1823 का अध्यादेश: भारतीय पत्रकारिता पर नियंत्रण का पहला प्रयास

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 27-10-2026
The Ordinance of 1823: The First Attempt to Control Indian Journalism
The Ordinance of 1823: The First Attempt to Control Indian Journalism

 

साकिब सलीम

9 जनवरी 1823 को लॉर्ड हेस्टिंग्स (Marquess of Hastings) इंग्लैंड के लिए रवाना हुए, और जॉन एडम (John Adam) कार्यवाहक गवर्नर-जनरल बने। इससे एक साल पहले, 1822 में, एडम ने 'कलकत्ता जर्नल' के संपादक जेम्स सिल्क बकिंघम को भारत से निर्वासित करने का आग्रह किया था, लेकिन हेस्टिंग्स ने इसे खारिज कर दिया था।

अब प्रशासनिक शक्ति एडम के हाथों में थी। कुछ ही हफ्तों के भीतर उसने सुनिश्चित किया कि भारत में रहने का बकिंघम का लाइसेंस रद्द कर दिया जाए। बिना किसी मुकदमे के उसे देश से निकाल दिया गया। यह कार्रवाई रेवरेंड जेम्स ब्राइस (एक प्रेसबाइटेरियन पादरी) की सरकारी क्लर्क के पद पर हुई नियुक्ति पर छापे गए एक व्यंग्यात्मक लेख के विरोध में की गई थी।

'कलकत्ता जर्नल' को बंद कर दिया गया। 14 मार्च को एडम की काउंसिल ने एक अध्यादेश जारी किया, जिसके तहत बंगाल के हर समाचार प्रकाशन के लिए लाइसेंस अनिवार्य कर दिया गया। 4 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट ने इसे कानून के रूप में पंजीकृत कर लिया।

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पहला प्रतिबंध नहीं, बल्कि पहला कानून

इंग्लिश ईस्ट इंडिया कंपनी भारत में एक व्यापारी के रूप में आई थी, लेकिन वह लंबे समय से यह तय करती आ रही थी कि कलकत्ता (कोलकाता) के लोग क्या पढ़ सकते हैं।1782 में 'हिकीज बंगाल गजट' को बंद कर दिया गया था। इसके संपादक पर जुर्माना लगाया गया और उसे जेल में डाल दिया गया। इसके अलावा 1794 और 1798 में भी संपादकों को देश से निकाला गया था।

1799 में, लॉर्ड वेलेज़ली ने आदेश दिया कि प्रकाशन से पहले हर प्रूफ (मंजूरी) को स्वीकृति के लिए प्रस्तुत किया जाए। 1818 में हेस्टिंग्स ने उस सेंसरशिप को समाप्त कर दिया, लेकिन प्रतिबंधित विषयों की सूची बनाए रखी—हालांकि उसके नियमों के पास कोई कानूनी ताकत नहीं थी।

देश से निकालने (देस निकाला) की सजा भारतीय संपादकों या भारत में जन्मे यूरोपीय लोगों पर लागू नहीं हो सकती थी। 1820 के दशक की शुरुआत तक भारतीय बंगाली और फ़ारसी में पत्रिकाएँ प्रकाशित करने लगे थे। बकिंघम अक्सर अपने अख़बार में इन अख़बारों के अंश पुनः छापते थे।

1823 के अध्यादेश के बाद, हर समाचार पत्र के लिए लाइसेंस अनिवार्य हो गया। गवर्नर-जनरल जब चाहे इसे रद्द कर सकता था, और बिना लाइसेंस के छपाई करने पर चार सौ रुपये का जुर्माना लग सकता था।

यह एक वैचारिक बदलाव था। औपनिवेशिक शासन को एक स्वतंत्र प्रेस के बजाय एक नियंत्रित (नियमित) प्रेस की आवश्यकता थी।

कंपनी को किस बात का डर था?

