स्वार्थ और वर्चस्व की चाह दुनिया में संघर्षों की जड़ है: भागवत

Story by  PTI | Published by  [email protected] | Date 20-03-2026
Selfishness and desire for dominance are the root of conflicts in the world: Bhagwat
Selfishness and desire for dominance are the root of conflicts in the world: Bhagwat

 

आवाज द वॉयस/नई दिल्ली 

 
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रमुख मोहन भागवत ने शुक्रवार को कहा कि दुनिया में संघर्षों की जड़ स्वार्थ एवं वर्चस्व की चाह है तथा स्थायी शांति केवल एकता, अनुशासन और धर्म के पालन से ही प्राप्त की जा सकती है।
 
भागवत ने नागपुर में एक सभा को संबोधित करते हुए कहा कि दुनिया 2,000 वर्षों से संघर्षों के समाधान के लिए विभिन्न विचारों के साथ प्रयोग करती रही है लेकिन उसे खास सफलता नहीं मिली।
 
उन्होंने कहा कि धार्मिक असहिष्णुता, जबरन धर्म परिवर्तन और श्रेष्ठता एवं हीनता के विचार अब भी मौजूद हैं।
 
आरएसएस प्रमुख ने शहर में विश्व हिंदू परिषद (विहिप) के विदर्भ प्रांत कार्यालय की आधारशिला रखने के बाद इस सभा को संबोधित करते हुए कहा कि भारत का प्राचीन ज्ञान सिखाता है कि ‘‘सभी जुड़े हुए हैं और एक हैं।’’
 
उन्होंने संघर्ष से सौहार्द और सहयोग की ओर बढ़ने का आह्वान किया।
 
उन्होंने कहा कि आधुनिक विज्ञान भी धीरे-धीरे इसी समझ की ओर बढ़ रहा है।
 
आरएसएस प्रमुख ने कहा कि दुनिया में संघर्षों की जड़ स्वार्थ एवं वर्चस्व की चाह है और स्थायी शांति केवल एकता, अनुशासन और धर्म के पालन से ही हासिल की जा सकती है।
 
भागवत ने आचरण के महत्व पर जोर देते हुए कहा कि धर्म केवल शास्त्रों तक सीमित नहीं रह सकता बल्कि यह लोगों के व्यवहार में भी दिखना चाहिए।
 
उन्होंने कहा कि अनुशासन एवं नैतिक मूल्यों के पालन के लिए निरंतर अभ्यास की जरूरत होती है और इसमें अक्सर व्यक्तिगत कठिनाई भी झेलनी पड़ती हैं।
 
भागवत ने कहा कि भारत मानवता में विश्वास करता है जबकि अन्य देश अस्तित्व के लिए संघर्ष और ताकतवर के टिके रहने के सिद्धांत को मानते हैं।
 
उन्होंने कहा कि दुनिया को संघर्ष नहीं, बल्कि सौहार्द की जरूरत है।