आवाज द वॉयस/नई दिल्ली
कभी आदिवासी घरों की मिट्टी की दीवारों तक सीमित रहने वाली पारंपरिक पिथौरा चित्रकला अब वैश्विक बाजार में अपनी पहचान बना रही है और आदिवासी कलाकारों के लिए आजीविका का एक स्थायी माध्यम बन गई है।
एक आधिकारिक विज्ञप्ति के अनुसार, यह प्राचीन कला 29 जून से तीन जुलाई तक वडोदरा स्थित जीएसएफसी विश्वविद्यालय में आयोजित होने वाले ‘वाइब्रेंट’ गुजरात क्षेत्रीय सम्मेलन (वीजीआरसी) में प्रदर्शित की जाएगी। इस दौरान केंद्र सरकार की 'वोकल फॉर लोकल' पहल के तहत मध्य गुजरात के अन्य भौगोलिक संकेतक (जीआई) टैग प्राप्त उत्पादों को भी प्रदर्शित किया जाएगा।
पारंपरिक रूप से छोटाउदेपुर, वडोदरा और पंचमहल जिलों की राठवा, भील और भीलाला जनजातियों द्वारा बनाई जाने वाली पिथौरा चित्रकला मिट्टी की दीवारों पर धार्मिक अनुष्ठानों के हिस्से के रूप में उकेरी जाती थी। इसका उद्देश्य मनुष्य, प्रकृति और ईश्वर के बीच सामंजस्य एवं संतुलन की कामना करना होता है।
गुजरात राज्य हथकरघा एवं हस्तशिल्प विकास निगम लिमिटेड (जीएसएचएचडीसी) अपने 'गर्वी गुर्जरी' ब्रांड के माध्यम से इस पारंपरिक कला को बढ़ावा दे रहा है। निगम सीधे कलाकारों से पिथौरा चित्र खरीदता है, डिजाइन विकास कार्यशालाओं का आयोजन करता है, परिवहन और स्टॉल के लिए आर्थिक सहायता उपलब्ध कराता है तथा कलाकारों को प्रदर्शनियों में भाग लेने के अवसर भी प्रदान करता है।
विज्ञप्ति में कहा गया है, ‘‘पिछले पांच वर्षों में गुजरात राज्य हथकरघा एवं हस्तशिल्प विकास निगम लिमिटेड (जीएसएचएचडीसी) ने पिथौरा कलाकारों से सीधे 6.2 लाख रुपये मूल्य की कलाकृतियां खरीदी हैं। इससे कलाकारों की आय में 15 से 30 प्रतिशत तक की निरंतर वृद्धि दर्ज की गई है।’’
छोटाउदेपुर के पिथौरा कलाकार नारण राठवा ने कहा, ‘‘गर्वी गुर्जरी द्वारा आयोजित कार्यशालाएं, प्रदर्शनियां और मेले हमारे लिए बहुत लाभदायक साबित हुए हैं। पहले हमारी आजीविका पूरी तरह गांव में मिलने वाले काम पर निर्भर थी। अब 'गर्वी गुर्जरी' के माध्यम से हमें व्यापक पहचान मिली है, जिससे हमारी आय बढ़ी है और कमाई के नए अवसर भी खुले हैं।’’
पद्मश्री से सम्मानित वरिष्ठ पिथौरा कलाकार परेश राठवा ने 'गर्वी गुर्जरी' को गुजरात का गौरव बताते हुए कहा कि इस पहल ने न केवल पिथौरा कला को देश-दुनिया में पहचान दिलाई है, बल्कि उन्हें और उनके साथी कलाकारों को आत्मनिर्भर भी बनाया है।
उन्होंने कहा, ‘‘ इस संस्था ने हमारे आदिवासी समाज की गौरवशाली सांस्कृतिक विरासत और हमारी मिट्टी की अनूठी खुशबू को दुनिया के कोने-कोने तक पहुंचाने का ऐतिहासिक और सराहनीय कार्य किया है।’’