मालदा के ब्लडमैन मिस्बाहुल आलम जेम्स, 400 से अधिक मरीजों की मदद

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 27-10-2026
Misbahul Alam James, the 'Bloodman' of Malda, has helped over 400 patients.
Misbahul Alam James, the 'Bloodman' of Malda, has helped over 400 patients.

 

तरुण नंदी / कोलकाता

रात हो या दिन, सुबह हो या देर शाम। फोन की घंटी बजते ही मिस्बाहुल आलम जेम्स की नजरें मोबाइल पर टिक जाती हैं। दूसरी तरफ से अगर किसी मरीज के लिए खून की जरूरत की खबर आती है, तो वह अपनी व्यस्तता भूलकर मदद के लिए निकल पड़ते हैं। उनके लिए यह महज एक फोन कॉल नहीं होता, बल्कि किसी की जिंदगी बचाने की पुकार होती है।

हाल ही में ऐसा ही एक फोन उनके पास आया। बताया गया कि थैलेसीमिया से पीड़ित 11 वर्षीय बच्चे को खून की जरूरत है। बच्चा काफी समय से रक्त मिलने का इंतजार कर रहा था। खबर मिलते ही मिस्बाहुल ने देर नहीं की। उन्होंने अपने जरूरी काम छोड़े और तुरंत चंचल सुपर स्पेशलिटी अस्पताल पहुंच गए। उनका मकसद साफ था। बच्चे को समय पर खून मिले और उसके परिवार को कुछ राहत मिल सके।

पश्चिम बंगाल के मालदा जिले में यह कोई नई बात नहीं है। जरूरतमंद मरीजों के लिए मिस्बाहुल आलम जेम्स लंबे समय से इसी तरह सक्रिय हैं। कई परिवारों के लिए वह ऐसे व्यक्ति बन चुके हैं, जिनसे मुश्किल वक्त में मदद की उम्मीद की जाती है। लोग उन्हें प्यार से ‘ब्लडमैन’ कहते हैं। यह नाम उनके लिए किसी पुरस्कार से कम नहीं है। इसके पीछे वर्षों की मेहनत, लोगों से संपर्क और जरूरतमंदों के प्रति जिम्मेदारी की भावना है।

मालदा में जरूरतमंद मरीजों के भरोसे का नाम

मिस्बाहुल आलम जेम्स मालदा जिले के रतुआ एक ब्लॉक के भादो गांव के रहने वाले हैं। उनका सामाजिक कार्य मुख्य रूप से चंचल उपमंडल और आसपास के इलाकों में फैला हुआ है। जब किसी परिवार में कोई सदस्य गंभीर रूप से बीमार पड़ता है और डॉक्टर खून की व्यवस्था करने को कहते हैं, तब परिवार के सामने कई तरह की परेशानियां खड़ी हो जाती हैं।

किसी को रक्त समूह की जानकारी नहीं होती। किसी के पास संभावित रक्तदाताओं के संपर्क नंबर नहीं होते। कई बार परिचितों से संपर्क करने के बाद भी समय पर मदद नहीं मिलती। ऐसी परिस्थितियों में मिस्बाहुल लोगों की सहायता के लिए आगे आते हैं।

उनका काम केवल रक्तदान करने तक सीमित नहीं है। वह जरूरत के मुताबिक रक्तदाता तलाशते हैं, उनसे संपर्क करते हैं और उन्हें अस्पताल तक पहुंचाने की कोशिश करते हैं। इस प्रक्रिया में समय और धैर्य दोनों की जरूरत होती है। मरीज के परिजनों को भरोसा दिलाना भी जरूरी होता है कि उनकी समस्या को गंभीरता से लिया जा रहा है।

मिस्बाहुल के लिए किसी अनजान व्यक्ति की मदद करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है, जितना अपने किसी परिचित की सहायता करना। यही सोच उन्हें लगातार सक्रिय रखती है।

