Indian workplaces face widespread compliance gaps despite corporate efforts: Report
नई दिल्ली
टीमलीज रेगटेक की एक रिपोर्ट के मुताबिक, भारतीय वर्कप्लेस पर रेगुलेटरी कंप्लायंस के बड़े रिस्क बने हुए हैं। 17 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में बड़ी कंपनियों द्वारा चलाई जा रही 52 साइट्स के ऑडिट में नॉन-कम्प्लायंस के 4,694 मामले सामने आए हैं। रिपोर्ट में फैक्ट्रियां, वेयरहाउस, कॉर्पोरेट ऑफिस और खदानें शामिल थीं। ऑडिट में शामिल हर साइट पर कंप्लायंस में कमी थी, हर वर्कप्लेस पर औसतन लगभग 90 कमियां थीं। नतीजे बताते हैं कि बिजनेस के लिए संभावित कानूनी और फाइनेंशियल रिस्क हो सकते हैं, जिसमें कंपनी के डायरेक्टर और सीनियर ऑफिसर तक के रिस्क शामिल हैं।
रिपोर्ट में बताया गया है कि पहचानी गई कमियों में से लगभग 70 प्रतिशत सज़ा वाले अपराध थे, जबकि 46 प्रतिशत में जेल हो सकती थी। इसके अलावा, 29 प्रतिशत में डायरेक्टर या सीनियर ऑफिसर का नाम पर्सनली लिया गया, जबकि 31 प्रतिशत पर जुर्माना लगाया गया जो हर गुजरते दिन के साथ बढ़ता जा रहा है। टीमलीज रेगटेक के को-फाउंडर और CEO, ऋषि अग्रवाल ने कहा, "हम जिस भी लीडरशिप टीम से मिलते हैं, वह मानती है कि वे कम्प्लायंस कर रहे हैं। फिर भी, हमने जिन भी साइटों का ऑडिट किया है, उनमें कम्प्लायंस में बड़ी कमियां सामने आई हैं।" "हर बोर्ड के लिए सवाल यह है कि क्या वह इन कमियों को पहले ढूंढता है या कोई इंस्पेक्टर, कस्टमर या इन्वेस्टर ढूंढता है।"
रिपोर्ट में इन कमियों के पीछे एक मुख्य कारण के तौर पर रेगुलेटरी कॉम्प्लेक्सिटी की पहचान की गई है। इसमें कहा गया है कि भारतीय कंपनियों को सरकार के तीन लेवल, कानून की सात कैटेगरी, 21 तरह के रेगुलेटरी इंस्ट्रूमेंट और 41 तरह के कम्प्लायंस से निपटना पड़ता है। 3,756 यूनियन, राज्य और लोकल गवर्नमेंट वेबसाइटों पर ज़िम्मेदारियां भी अक्सर बदल सकती हैं, जबकि राज्य और लोकल बॉडी अपनी खुद की लिमिट, फॉर्म, सैलरी स्ट्रक्चर और पेनल्टी तय करती हैं।
रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि लेबर और एनवायरनमेंट कानूनों में पहचानी गई कमियों का 92 परसेंट हिस्सा था, जबकि सिर्फ़ 10 कानूनों का कुल मिलाकर लगभग 60 परसेंट हिस्सा था। नतीजों से पता चलता है कि कम्प्लायंस रिस्क सभी कानूनों में बराबर फैले होने के बजाय खास रेगुलेटरी एरिया में ही केंद्रित हैं।
टीमलीज़ रेगटेक ने कहा कि स्टडी में शामिल सभी कंपनियों ने कम्प्लायंस ऑडिट करवाए थे। इसलिए, नतीजे स्टडी में पहचाने गए कम से कम एक्सपोज़र को दिखाते हैं, न कि सभी भारतीय वर्कप्लेस पर कम्प्लायंस गैप के अनुमान को। रिपोर्ट में सलाह दी गई है कि कंपनियाँ हर लागू कानून को हर साइट पर मैप करें और उनके कानूनी नतीजों की गंभीरता के हिसाब से गैप को ठीक करें। इसमें रेगुलर ऑन-ग्राउंड कम्प्लायंस ऑडिट की भी बात कही गई है जिसमें कॉन्ट्रैक्टर और वेयरहाउस शामिल हैं।