नई दिल्ली
सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका पर सुनवाई हुई, जिसमें Muslim Personal Law (Shariat) Application Act, 1937 के कुछ प्रावधानों को असंवैधानिक घोषित करने की मांग की गई है। याचिका में कहा गया है कि ये प्रावधान मुस्लिम महिलाओं के साथ भेदभाव करते हैं।
वरिष्ठ वकील Prashant Bhushan ने अदालत में दलील दी कि यदि इन प्रावधानों को निरस्त किया जाता है, तो अदालत इस स्थिति में Indian Succession Act, 1925 को मुस्लिम समुदाय पर लागू करने का निर्देश दे सकती है।
इस पर भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) ने टिप्पणी की कि ऐसा करना न्यायपालिका द्वारा कानून बनाने (legislating) के दायरे में आ सकता है।भूषण ने जवाब दिया कि यह कानून बनाना नहीं बल्कि “रीडिंग डाउन” (reading down) होगा, यानी प्रावधानों की सीमित व्याख्या करना।
सुनवाई के दौरान जस्टिस बागची ने कहा कि “रीडिंग डाउन” का मानदंड काफी ऊंचा होता है, खासकर तब जब अदालत से किसी मौजूदा प्रावधान को हटाने की मांग की जा रही हो। उन्होंने कहा कि कुछ मामलों में अदालत खाली क्षेत्र को भरती है, लेकिन यहां पहले से शरिया कानून मौजूद है।
भूषण ने तर्क दिया कि महिलाओं को पुरुषों के मुकाबले आधा या उससे भी कम हिस्सा देना स्पष्ट रूप से भेदभावपूर्ण है। उन्होंने कहा कि यह एक सिविल मामला है और Article 25 of the Constitution of India के तहत संरक्षित “आवश्यक धार्मिक प्रथा” (essential religious practice) के दायरे में नहीं आता।