लड़के या लड़कियां : कौन है Depression का शिकार, मनोवैज्ञानिक जासिंदा मीर से जानिए

Story by  अर्सला खान | Published by  [email protected] | Date 29-01-2026
Boys or girls: Who is more prone to depression? Learn from psychologist Jasinda Mir.
Boys or girls: Who is more prone to depression? Learn from psychologist Jasinda Mir.

 

अर्सला खान/नई दिल्ली

मशहूर मनोवैज्ञानिक जासिंदा मीर कश्मीर में मानसिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में एक जाना-पहचाना नाम हैं। उन्होंने जामिया मिलिया इस्लामिया, नई दिल्ली से मास्टर्स की पढ़ाई की है। इसके बाद उन्होंने मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े विषयों में गहराई से काम किया और गिल्ड व स्पेशलाइजेशन के तहत विशेषज्ञता हासिल की। इसके साथ ही उन्होंने नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ चाइल्ड डेवलपमेंट, नई दिल्ली से काउंसलिंग और गाइडेंस में विशेष प्रशिक्षण लिया है। 

जासिंदा मीर पिछले कई वर्षों से बच्चों, युवाओं और महिलाओं के मानसिक स्वास्थ्य पर काम कर रही हैं। वह डिप्रेशन, ओवरथिंकिंग, एंग्जायटी, ट्रॉमा और व्यवहार संबंधी समस्याओं पर काउंसलिंग के ज़रिये लोगों की मदद कर चुकी हैं। खास बात यह है कि वह मानसिक बीमारियों को सिर्फ बीमारी नहीं, बल्कि सामाजिक और भावनात्मक समस्या मानती हैं, जिसका समाधान संवाद और समझ से संभव है।
 
उनका मानना है कि कश्मीर जैसे संवेदनशील क्षेत्र में मानसिक तनाव को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। लंबे समय से चले आ रहे हालात, बेरोजगारी, पढ़ाई का दबाव और सामाजिक असुरक्षा ने युवाओं को मानसिक रूप से कमजोर किया है। जासिंदा मीर लगातार इस बात पर जोर देती हैं कि मेंटल हेल्थ को लेकर समाज में फैली झिझक और शर्म को तोड़ना बेहद जरूरी है।
 
 
वह अक्सर कहती हैं कि समय पर काउंसलिंग मिलने से बड़ी से बड़ी मानसिक परेशानी को भी संभाला जा सकता है। जासिंदा मीर का काम इस बात का उदाहरण है कि सही मार्गदर्शन और संवेदनशील काउंसलिंग से लोगों की ज़िंदगी में सकारात्मक बदलाव लाया जा सकता है। चलिए उसने जानते हैं कि Mental health और Depression कितना खतरनाक है....?

कश्मीर में बढ़ता मानसिक तनाव: क्यों परेशान है आज की पीढ़ी

कश्मीर में डिप्रेशन और ओवरथिंकिंग के मामलों में लगातार बढ़ोतरी देखी जा रही है, खासकर युवाओं के बीच। इस पर मशहूर मनोवैज्ञानिक जासिंदा मीर ने चिंता जताई है। जासिंदा मीर ने जामिया मिलिया इस्लामिया से मास्टर्स किया है, गिल्ड और स्पेशलाइजेशन में विशेषज्ञता हासिल की है और नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ चाइल्ड डेवलपमेंट, नई दिल्ली से काउंसलिंग और गाइडेंस में स्पेशलाइजेशन किया है। उनके मुताबिक, कश्मीर की मौजूदा सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियां मानसिक सेहत पर गहरा असर डाल रही हैं।
 
कश्मीर में डिप्रेशन और ओवरथिंकिंग क्यों बढ़ रहा है

जासिंदा मीर बताती हैं कि लंबे समय से तनाव, अनिश्चित भविष्य, बार-बार आने वाले हालातों में बदलाव और अस्थिरता लोगों के दिमाग पर असर डालती है। युवा हर समय भविष्य को लेकर सोच में डूबे रहते हैं, जिससे ओवरथिंकिंग बढ़ती है और धीरे-धीरे डिप्रेशन का रूप ले लेती है।
 
मेंटल हेल्थ क्यों जरूरी है

शारीरिक सेहत की तरह मानसिक सेहत भी उतनी ही जरूरी है। अगर दिमाग शांत नहीं है तो इंसान न पढ़ाई पर ध्यान दे पाता है, न काम पर और न ही रिश्तों पर। जासिंदा मीर कहती हैं कि मानसिक समस्या को नजरअंदाज करना बीमारी को और गंभीर बना देता है।
 
 
रोजगार और मानसिक तनाव का कनेक्शन

बेरोजगारी कश्मीर में डिप्रेशन की बड़ी वजह बन रही है। पढ़े-लिखे युवा जब नौकरी नहीं पाते तो खुद को असफल मानने लगते हैं। यही सोच ओवरथिंकिंग और आत्मविश्वास की कमी को जन्म देती है।
 
हर इंसान को साइकोलॉजिस्ट की जरूरत क्यों

जासिंदा मीर के अनुसार, साइकोलॉजिस्ट के पास जाना कमजोरी नहीं, बल्कि समझदारी है। जैसे शरीर दर्द में डॉक्टर के पास जाते हैं, वैसे ही दिमाग की परेशानी में मनोवैज्ञानिक की जरूरत होती है।
 
 
काउंसलिंग से कितना फायदा

समय पर काउंसलिंग से व्यक्ति अपनी समस्याओं को समझ पाता है, तनाव कम होता है और सोचने का तरीका सकारात्मक बनता है। कई मामलों में डिप्रेशन शुरुआती स्तर पर ही ठीक हो सकता है।
 
डिप्रेशन की मरीज लड़कियां ज्यादा क्यों

जासिंदा मीर बताती हैं कि लड़कियों पर सामाजिक दबाव, अपेक्षाएं, घरेलू जिम्मेदारियां और भावनाओं को दबाकर रखने की आदत उन्हें ज्यादा संवेदनशील बना देती है, जिससे डिप्रेशन के मामले अधिक सामने आते हैं।
 
सोशल मीडिया का सेहत पर असर

 
सोशल मीडिया पर तुलना, परफेक्ट लाइफ का दिखावा और लगातार स्क्रीन पर रहना मानसिक तनाव बढ़ाता है। इससे नींद की कमी, चिड़चिड़ापन और आत्मविश्वास में गिरावट आती है। जासिंदा मीर का मानना है कि कश्मीर में मानसिक स्वास्थ्य को लेकर खुलकर बात करना और समय पर मदद लेना बेहद जरूरी है। तभी समाज इस बढ़ती समस्या से उबर पाएगा।