कंपनी की ताकत एक ऐसी सेना पर टिकी थी जिसमें बड़ी संख्या में भारतीय सैनिक शामिल थे। प्रशासन को डर था कि यूरोपीय अधिकारी, बकिंघम के अख़बार के ज़रिए अपनी शिकायतें उठाकर सैनिकों के रैंक तक असंतोष फैला सकते हैं।

एडम ने चेतावनी दी कि इस तरह की अपीलें "सैन्य अनुशासन के सभी सिद्धांतों को नष्ट कर देंगी।" मद्रास के अधिकारियों ने 1807 में ही कह दिया था कि भारतीय पाठक समाचार पत्रों में छपी सामग्री का सही मूल्यांकन नहीं कर सकते और वे भ्रमित हो सकते हैं।

1822 में मद्रास के गवर्नर थॉमस मुनरो ने माना कि एक स्वतंत्र प्रेस और "विदेशियों का शासन" एक साथ नहीं चल सकते। बंगाल के पास अपने कार्यपालक (Executive) पर अंकुश लगाने के लिए कोई विधायिका नहीं थी, और बकिंघम का तर्क था कि यही कारण है कि प्रेस को यह भूमिका निभानी चाहिए।

राजा राममोहन राय का प्रतिवाद

भारतीयों ने इस अध्यादेश को चुपचाप स्वीकार नहीं किया। बंगाली, फ़ारसी और अंग्रेज़ी की कम से कम पाँच पत्रिकाओं से जुड़े राजा राममोहन राय ने अध्यादेश के सुप्रीम कोर्ट पहुँचने के दो दिन बाद ही एक विरोध पत्र (स्मृति पत्र) दायर किया।

द्वारकानाथ टैगोर, प्रसन्न कुमार टैगोर, चंद्र कुमार टैगोर, हरचंद्र घोष और गौरी चरण बनर्जी ने उनके साथ इस पर हस्ताक्षर किए। इस पत्र में ब्रिटिश शासन के प्रति निष्ठा व्यक्त करते हुए भी सिद्धांतों के आधार पर तर्क दिए गए थे।

इसमें कहा गया कि हिंदुओं में स्वेच्छा से ली जाने वाली शपथ के प्रति गहरा संकोच (पूर्वाग्रह) होता है, और भारतीयों पर कभी भी प्रेस का दुरुपयोग करने का आरोप नहीं लगाया जा सकता। राममोहन राय की जीवनी लेखक सोफिया डोबसन कॉलेट ने इस ज्ञापन की तुलना जॉन मिल्टन की प्रसिद्ध कृतिAreopagitica (स्वतंत्र अभिव्यक्ति के समर्थन में लिखा गया निबंध) से की। न्यायाधीश सर फ्रांसिस मैकनॉटन ने यह स्वीकार करते हुए इसे खारिज कर दिया कि वे पहले ही सरकार को अपनी स्वीकृति देने का वचन दे चुके थे। यह अध्यादेश 4 अप्रैल को पंजीकृत हो गया।

इसके विरोध में, राममोहन राय ने अपनी फ़ारसी पत्रिका'मिरात-उल-अखबार' (खबरों का दर्पण) को बंद कर दिया। इसके अंतिम अंक में उन्होंने इसके तीन कारण दिए:

  1. मुख्य सचिव के किसी यूरोपीय मित्र के लिए लाइसेंस प्राप्त करना आसान था, लेकिन एक साधारण भारतीय को बड़े अधिकारियों के द्वारपालों से विनती करते हुए भीड़भरे पुलिस कोर्ट के चक्कर काटने पड़ते थे।
  2. खुली अदालत में हलफनामा (शपथ पत्र) देना संभ्रांत और आदरणीय लोगों के लिए अपमानजनक माना जाता था।
  3. जो लाइसेंस किसी भी क्षण रद्द किया जा सकता हो, वह किसी संपादक को मानसिक शांति नहीं दे सकता, क्योंकि सच को हमेशा सरकार को खुश करने वाले शब्दों में नहीं कहा जा सकता।

