Psychologist Shuchi Goyal warns that mobile addiction poses a health risk.
अर्सला खान/नई दिल्ली
डिजिटल दौर में बच्चों और किशोरों की जिंदगी तेजी से बदल रही है। मोबाइल फोन, ऑनलाइन गेम और सोशल मीडिया अब उनके रोजमर्रा के जीवन का हिस्सा बन चुके हैं। लेकिन यही सुविधा कई बार मानसिक सेहत के लिए खतरा भी बन रही है। इसी गंभीर मुद्दे पर “आवाज़ द वॉइस” ने जानी-मानी मनोवैज्ञानिक Shuchi Goel से खास बातचीत की। शुचि गोयल एक अनुभवी साइकोलॉजिस्ट हैं, जिनके पास बच्चों, किशोरों और युवा वयस्कों के साथ काम करने का पंद्रह वर्षों से अधिक का अनुभव है।
बातचीत में उन्होंने बताया कि #pubg जैसे ऑनलाइन गेम, इंस्टाग्राम रील्स और लगातार मोबाइल स्क्रीन पर समय बिताना बच्चों के दिमाग पर गहरा असर डाल रहा है। उन्होंने कहा कि “ब्रेन रॉट” शब्द आज इसलिए चर्चा में है क्योंकि अत्यधिक डिजिटल एक्सपोजर से बच्चों की एकाग्रता कम हो रही है, याददाश्त प्रभावित हो रही है और सोचने-समझने की क्षमता पर भी असर पड़ रहा है। लंबे समय तक स्क्रीन देखने से दिमाग को लगातार उत्तेजना मिलती रहती है, जिससे बच्चे सामान्य गतिविधियों में रुचि खोने लगते हैं।
शुचि गोयल के अनुसार स्क्रीन एडिक्शन के कुछ साफ संकेत हैं। बच्चा अगर मोबाइल न मिलने पर चिड़चिड़ा हो जाए, गुस्सा करे या उदास हो जाए, तो यह लत का संकेत हो सकता है। पढ़ाई में ध्यान न लगना, नींद का कम होना, आंखों में दर्द, सिरदर्द और परिवार से दूरी बनाना भी इसके लक्षण हैं। कई बार बच्चे वास्तविक दुनिया से कटकर वर्चुअल दुनिया में ज्यादा सहज महसूस करने लगते हैं। यह स्थिति धीरे-धीरे एंग्जायटी, डिप्रेशन और आत्मविश्वास की कमी को जन्म दे सकती है। उन्होंने चेतावनी दी कि अगर समय रहते ध्यान न दिया जाए तो यह लत भावनात्मक सेहत ही नहीं, बल्कि जान के लिए भी खतरा बन सकती है। ऑनलाइन गेम्स में हार-जीत का दबाव, सोशल मीडिया पर तुलना और लाइक्स की दौड़ बच्चों के मन में असुरक्षा की भावना पैदा करती है। कुछ मामलों में यह गंभीर मानसिक तनाव और आत्मघाती विचारों तक पहुंच सकता है।
माता-पिता के लिए शुचि गोयल की सलाह स्पष्ट है। सबसे पहले बच्चों के साथ खुलकर बातचीत करें। डांटने या फोन छीन लेने से समस्या और बढ़ सकती है। घर में स्क्रीन टाइम के लिए स्पष्ट नियम बनाएं और खुद भी उनका पालन करें। बच्चों को खेलकूद, किताबें पढ़ने और रचनात्मक गतिविधियों के लिए प्रेरित करें। परिवार के साथ समय बिताना और भावनात्मक जुड़ाव बनाए रखना बहुत जरूरी है। अगर बच्चे के व्यवहार में अचानक बड़ा बदलाव दिखे तो विशेषज्ञ से सलाह लेने में देरी न करें।
उन्होंने यह भी कहा कि डिजिटल तकनीक पूरी तरह बुरी नहीं है, लेकिन उसका संतुलित उपयोग जरूरी है। सही मार्गदर्शन के साथ बच्चे तकनीक का सकारात्मक इस्तेमाल कर सकते हैं। जरूरत इस बात की है कि माता-पिता, स्कूल और समाज मिलकर बच्चों को स्वस्थ डिजिटल आदतें सिखाएं। यह साफ है कि मोबाइल की लत एक उभरती हुई मानसिक स्वास्थ्य चुनौती है। जागरूकता, संवाद और समय पर कदम उठाकर ही हम बच्चों को इस खतरे से बचा सकते हैं और उन्हें एक सुरक्षित, संतुलित और खुशहाल बचपन दे सकते हैं।