नई दिल्ली
मुहर्रम के अवसर पर जारी एक बयान में मौलाना हसनअली राजानी ने इमाम हुसैन की कुर्बानी, ईरान की नीतियों और वर्तमान अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों को लेकर कई विवादित टिप्पणियां की हैं। उन्होंने कहा कि इमाम हुसैन की शहादत का उद्देश्य इस्लामी मूल्यों और धार्मिक आचरण की रक्षा करना था तथा उनकी कुर्बानी को किसी समकालीन राजनीतिक या आर्थिक मुद्दे से जोड़ना उचित नहीं है।
अपने बयान में मौलाना राजानी ने कहा कि इमाम हुसैन ने नमाज़ और रोज़े जैसे धार्मिक सिद्धांतों की रक्षा के लिए अपने परिवार और साथियों के साथ सर्वोच्च बलिदान दिया था। उनके अनुसार, इस ऐतिहासिक घटना की तुलना वर्तमान समय की राजनीतिक या आर्थिक परिस्थितियों से नहीं की जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि उनकी दृष्टि में इमाम हुसैन की कुर्बानी का संदेश न्याय, सत्य और सिद्धांतों पर अडिग रहने का प्रतीक है।
मौलाना राजानी ने ईरान की नीतियों पर भी तीखी टिप्पणी करते हुए दावा किया कि वर्तमान संघर्षों के पीछे आर्थिक और राजनीतिक हित प्रमुख हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि ऐसे मुद्दों को धार्मिक भावनाओं से जोड़कर प्रस्तुत करना उचित नहीं है और इससे वैश्विक स्तर पर मुसलमानों की छवि प्रभावित हो सकती है। यह उनके व्यक्तिगत विचार हैं, जिन पर अलग-अलग मत हो सकते हैं।
उन्होंने आगे कहा कि किसी भी देश या राजनीतिक शक्ति के समर्थन को धार्मिक आस्था का पर्याय नहीं बनाया जाना चाहिए। उनके अनुसार, अंतरराष्ट्रीय संबंधों और राजनीतिक फैसलों का मूल्यांकन तथ्यों और राष्ट्रीय हितों के आधार पर होना चाहिए, न कि केवल भावनात्मक या सांप्रदायिक दृष्टिकोण से।
मुहर्रम के महत्व पर बोलते हुए मौलाना राजानी ने कहा कि यह महीना आत्मचिंतन, त्याग और नैतिक मूल्यों को याद करने का अवसर है। उन्होंने लोगों से अपील की कि वे इमाम हुसैन की शहादत के संदेश को समझें और उसे सामाजिक न्याय, ईमानदारी तथा मानवता की सेवा से जोड़कर देखें।
अपने बयान में उन्होंने धार्मिक आयोजनों के दौरान बच्चों और युवाओं की सुरक्षा तथा जिम्मेदार निगरानी की आवश्यकता पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि किसी भी धार्मिक या सामाजिक कार्यक्रम में आयोजकों और अभिभावकों को सुरक्षा और जवाबदेही के उचित मानकों का पालन करना चाहिए, ताकि सभी प्रतिभागियों का वातावरण सुरक्षित और विश्वासपूर्ण बना रहे।
मौलाना राजानी ने कहा कि समाज में धार्मिक नेतृत्व की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है और इसलिए धार्मिक संस्थाओं तथा आयोजनों में पारदर्शिता, नैतिक आचरण और जवाबदेही सुनिश्चित की जानी चाहिए। उनके अनुसार, धार्मिक मूल्यों का सम्मान तभी संभव है जब सार्वजनिक जीवन में अनुशासन और जिम्मेदारी को प्राथमिकता दी जाए।
उन्होंने अंत में लोगों से अपील की कि मुहर्रम के अवसर पर नफरत या विवाद के बजाय इमाम हुसैन के त्याग, न्याय और इंसाफ के संदेश को आगे बढ़ाया जाए। साथ ही उन्होंने कहा कि धार्मिक आस्था का उपयोग राजनीतिक या व्यक्तिगत हितों के लिए नहीं होना चाहिए और समाज को आपसी सम्मान तथा सद्भाव के साथ आगे बढ़ना चाहिए।
नोट: इस बयान में व्यक्त विचार मौलाना हसनअली राजानी के बताए गए दावे और राय हैं। विभिन्न मुद्दों पर अन्य पक्षों के विचार अलग हो सकते हैं