सीएए-एनआरसी से परे: बंगाल में ध्रुवीकरण के नए केंद्र के रूप में उभरा एसआईआर

Story by  PTI | Published by  [email protected] | Date 28-03-2026
Beyond CAA-NRC: SIR emerges as the new centre of polarisation in Bengal
Beyond CAA-NRC: SIR emerges as the new centre of polarisation in Bengal

 

आवाज द वॉयस/नई दिल्ली 

 
पश्चिम बंगाल में 2026 के विधानसभा चुनाव से पहले सांप्रदायिक ध्रुवीकरण और भी तेज होता जा रहा है। यह अब सिर्फ चुनावी बयानबाजी तक सीमित न रहकर, जमीनी स्तर पर लगातार लोगों को लामबंद करने के रूप में सामने आ रहा है; और इस बदलती हुई पहचान की राजनीति में एसआईआर की प्रक्रिया एक अहम टकराव का मुद्दा बनकर उभरी है।
 
मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) की कवायद और गहरी वैचारिक उथल-पुथल का मेल चुनावी रणक्षेत्र को एक बहुस्तरीय मुकाबले में बदल रहा है, जहाँ मतदाताओं का गणित पहचान-आधारित लामबंदी से टकराता है।
 
वर्ष 2021 में जहां मतभेद नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) और राष्ट्रीय नागरिक पंजी (एनआरसी) के इर्द-गिर्द केंद्रित थे, वहीं अब उभरती हुई प्रतिस्पर्धा एक ऐसे मुद्दे पर आधारित है, जो यह तय करता है कि मतदाता के रूप में कौन योग्य है।
 
एसआईआर की प्रक्रिया ध्रुवीकरण को चुनावी बयानबाजी से बदलकर चुनावी वैधता को लेकर एक सीधी लड़ाई में तब्दील कर रही है, जिसके साथ ‘‘घुसपैठ’’ और ‘‘अल्पसंख्यक तुष्टीकरण’’ जैसे बार-बार दोहराए जाने वाले विषय जुड़े हैं।
 
एसआईआर की प्रक्रिया के दौरान, अब तक मतदाता सूची से लगभग 64 लाख नाम हटाए जा चुके हैं, और कई लाख अन्य नामों की अभी भी जाँच जारी है। यह एक ऐसा पैमाना है जिसने राजनीतिक समीकरणों को हिलाकर रख दिया है और कड़े मुकाबले वाली सीटों पर अनिश्चितता पैदा कर दी है।
 
भाजपा ने एसआईआर को एक जरूरी ‘‘चुनाव सुधार’’ के तौर पर पेश किया है, और इसे अवैध प्रवासन तथा जनसांख्यिकीय बदलाव-खास तौर पर सीमावर्ती जिलों से संबंधित चिंताओं से जोड़ा है।