राममोहन राय ने हाफ़िज़ के एक शेर के साथ अपनी बात समाप्त की, जिसमें उन्होंने लिखा कि गरीब एकांतवासी को चुप ही रहना चाहिए, क्योंकि"राजकुमार अपनी नीतियों के रहस्य खुद जानते हैं।"यह शासकों की ही विनम्र भाषा में दिया गया एक राजनीतिक जवाब था।

इसके बाद राय ने लंदन में 'किंग इन काउंसिल' (प्रिवी काउंसिल) में अपील की। उन्होंने लिखा कि एक स्वतंत्र प्रेस ने"दुनिया के किसी भी हिस्से में कभी क्रांति उत्पन्न नहीं की है", क्योंकि जो शिकायतें सरकार तक पहुँचती हैं, उनका निवारण सरकार खुद कर सकती है। उन्होंने याद दिलाया कि पूर्व मुस्लिम शासकों के अधीन भारतीयों ने सर्वोच्च पद संभाले, सेनाओं का नेतृत्व किया और प्रांतों पर शासन किया।

यहाँ तक कि बुद्धिमान मुग़ल शहज़ादे भी, भले ही वे निरंकुश थे, अपने प्रांतीय गवर्नरों के आवासों पर एक समाचार लेखक (अखबार नवीस) और एक गुप्त रिपोर्टर (खुफिया नवीस) तैनात रखते थे, ताकि कोई भी अपनी रिपोर्ट खुद तैयार न कर सके।

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रद्द होने के बाद भी जीवित रहा लाइसेंस

लंदन में 'कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स' ने एडम की नीति को मंज़ूरी दी और प्रिवी काउंसिल ने भी इस पर सहमति जताई। बकिंघम इस लड़ाई को संसद तक ले गए, जिसकी एक प्रवर समिति (Select Committee) ने 1834 में उनके अख़बार के दमन पर अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की।

बाद के गवर्नर-जनरल, जैसे एमहर्स्ट या बैंटिंक ने इस अध्यादेश को सख्ती से लागू नहीं किया। बैंटिंक ने 1829 में ध्यान दिलाया कि इस तरह के हस्तक्षेप से संपादकों को केवल प्रसिद्धि मिलती है।

1835 में चार्ल्स मेटकाफ ने, मैकाले की सहायता से, 'एक्ट XI' (Act XI) के ज़रिए एडम के लाइसेंसिंग कानून को समाप्त कर दिया। भारतीयों ने उनके सम्मान में चंदा इकट्ठा करके कलकत्ता में 'मेटकाफ हॉल' का निर्माण कराया। हालांकि, लंदन में कंपनी के अधिकारियों ने बाद में मेटकाफ को इसके लिए दंडित किया।

1857 में, कलकत्ता के द्विभाषी अख़बार 'समाचार सुधावर्षण' द्वारा प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की रिपोर्टिंग के बाद लॉर्ड कैनिंग ने 1823 के नियमों के कड़े प्रावधानों को फिर से लागू कर दिया।

14 मार्च 1878 को, लॉर्ड लिटन ने भारतीय भाषाई अख़बारों के खिलाफ'वर्नाक्युलर प्रेस एक्ट' लागू किया। 1823 का मूल सिद्धांत कि औपनिवेशिक शासन को एक नियंत्रित प्रेस की आवश्यकता है हर निरसन के बाद भी जीवित रहा।

राममोहन राय के विरोध-पत्र (Memorials) जूरी एक्ट, करों और शिक्षा के मुद्दों पर भारतीय विरोध के लिए एक आदर्श ढाँचा (Template) बन गए। एडम केवल एक संपादक को खामोश करना चाहता था, लेकिन उसने जिस विरोध को जन्म दिया, उसने एक ऐसे सार्वजनिक मंच (Public Sphere) का निर्माण किया जिसने ब्रिटिश साम्राज्य को उसी की अदालतों में और उसी के अधिकारों की भाषा में चुनौती दी।

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