2018 में पहली बार किया रक्तदान

मिस्बाहुल की रक्तदान यात्रा वर्ष 2018 में शुरू हुई। उस समय वह 18 वर्ष के हुए थे। समाज के लिए कुछ करने की इच्छा उन्हें अपने दोस्तों के साथ सैमसी यूनाइटेड यंग्स क्लब के रक्तदान शिविर तक ले गई।वहीं उन्होंने पहली बार रक्तदान किया। यह उनके जीवन का एक महत्वपूर्ण अनुभव था। इसी दौरान उन्हें अपने रक्त समूह के बारे में भी पता चला। उनका ब्लड ग्रुप ए है।

पहली बार रक्तदान करने के बाद उन्हें जो संतोष मिला, उसने उनके भीतर एक नई प्रेरणा पैदा की। उन्हें महसूस हुआ कि रक्तदान किसी जरूरतमंद व्यक्ति के लिए जीवन बचाने का माध्यम बन सकता है। इसके बाद उन्होंने नियमित रूप से रक्तदान करने के साथ दूसरों को भी इसके लिए प्रेरित करना शुरू कर दिया।

शुरुआत में उनका दायरा मित्रों और परिचितों तक सीमित था। वह लोगों को रक्तदान के महत्व के बारे में बताते थे। धीरे धीरे उनके संपर्क बढ़ने लगे। दोस्तों के माध्यम से नए रक्तदाताओं के नंबर मिलने लगे। सोशल मीडिया, खासकर फेसबुक, जरूरतमंद मरीजों और संभावित रक्तदाताओं को जोड़ने का एक महत्वपूर्ण माध्यम बन गया।इस तरह एक युवा का व्यक्तिगत प्रयास धीरे धीरे सामाजिक अभियान में बदलने लगा।

400 से अधिक मरीजों तक पहुंची मदद

मिस्बाहुल के अनुसार, वह अब तक 400 से अधिक मरीजों की मदद कर चुके हैं। इसमें उनके स्वयं के रक्तदान के साथ जरूरतमंदों के लिए अन्य रक्तदाताओं की व्यवस्था करना भी शामिल है।

यह आंकड़ा केवल रक्तदान की संख्या नहीं बताता। इसके पीछे उन परिवारों की कहानियां हैं, जिन्हें बीमारी और इलाज के बीच खून की व्यवस्था के लिए संघर्ष करना पड़ा। किसी मरीज को तत्काल रक्त की जरूरत होती है, तो उसके परिजन मानसिक तनाव से गुजरते हैं। ऐसे में सही समय पर रक्तदाता मिल जाना उनके लिए बड़ी राहत बन सकता है।

मिस्बाहुल इसी जरूरत को समझते हैं। वह जानते हैं कि अस्पताल में भर्ती मरीज के परिवार के लिए समय कितना महत्वपूर्ण होता है। फोन पर मिली सूचना के बाद रक्तदाता तलाशना, उपलब्धता की पुष्टि करना और जरूरत पड़ने पर अस्पताल तक पहुंचने में मदद करना उनके काम का हिस्सा है।

उनकी कोशिश रहती है कि जरूरतमंद परिवार को अलग अलग लोगों के सामने बार बार अपनी परेशानी न बतानी पड़े। यदि वह स्वयं रक्तदाता उपलब्ध नहीं करा सकते, तो अपने संपर्कों के माध्यम से किसी दूसरे उपयुक्त व्यक्ति तक पहुंचने का प्रयास करते हैं।

उनके इस प्रयास से मालदा और चंचल के कई परिवारों को कठिन समय में मदद मिली है। यही वजह है कि लोग उनके काम को केवल सामाजिक सेवा नहीं, बल्कि मानवीय जिम्मेदारी के रूप में देखते हैं।

सोशल मीडिया से आगे, असली काम रक्तदाता तक पहुंचना

आज सोशल मीडिया पर रक्त की जरूरत से जुड़ी अपीलें तेजी से फैलती हैं। फेसबुक पोस्ट और दूसरे डिजिटल माध्यमों से किसी मरीज की जरूरत की जानकारी बड़ी संख्या में लोगों तक पहुंच सकती है। लेकिन केवल अपील साझा कर देना समस्या का पूरा समाधान नहीं है।

