नई दिल्ली
जीटीआरआई के अनुसार, वैश्विक स्तर पर चांदी के प्रसंस्करण में चीन की भूमिका अत्यंत केंद्रीय है। दुनिया में आयात किए जाने वाले चांदी अयस्क और सांद्रण का बड़ा हिस्सा चीन द्वारा खरीदा जाता है, जिसे वह घरेलू स्तर पर परिष्कृत कर उच्च मूल्य वाले उत्पादों के रूप में निर्यात करता है। इससे वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में असंतुलन की स्थिति बन रही है।
जीटीआरआई के संस्थापक अजय श्रीवास्तव ने कहा कि भारत को घरेलू मूल्यवर्धन बढ़ाने के लिए अयस्क स्तर से ही चांदी के प्रसंस्करण की क्षमता विकसित करनी होगी। वित्त वर्ष 2024-25 में भारत ने जहां केवल लगभग 48 करोड़ अमेरिकी डॉलर के चांदी उत्पादों का निर्यात किया, वहीं आयात 4.8 अरब अमेरिकी डॉलर से अधिक रहा। यह देश की गहरी आयात निर्भरता को दर्शाता है।
वर्ष 2025 में यह निर्भरता और बढ़ गई। जनवरी से नवंबर के बीच चांदी का कुल आयात 8.5 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुंच गया, जबकि पूरे वर्ष के लिए इसके 9.2 अरब डॉलर तक जाने का अनुमान है। यह पिछले वर्ष की तुलना में लगभग 44 प्रतिशत अधिक है।
रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि चीन द्वारा चांदी के निर्यात पर नियंत्रण कड़े किए जाने से वैश्विक आपूर्ति को लेकर जोखिम बढ़ सकता है। जनवरी 2026 से चीन ने चांदी निर्यात को लाइसेंस-आधारित प्रणाली में डाल दिया है, जिससे कीमतों में अस्थिरता की आशंका बढ़ गई है।
जीटीआरआई ने कहा कि चांदी की वैश्विक मांग का 55–60 प्रतिशत हिस्सा औद्योगिक उपयोग से जुड़ा है। इलेक्ट्रॉनिक्स, सौर ऊर्जा, इलेक्ट्रिक वाहन, रक्षा और चिकित्सा क्षेत्र में इसकी भूमिका लगातार बढ़ रही है। विशेष रूप से सौर ऊर्जा में चांदी एक अहम घटक है, जहां इसका उपयोग दक्षता बढ़ाने के लिए किया जाता है।
रिपोर्ट का निष्कर्ष है कि बदलते वैश्विक परिदृश्य में चांदी की आपूर्ति सुरक्षा, ऊर्जा सुरक्षा जितनी ही महत्वपूर्ण होती जा रही है। ऐसे में भारत को खनन साझेदारियों, घरेलू शोधन, पुनर्चक्रण और आयात विविधीकरण को अपनी दीर्घकालिक रणनीति का हिस्सा बनाना चाहिए।






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