Cancer drugs Cisplatin, Carboplatin and tetanus injections witness price hikes due to West Asia conflict
नई दिल्ली
पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के कारण प्रमुख एक्टिव फार्मास्युटिकल इंग्रीडिएंट्स (API) की आपूर्ति गंभीर रूप से प्रभावित हुई है, जिससे भारत के दवा उद्योग पर दबाव बढ़ गया है। इस स्थिति से निपटने के लिए सरकार ने कुछ आवश्यक दवाओं की कीमतों में वृद्धि की अनुमति दी है, जिनमें कैंसर उपचार में इस्तेमाल होने वाली सिस्प्लैटिन (Cisplatin) और कार्बोप्लैटिन (Carboplatin) के अलावा दो एंटी-टेटनस इम्युनोग्लोबुलिन इंजेक्शन शामिल हैं।
सूत्रों के अनुसार, दवाओं की कीमत बढ़ाने के लिए कुल 82 आवेदन प्राप्त हुए थे, लेकिन अंतर-मंत्रालयी समिति ने केवल चार दवाओं के लिए मूल्य वृद्धि की सिफारिश की।
राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (NPPA) ने अपनी अधिसूचना में कहा कि दवा निर्माताओं ने API की बढ़ती लागत, उत्पादन खर्च में वृद्धि और विनिमय दरों में बदलाव जैसे कारणों का हवाला देते हुए मूल्य वृद्धि की मांग की थी। कई कंपनियों ने कुछ दवाओं के उत्पादन को आर्थिक रूप से अव्यवहारिक बताते हुए उन्हें बंद करने की भी अनुमति मांगी थी।
कीमोथेरेपी दवाओं की बाजार में भारी कमी
हाल के दिनों में कैंसर उपचार में उपयोग होने वाली कीमोथेरेपी दवाओं, विशेष रूप से सिस्प्लैटिन और कार्बोप्लैटिन, की बाजार में गंभीर कमी देखी गई है। विशेषज्ञों का कहना है कि प्लैटिनम आधारित कच्चे माल की वैश्विक कमी और बढ़ती लागत के कारण कई दवा कंपनियों ने इन दवाओं का उत्पादन कम कर दिया है या बंद कर दिया है।
कैंसर मरीजों के लिए गंभीर खतरा
एम्स, नई दिल्ली के एक वरिष्ठ विशेषज्ञ ने कहा कि सिस्प्लैटिन और कार्बोप्लैटिन सिर एवं गर्दन, फेफड़े, अंडाशय, मूत्राशय और गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल कैंसर जैसे कई सामान्य कैंसरों के उपचार की आधारभूत दवाएं हैं।
विशेषज्ञ के अनुसार, इन दवाओं की कमी से उपचार में देरी हो सकती है और डॉक्टरों को कम प्रभावी विकल्पों का सहारा लेना पड़ सकता है, जिससे मरीजों की जीवित रहने की संभावना और उपचार के परिणाम प्रभावित हो सकते हैं।
उन्होंने सरकार से घरेलू उत्पादन बढ़ाने, रणनीतिक भंडारण और आपूर्ति श्रृंखला की निगरानी को मजबूत करने की मांग की।
कच्चे माल की कमी मुख्य वजह
ऑल इंडिया ऑर्गेनाइजेशन ऑफ केमिस्ट्स एंड ड्रगिस्ट्स (AIOCD) के महासचिव राजीव सिंघल ने कहा कि सिस्प्लैटिन और कार्बोप्लैटिन की कमी का मुख्य कारण प्लैटिनम आधारित कच्चे माल की सीमित वैश्विक उपलब्धता है।
उन्होंने कहा कि यह मूल रूप से आपूर्ति श्रृंखला की समस्या है, न कि मूल्य निर्धारण की। उद्योग आवश्यक कच्चे माल की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए प्रयास कर रहा है।
इलाज में देरी का खतरा
स्पर्श हॉस्पिटल, बेंगलुरु की वरिष्ठ मेडिकल ऑन्कोलॉजिस्ट डॉ. मानसी खंडेरिया ने कहा कि इन दवाओं की अनुपलब्धता से उपचार की समय-सीमा प्रभावित हो सकती है, जिससे मरीजों के स्वास्थ्य परिणामों पर सीधा असर पड़ेगा।
वहीं, फोर्टिस हॉस्पिटल्स की डॉ. नीति रायज़ादा ने कहा कि दवाओं की कमी के कारण डॉक्टरों को वैकल्पिक उपचार योजनाएं अपनानी पड़ सकती हैं, लेकिन वे हमेशा प्लैटिनम आधारित मानक उपचार जितनी प्रभावी नहीं होतीं।
60-70 प्रतिशत कैंसर मरीजों को होती है जरूरत
सर गंगाराम अस्पताल के मेडिकल ऑन्कोलॉजी विभाग के अध्यक्ष डॉ. श्याम अग्रवाल ने बताया कि पिछले दो से तीन सप्ताह से देशभर में इन दोनों दवाओं की भारी कमी बनी हुई है।
उन्होंने कहा कि फेफड़े, मुंह, गर्भाशय ग्रीवा, अंडाशय और वृषण कैंसर जैसे मामलों में इन दवाओं का व्यापक उपयोग होता है और लगभग 60 से 70 प्रतिशत उन्नत कैंसर मरीजों को इनके उपचार की आवश्यकता पड़ती है।
डॉ. अग्रवाल के अनुसार, दवा कंपनियों का कहना है कि API की कीमतों में भारी वृद्धि के बावजूद ये दवाएं ड्रग प्राइस कंट्रोल ऑर्डर (DPCO) के तहत निर्धारित मूल्य पर ही बेची जा सकती हैं, जिससे उत्पादन आर्थिक रूप से लाभकारी नहीं रह गया है। परिणामस्वरूप कई कंपनियों ने इनका निर्माण रोक दिया है।
उन्होंने केंद्र सरकार से तत्काल हस्तक्षेप कर दवा कंपनियों को उत्पादन बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित करने और मरीजों को जीवनरक्षक दवाओं की निर्बाध उपलब्धता सुनिश्चित करने की अपील की।
सरकार से त्वरित कार्रवाई की मांग
कैंसर विशेषज्ञों का मानना है कि यदि जल्द समाधान नहीं निकाला गया तो हजारों मरीजों के उपचार पर गंभीर असर पड़ सकता है। विशेषज्ञों ने घरेलू उत्पादन बढ़ाने, कच्चे माल की उपलब्धता सुनिश्चित करने और आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत बनाने के लिए तत्काल कदम उठाने की आवश्यकता पर जोर दिया है।