वास्तविक चुनौती सही रक्तदाता की पहचान करना, उससे संपर्क स्थापित करना और जरूरत के समय उसकी उपलब्धता सुनिश्चित करना है। मिस्बाहुल कई वर्षों से इसी काम में लगे हुए हैं।

वह पहले रक्तदान कर चुके लोगों के नाम, संपर्क नंबर और रक्त समूह का रिकॉर्ड रखते हैं। जब किसी मरीज के लिए रक्त की मांग आती है, तो इस जानकारी के आधार पर संभावित रक्तदाताओं से संपर्क करना आसान हो जाता है।

इस व्यवस्था में व्यक्तिगत संपर्कों की अहम भूमिका है। हर रक्तदाता हर समय उपलब्ध नहीं हो सकता। ऐसे में एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति तक पहुंचना पड़ता है। कभी फोन करना पड़ता है, तो कभी कई लोगों से बात करनी होती है। यह काम सुनने में साधारण लग सकता है, लेकिन आपातकाल में इसके लिए तत्परता और निरंतर प्रयास की जरूरत होती है।

मिस्बाहुल का अनुभव उन्हें इस काम में मदद करता है। वर्षों में बने संपर्क और रक्तदाताओं का नेटवर्क उनकी सबसे बड़ी ताकत बन चुके हैं।

प्रोफेसर ने दिया ‘ब्लडमैन’ नाम

मिस्बाहुल के सामाजिक योगदान को देखते हुए शम्सी कॉलेज के प्रोफेसर अमीनुल हक ने उन्हें ‘ब्लडमैन’ नाम दिया था। इसका उद्देश्य लोगों को स्वैच्छिक रक्तदान के लिए प्रेरित करने में उनके प्रयासों को पहचान देना था।

समय के साथ यह नाम उनकी पहचान बन गया। चंचल उपमंडल के विभिन्न इलाकों में जब किसी मरीज के लिए रक्त की जरूरत होती है, तो कई लोगों को मिस्बाहुल का नाम याद आता है।

हालांकि, उनके लिए इस पहचान का महत्व केवल लोकप्रियता तक सीमित नहीं है। उनके सामने सबसे बड़ी प्राथमिकता मरीज की जरूरत पूरी करना है। किसी परिवार को समय पर रक्त मिल जाए, तो उनके लिए यही सबसे बड़ी उपलब्धि है।

रक्तदान के प्रति जागरूकता बढ़ाना भी उनके काम का महत्वपूर्ण हिस्सा है। वह चाहते हैं कि अधिक से अधिक लोग स्वेच्छा से रक्तदान करें और जरूरत पड़ने पर दूसरों की मदद के लिए आगे आएं। इससे रक्त की कमी के कारण होने वाली परेशानियों को कम करने में सहायता मिल सकती है।

समाज सेवा के साथ नाटक से भी जुड़ाव

मिस्बाहुल की पहचान केवल रक्तदान और सामाजिक सेवा तक सीमित नहीं है। पढ़ाई के साथ उनकी रुचि नाटक में भी है। उन्हें गजोल कॉलेज के प्राचार्य डॉ. मनोज भोज के मार्गदर्शन में नाट्य समूहों के साथ काम करने और अभिनय करने का अनुभव मिला है।

मंच पर वह अलग अलग किरदार निभाने का प्रयास करते हैं। वास्तविक जीवन में भी लोगों के बीच रहकर उनकी परेशानियों को समझना उनके व्यक्तित्व का हिस्सा है।नाटक और सामाजिक सेवा के क्षेत्र अलग जरूर हैं, लेकिन दोनों में लोगों से जुड़ने और उनकी भावनाओं को समझने की जरूरत होती है। मिस्बाहुल की जिंदगी में ये दोनों पहलू साथ साथ आगे बढ़ रहे हैं।

