नई दिल्ली
दिल्ली हाई कोर्ट ने NCT दिल्ली सरकार की ओर से दायर एक अपील को खारिज कर दिया है। इस अपील में 2006 के एक मामले में मुराइफ कमर और इरशाद अली उर्फ दीपक को बरी किए जाने के फैसले को चुनौती दी गई थी। यह मामला दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल द्वारा कथित तौर पर हथियार, गोला-बारूद और विस्फोटक बरामद किए जाने से जुड़ा था। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि अभियोजन पक्ष (prosecution) आरोपियों के अपराध को 'तर्कसंगत संदेह से परे' साबित करने में नाकाम रहा और उसे ट्रायल कोर्ट के बरी करने वाले फैसले में कोई कमी नज़र नहीं आई।
जस्टिस प्रतिभा एम. सिंह और जस्टिस मधु जैन की डिवीज़न बेंच ने 29 मई, 2026 को दिए अपने फैसले में, ट्रायल कोर्ट द्वारा 22 दिसंबर, 2016 को सुनाए गए बरी करने के फैसले को बरकरार रखा। बेंच ने यह भी टिप्पणी की कि अभियोजन पक्ष के मामले में विश्वसनीयता की कमी थी। कोर्ट ने इस बात पर भी गौर किया कि जांच के कई ऐसे अहम कदम नहीं उठाए गए, जिनसे कथित बरामदगी की प्रामाणिकता साबित हो सकती थी।
हाई कोर्ट ने पाया कि केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) की क्लोजर रिपोर्ट में आरोपियों के कॉल डिटेल रिकॉर्ड का विश्लेषण शामिल था, जिससे यह संकेत मिलता था कि उनके मोबाइल फोन दिसंबर 2005 से ही बंद थे। कोर्ट ने कहा कि यदि स्पेशल सेल के पास CBI के निष्कर्षों के विपरीत कोई सामग्री मौजूद थी, तो उसे ट्रायल के दौरान उसे पेश करना चाहिए था। बेंच ने यह भी पाया कि CBI द्वारा मुकरबा चौक पर जिन स्वतंत्र गवाहों से पूछताछ की गई थी, उनकी ट्रायल के दौरान गवाही नहीं ली गई। इसके अलावा, जिन लोगों पर आरोपियों को हथियार सप्लाई करने का आरोप था, उनकी न तो ठीक से जांच की गई और न ही उन्हें गवाह के तौर पर पेश किया गया।
कोर्ट ने अभियोजन पक्ष के मामले में कई गंभीर कमियां भी पाईं। इनमें शामिल हैं: एक व्यस्त सार्वजनिक स्थान पर कथित बरामदगी होने के बावजूद किसी स्वतंत्र सार्वजनिक गवाह का मौजूद न होना; बस ड्राइवर और कंडक्टर को जांच में शामिल करने में विफलता; रेड के दौरान इस्तेमाल किए गए निजी वाहनों से संबंधित रिकॉर्ड का रखरखाव न करना; और कथित तौर पर बरामद हथियारों और विस्फोटकों से उंगलियों के निशान (fingerprints) हासिल करने में विफलता। बेंच ने कहा कि इन कमियों ने अभियोजन पक्ष की कहानी की विश्वसनीयता को ही कमज़ोर कर दिया।
बरी किए जाने के फैसले के खिलाफ अपील से जुड़े स्थापित सिद्धांतों का हवाला देते हुए, हाई कोर्ट ने दोहराया कि किसी फैसले में हस्तक्षेप केवल तभी उचित होता है, जब ट्रायल कोर्ट का दृष्टिकोण 'विकृत' (perverse) हो या पूरी तरह से ही 'असमर्थनीय' हो। बेंच ने कहा कि ट्रायल कोर्ट का आकलन रिकॉर्ड पर मौजूद सबूतों के आधार पर एक 'तर्कसंगत दृष्टिकोण' था, और इसलिए इसमें अपीलीय हस्तक्षेप की कोई आवश्यकता नहीं थी। तदनुसार, न्यायालय ने NCT दिल्ली सरकार की अपील को खारिज कर दिया, सभी लंबित आवेदनों का निपटारा कर दिया, और आदेश दिया कि प्रतिवादियों द्वारा प्रस्तुत व्यक्तिगत बॉन्ड, ज़मानत बॉन्ड और ज़मानतें मुक्त मानी जाएंगी।