आवाज द वॉयस/नई दिल्ली
कम कीमत वाले ‘सस्पेंशन ग्रेड पीवीसी रेजिन’ के आयात पर छह महीने के लिए लगाए गए अंकुश से विदेशी आपूर्तिकर्ताओं पर असर पड़ेगा और देश में इस उत्पाद की कीमतें बढ़ सकती हैं। आर्थिक शोध संस्थान जीटीआरआई ने बुधवार को यह आशंका जताई।
‘सस्पेंशन ग्रेड पीवीसी रेजिन’ पाइप एवं केबल जैसे प्लास्टिक उत्पाद बनाने में सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाला पीवीसी कच्चा माल है।
विदेश व्यापार महानिदेशालय (डीजीएफटी) ने पिछले सप्ताह सस्पेंशन ग्रेड पॉलीविनाइल क्लोराइड (एस-पीवीसी) रेजिन पर न्यूनतम आयात मूल्य (एमआईपी) लागू किया। इसके तहत 0.76 डॉलर प्रति किलोग्राम या उससे कम कीमत वाले आयात के लिए अब लाइसेंस लेना अनिवार्य होगा, जबकि इससे अधिक कीमत पर आयात सामान्य रूप से जारी रहेगा। यह व्यवस्था छह महीने तक लागू रहेगी।
ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (जीटीआरआई) के संस्थापक अजय श्रीवास्तव ने कहा कि इस कदम से घरेलू पीवीसी रेजिन की कीमतों में बढ़ोतरी की संभावना है, लेकिन भारत की आयात पर निर्भरता कम होने की उम्मीद नहीं है।
भारत ने वित्त वर्ष 2025-26 में इस उत्पाद का 1.63 अरब डॉलर का आयात किया। इसमें चीन सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता रहा, जिसके बाद जापान, ताइवान, दक्षिण कोरिया, मेक्सिको, इंडोनेशिया, थाइलैंड, अमेरिका, सिंगापुर एवं वियतनाम का स्थान रहा।
जीटीआरआई के मुताबिक, इन देशों से आयात की औसत कीमत 0.65 डॉलर से 0.75 डॉलर प्रति किलोग्राम के बीच रही, जो डीजीएफटी द्वारा तय 0.76 डॉलर से कम है। ऐसे में मौजूदा आयात का बड़ा हिस्सा अब अंकुश की श्रेणी में आ जाएगा, जब तक कि आपूर्तिकर्ता कीमत नहीं बढ़ाते।
श्रीवास्तव ने कहा कि इस फैसले का मुख्य असर आयात घटने के बजाय घरेलू कीमतों में बढ़ोतरी के रूप में दिखेगा। वर्तमान में एस-पीवीसी आयात पर 7.5 प्रतिशत सीमा शुल्क और 0.75 प्रतिशत सामाजिक कल्याण अधिभार लगता है। पांच प्रतिशत आईजीएसटी जोड़ने पर न्यूनतम आयात लागत करीब 0.87 डॉलर प्रति किलोग्राम हो जाती है।
उन्होंने कहा कि भारत अपनी जरूरत का करीब 64 प्रतिशत एस-पीवीसी रेजिन आयात करता है। देश में इसकी सालाना खपत लगभग 47 लाख टन है, जिसमें एस-पीवीसी की हिस्सेदारी 45 लाख टन यानी 96 प्रतिशत है।