उनकी कहानी किसी बड़े संस्थान या संसाधनों से शुरू नहीं हुई थी। इसकी शुरुआत एक रक्तदान शिविर में लिए गए छोटे से फैसले से हुई। उस फैसले ने उन्हें दूसरों को रक्तदान के लिए प्रेरित करने की राह दिखाई। फिर परिचितों का नेटवर्क बना और जरूरतमंद मरीजों की मदद का दायरा बढ़ता गया।

रक्तदान से बड़ा है इंसानियत का रिश्ता

मिस्बाहुल आलम जेम्स की कहानी यह बताती है कि समाज में बदलाव लाने के लिए हमेशा बड़े संसाधनों की जरूरत नहीं होती। कई बार एक व्यक्ति की तत्परता, सही संपर्क और दूसरों के लिए समय निकालने की इच्छा भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

मालदा के इस युवा ने रक्तदान को केवल व्यक्तिगत जिम्मेदारी नहीं माना। उन्होंने इसे जरूरतमंद लोगों को आपस में जोड़ने का माध्यम बनाया। उनके प्रयासों से रक्तदाता और मरीज के परिवार के बीच संपर्क स्थापित होता है। मुश्किल समय में यही संपर्क उम्मीद का कारण बन सकता है।

थैलेसीमिया जैसे रोगों से पीड़ित मरीजों को नियमित रूप से रक्त की जरूरत पड़ सकती है। ऐसे मरीजों और उनके परिवारों के लिए स्वैच्छिक रक्तदाताओं का नेटवर्क विशेष महत्व रखता है। मिस्बाहुल का काम इस जरूरत की ओर भी ध्यान दिलाता है।

उनकी यात्रा अभी जारी है। हर नया फोन उनके सामने एक नई जिम्मेदारी लेकर आता है। हर जरूरतमंद मरीज की मदद का अर्थ है किसी परिवार की चिंता को कम करने की कोशिश।

मिस्बाहुल आलम जेम्स ने अपने काम से यह संदेश दिया है कि इंसानियत केवल बड़ी बातों या नारों में नहीं बसती। वह उस समय दिखाई देती है, जब कोई व्यक्ति दूसरे की परेशानी सुनकर आगे बढ़ता है। मालदा के इस ‘ब्लडमैन’ के लिए यही समाज सेवा का सबसे बड़ा अर्थ है।

सवाल-जवाब

सवाल: मिस्बाहुल आलम जेम्स कौन हैं?

जवाब: मिस्बाहुल आलम जेम्स पश्चिम बंगाल के मालदा जिले के रतुआ एक ब्लॉक स्थित भादो गांव के समाजसेवी हैं। वह जरूरतमंद मरीजों के लिए रक्तदाताओं की व्यवस्था करते हैं और स्वयं भी रक्तदान करते हैं।

सवाल: मिस्बाहुल आलम जेम्स को ब्लडमैन क्यों कहा जाता है?

जवाब: रक्तदान को बढ़ावा देने और जरूरतमंद मरीजों के लिए रक्तदाताओं की व्यवस्था करने के उनके प्रयासों के कारण शम्सी कॉलेज के प्रोफेसर अमीनुल हक ने उन्हें ब्लडमैन नाम दिया था।

सवाल: मिस्बाहुल आलम जेम्स अब तक कितने मरीजों की मदद कर चुके हैं?

जवाब: उनके अनुसार, वह स्वयं रक्तदान करके और अन्य रक्तदाताओं की व्यवस्था करके 400 से अधिक मरीजों की मदद कर चुके हैं।

सवाल: मिस्बाहुल आलम जेम्स ने रक्तदान कब शुरू किया?

जवाब: उन्होंने वर्ष 2018 में 18 वर्ष की उम्र में सैमसी यूनाइटेड यंग्स क्लब के रक्तदान शिविर में पहली बार रक्तदान किया था।

सवाल: मिस्बाहुल आलम जेम्स कहां रहते हैं?

जवाब: वह पश्चिम बंगाल के मालदा जिले के रतुआ एक ब्लॉक के भादो गांव के निवासी हैं।