India needs to prepare quickly to meet the challenge of growing elderly population: Experts
आवाज द वॉयस/नई दिल्ली
दो से अधिक संतान होने पर दंड का प्रावधान करने वाले कानूनों की प्रासंगिकता पर उच्चतम न्यायालय की टिप्पणी ने देश में जनसंख्या नीति को लेकर नयी बहस छेड़ दी है। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत के पास अपनी युवा आबादी के दम पर आर्थिक विकास को गति देने यानी ‘जनसांख्यिकीय लाभांश’ का फायदा उठाने का अवसर तेजी से सिमट रहा है।
विशेषज्ञों ने आगाह किया है कि भारत को भविष्य की दो बड़ी चुनौतियों से निपटने के लिए अभी से तैयारी करनी होगी। एक ओर बुजुर्गों की आबादी बढ़ेगी, तो दूसरी ओर कामकाजी उम्र में पहुंचने वाले युवाओं का अनुपात घटता जाएगा।
उच्चतम न्यायालय ने बुधवार को कहा कि भारत की कुल प्रजनन दर (टीएफआर) 2003 में तीन थी, जो घटकर अब 1.9 रह गई है। न्यायालय ने इस बात पर जोर दिया कि जनसंख्या वृद्धि को नियंत्रित करने के उद्देश्य से बनाए गए कानून अब प्रासंगिक नहीं रह गए हैं।
न्यायालय ने कहा, ‘‘हमारी स्पष्ट राय है कि दो से अधिक बच्चों पर जुर्माना लगाने वाले कानूनों ने अपनी प्रासंगिकता खो दी है। पिछले कुछ दशकों में जनसांख्यिकीय बदलावों के कारण ऐसे कानूनों का आधार यानी अत्यधिक जनसंख्या का डर अब खत्म हो चुका है।’’