judges' hostage-taking case.
आवाज द वॉयस/नई दिल्ली
उच्चतम न्यायालय ने मालदा जिले में सात न्यायिक अधिकारियों का घेराव किए जाने की बृहस्पतिवार को निंदा करते हुए कथित निष्क्रियता को लेकर पश्चिम बंगाल प्रशासन को कड़ी फटकार लगाई और केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) या राष्ट्रीय अन्वेषण अभिकरण (एनआईए) से मामले की स्वतंत्र जांच कराए जाने का आदेश दिया।
उच्चतम न्यायालय ने राज्य प्रशासन की तीखी आलोचना करते हुए कहा कि यह घटना ‘‘राज्य प्रशासन की पूर्ण विफलता को भी उजागर करती है।’’ उसने टिप्पणी की कि पश्चिम बंगाल ‘‘सबसे अधिक ध्रुवीकरण वाला राज्य’’ है।
न्यायालय ने निर्वाचन आयोग को निर्देश दिया कि वह राज्य में ‘‘पर्याप्त केंद्रीय बलों की मांग करे और उन्हें उन सभी स्थानों पर तैनात करे जहां मतदाता सूचियों की एसआईआर (विशेष गहन पुनरीक्षण) प्रक्रिया के तहत न्यायिक अधिकारी आपत्तियों का निपटारा कर रहे हैं।’’
उन्होंने कहा, ‘‘निर्वाचन आयोग को यह भी निर्देश दिया जाता है कि वह कल की घटना की जांच/पड़ताल किसी स्वतंत्र एजेंसी यानी सीबीआई या एनआईए को सौंपे। अनुपालन रिपोर्ट दाखिल की जाए। जिस एजेंसी को जांच सौंपी जाएगी, वह सीधे इस न्यायालय में प्रारंभिक रिपोर्ट दाखिल करने के लिए बाध्य होगी।
प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची एवं न्यायमूर्ति विपुल एम पंचोली की पीठ ने राज्य के मुख्य सचिव, पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) तथा मालदा के जिलाधिकारी और वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (एसएसपी) को ‘‘कारण बताओ नोटिस’’ जारी कर यह बताने को कहा कि ‘‘कलकत्ता उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से प्राप्त पत्र की सामग्री के आलोक में उनके खिलाफ उपयुक्त कार्रवाई क्यों न की जाए।’’
प्रधान न्यायाधीश ने इन सभी शीर्ष अधिकारियों को उस समय छह अप्रैल को ऑनलाइन पेश होने का निर्देश दिया जब पीठ मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की ओर से दायर याचिका समेत विभिन्न याचिकाओं पर सुनवाई करेगी।
पीठ ने कहा, “हम किसी को भी न्यायिक अधिकारियों में मनोवैज्ञानिक भय पैदा करने के लिए कानून अपने हाथ में लेने और हस्तक्षेप करने की अनुमति नहीं देंगे। यह आपराधिक अवमानना के बराबर है। यह राज्य प्रशासन की विफलता को भी उजागर करता है। मुख्य सचिव, गृह सचिव, डीजीपी और पुलिस अधीक्षक ने जिस तरह से काम किया, वह बेहद निंदनीय है। उन्हें यह बताना होगा कि सूचित किए जाने के बावजूद उन्होंने कोई प्रभावी कदम क्यों नहीं उठाया।’’