आवाज द वॉयस/नई दिल्ली
आज की कृत्रिम मेधा (एआई) प्रौद्योगिकी ऐसा पाठ और विचार तैयार करने में असाधारण रूप से सक्षम हो गई हैं, जो काफी हद तक इंसानों की सोच जैसे लगते हैं। चैटजीपीटी, क्लॉड, गूगल जेमिनी और पर्प्लेक्सिटी एआई जैसे बड़े लैंग्वेज मॉडल पर आधारित चैटबॉट कविताएं लिख सकते हैं, नए विचार सुझा सकते हैं और जटिल समस्याओं के समाधान खोज सकते हैं।
इनके डेवलपर ने मानव मस्तिष्क से काफी प्रेरणा ली। उन्होंने इंसानी तंत्रिका कोशिकाओं (न्यूरॉन्स) की कार्यप्रणाली पर आधारित कृत्रिम तंत्रिका नेटवर्क तैयार किए। अब ये प्रणालियां ऐसे नतीजे दे रही हैं, जो अक्सर इंसानी सोच के नतीजों से मिलते-जुलते हैं।
हालांकि, एआई और मानव मस्तिष्क एक ही तरह से काम नहीं करते। नतीजों का एक जैसा होना जरूरी नहीं कि उनके पीछे की प्रक्रियाएं भी एक जैसी हों।
‘विश्व मॉडल’ (वर्ल्ड मॉडल) ऐसी उभरती हुई प्रौद्योगिकी है, जो एआई प्रणालियों को इंसानी सोच के करीब लाने में मदद कर सकती है। इसकी मदद से एआई यह सीख सकता है कि आगे क्या हो सकता है और उस अनुमान के आधार पर कैसे कदम उठाया जाए। फिर भी एआई दुनिया को इंसानों की तरह न तो देखेगा, न सीखेगा और न ही समझेगा।