बच्चों के अपहरण मामलों में तय प्रक्रिया पर SC का नोटिस

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  onikamaheshwari | Date 10-09-2026
SC issues notice on PIL seeking uniform mechanism, time-bound probes in child kidnapping cases
SC issues notice on PIL seeking uniform mechanism, time-bound probes in child kidnapping cases

 

नई दिल्ली 
 
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को केंद्र और राज्य सरकारों को एक PIL (जनहित याचिका) पर नोटिस जारी किया। इस याचिका में बच्चों के अपहरण और अगवा किए जाने के मामलों की जांच के लिए पूरे देश में एक जैसा सिस्टम बनाने की मांग की गई है, जिसमें तय समय में जांच और तेज़ी से सुनवाई शामिल है। भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) की बेंच (जिसमें जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना शामिल थे) ने केंद्र, राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों से चार हफ़्ते में जवाब मांगा।
 
वकील अश्विनी कुमार उपाध्याय द्वारा दायर इस याचिका में केंद्र और राज्यों को ऐसे मामलों के लिए स्टैंडर्ड सवाल और खास जांच प्रक्रियाएं बनाने का निर्देश देने की मांग की गई थी। सुनवाई के दौरान, जस्टिस मोहना ने कहा कि सरकार पहले ही कई पहल और योजनाएं शुरू कर चुकी है, जैसे 'बेटी बचाओ', और कोर्ट ने भी बच्चों की सुरक्षा को लेकर कई निर्देश जारी किए हैं। बेंच ने सवाल किया कि क्या और निर्देश जारी करने की ज़रूरत है कि जांच एजेंसियां ​​अपहरण के मामलों की जांच कैसे करें।
 
हालांकि, उपाध्याय ने कहा कि पिछले कुछ सालों में मानव तस्करी शोषण के कई रूपों में बदल गई है और बच्चों की तस्करी काफी बढ़ गई है। उन्होंने तर्क दिया कि बच्चों की तस्करी यौन शोषण, जबरन मज़दूरी, भीख मांगने, छोटे-मोटे अपराधों, सशस्त्र संघर्ष, बाल विवाह और बाल श्रम के लिए की जाती है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि जबरन धर्म परिवर्तन के मकसद से बच्चों को अगवा किया जा रहा है। याचिका में मांग की गई कि जांच ACP/SHO से नीचे के रैंक के अधिकारी न करें और अपहरण के मामलों को एक साल के भीतर निपटाने के लिए सांसदों और विधायकों के लिए बनी स्पेशल कोर्ट की तर्ज़ पर खास कोर्ट बनाए जाएं।
 
याचिका में दोषियों और उनके परिवार के सदस्यों की चल और अचल संपत्ति ज़ब्त करने और मनी लॉन्ड्रिंग, बेनामी संपत्ति और काले धन से जुड़े कानूनों को लागू करने की भी मांग की गई। इसमें यह भी मांग की गई कि अपहरण के मामलों में सज़ा एक साथ (concurrent) चलने के बजाय एक के बाद एक (consecutive) दी जाए ताकि लोगों में डर पैदा हो और वे ऐसा करने से बचें। याचिका में आरोप लगाया गया कि FIR दर्ज करने और लापता बच्चों से जुड़ी शिकायतों की जांच में देरी से उन्हें ढूंढने में रुकावट आती है और वे तस्करी, यौन शोषण, जबरन मज़दूरी और गैर-कानूनी गोद लेने जैसी स्थितियों का शिकार हो सकते हैं।
 
इसमें यह भी आरोप लगाया गया कि लापता बच्चों से जुड़ी शिकायतों को कभी-कभी FIR के बजाय सिर्फ़ "लापता" या "गुमशुदा" रिपोर्ट के तौर पर दर्ज किया जाता है, जिससे पूरी आपराधिक जांच में देरी होती है। याचिकाकर्ता ने अपनी याचिका में हाल की कई घटनाओं का ज़िक्र करते हुए आरोप लगाया कि बच्चों की तस्करी और गैर-कानूनी गोद लेने के काम में शामिल संगठित नेटवर्क राज्यों की सीमाओं के पार काम करते हैं, जिसके लिए पुलिस बलों और विशेष एजेंसियों के बीच बेहतर तालमेल की ज़रूरत है। याचिकाकर्ता ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों, शिक्षा, कानून और न्याय तथा गृह मामलों के केंद्रीय मंत्रालयों और विधि आयोग को प्रतिवादी बनाया है।