परवीन सैयद: 2500 रुपये से हजारों महिलाओं को मिला रोजगार

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 07-11-2026
Parveen Sayed: Thousands of women found employment, starting with 2,500 rupees
Parveen Sayed: Thousands of women found employment, starting with 2,500 rupees

 

भक्ति चालक/पुणे

किसी महिला के लिए अपना छोटा सा कारोबार शुरू करना एक बड़ा कदम हो सकता है। लेकिन उसी कारोबार को ऐसा मंच बना देना, जहां हजारों दूसरी महिलाओं को भी अपनी पहचान और कमाई का रास्ता मिले, यह अपने आप में एक अलग उपलब्धि है। पुणे की परवीन सैयद ने कुछ ऐसा ही कर दिखाया है। उन्होंने करीब 2,500 रुपये की छोटी सी पूंजी से कपड़ों का कारोबार शुरू किया था। आज उनका यह काम ‘हीरा बुटीक’ के नाम से पहचाना जाता है। उनकी पहचान केवल एक सफल कारोबारी महिला की नहीं है। वह उन महिलाओं के लिए अवसर तैयार कर रही हैं, जो घर की जिम्मेदारियों के बीच अपनी आमदनी का जरिया तलाशती हैं।

परवीन का सफर मुंबई से शुरू होकर पुणे, ऑस्ट्रेलिया और अब दुबई तक पहुंच गया है। उन्होंने अपने कारोबार को आगे बढ़ाने के साथ ऐसी प्रदर्शनियों का आयोजन किया, जिनमें महिलाओं को अपने उत्पाद बेचने और ग्राहकों से सीधे जुड़ने का अवसर मिला। उनके मंच से जुड़कर कई महिलाओं ने घरेलू स्तर पर शुरू किए गए काम को स्वतंत्र कारोबार में बदला है। कुछ ने अपनी दुकानें खोली हैं, तो कुछ ने अपने उत्पादों के लिए अलग ब्रांड तैयार किए हैं।

मुंबई से पुणे तक का सफर

परवीन सैयद का बचपन मुंबई में बीता। उन्होंने दसवीं कक्षा तक उर्दू माध्यम से पढ़ाई की। कम उम्र में शादी के बाद वह पुणे आ गईं। पिछले 32 वर्षों से वह पुणे में रह रही हैं। इस बीच उन्होंने अपने परिवार के साथ छह से सात साल ऑस्ट्रेलिया में भी बिताए।

कारोबार के प्रति उनकी दिलचस्पी बचपन से थी। उनके माता-पिता धागे का काम करते थे। वे गजरा बनाने के लिए धागे तैयार करते थे। उस समय धागा बनाने के लिए चरखे का इस्तेमाल होता था। परवीन भी बचपन में चरखा चलाती थीं। घर का माहौल ऐसा था कि बच्चों को भी काम और मेहनत से परिचित कराया जाता था। इसी अनुभव ने उनके भीतर कारोबार की समझ विकसित की।

शादी के बाद जब वह पुणे पहुंचीं तो उन्हें मुंबई की व्यस्त जिंदगी की कमी महसूस हुई। खाली समय उन्हें परेशान करता था। वह कुछ ऐसा करना चाहती थीं, जिससे उनका समय भी उपयोगी बने और अपनी आमदनी का रास्ता भी तैयार हो।

करीब तीस साल पहले मुस्लिम समुदाय की महिलाओं के लिए घर से बाहर निकलकर कारोबार शुरू करना आसान नहीं था। परिवार और समाज में कई तरह के सवाल उठते थे। ग्राहक मिलेंगे या नहीं, काम चलेगा या नहीं और लोग क्या कहेंगे, ऐसी चिंताएं आम थीं। लेकिन परवीन ने इन आशंकाओं को अपने रास्ते की बाधा नहीं बनने दिया।

उन्होंने पुणे के गणेश पेठ इलाके में अपने ससुराल के घर से काम शुरू किया। मुंबई से 2,500 रुपये के दुपट्टे खरीदे और उन्हें बेचना शुरू कर दिया। पहले ही प्रयास में ग्राहकों का अच्छा प्रतिसाद मिला। मुनाफे से उन्होंने दोबारा सामान खरीदा। धीरे-धीरे उनकी पूंजी 3,000 और फिर 5,000 रुपये तक पहुंच गई।

ऑस्ट्रेलिया में भी सीखना और आगे बढ़ना जारी रखा

पुणे में दो से तीन साल कारोबार करने के बाद परवीन अपने परिवार के साथ ऑस्ट्रेलिया चली गईं। वहां उनके पति काम करते थे। परवीन ने इस दौरान भी खुद को घर तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने अंग्रेजी और कंप्यूटर की पढ़ाई की। बाल देखभाल और नर्सरी से जुड़े पाठ्यक्रम भी पूरे किए। इसके बाद उन्हें वहां नौकरी मिली और उन्होंने काम का अनुभव हासिल किया।

छह से सात साल बाद परिवार पुणे लौट आया। परवीन ने फिर से कपड़ों का कारोबार शुरू किया। समय के साथ ग्राहकों का भरोसा बढ़ा और उनका काम ‘हीरा बुटीक’ के नाम से आगे बढ़ने लगा।

लॉकडाउन के बाद 12 स्टॉल से शुरू हुई नई पहल

वर्ष 2020 का लॉकडाउन छोटे कारोबारियों के लिए कठिन समय लेकर आया। दुकानें और बाजार बंद हुए। कई मध्यमवर्गीय परिवारों की आमदनी प्रभावित हुई। परवीन ने महसूस किया कि पुणे में ऐसी बहुत सी महिलाएं हैं, जो घर से कुछ काम करके कमाना चाहती हैं, लेकिन उनके पास अपने उत्पाद बेचने का कोई मंच नहीं है।

लॉकडाउन खत्म होने के बाद उन्होंने इस समस्या का व्यावहारिक समाधान खोजने का फैसला किया। अपने घर के बाहर उपलब्ध खुली जगह में पहली प्रदर्शनी लगाई। इसमें केवल 12 स्टॉल थे। प्रत्येक स्टॉल के लिए प्रतिदिन 500 रुपये शुल्क रखा गया।

उन्होंने अपने परिचितों और पुराने ग्राहकों को फोन करके प्रदर्शनी की जानकारी दी। उनसे महिलाओं के स्टॉलों से खरीदारी करने की अपील भी की। दो दिन की इस प्रदर्शनी में महिलाओं को अच्छी बिक्री मिली। उनका सामान बिक गया और उनके भीतर कारोबार करने का भरोसा पैदा हुआ।

यही छोटी सी शुरुआत आगे चलकर बड़े मंच में बदल गई। परवीन अब तक 25 प्रदर्शनियों का आयोजन कर चुकी हैं। शुरुआत के 12 स्टॉल बढ़कर 120 तक पहुंच गए हैं। उनके मंच से हजारों महिलाएं जुड़ चुकी हैं। कई महिलाओं ने अपने घरों से कारोबार शुरू किया और बाद में दुकानें खोल लीं।

परवीन का उद्देश्य केवल महिलाओं को प्रदर्शनी में स्टॉल देना नहीं है। वह चाहती हैं कि हर महिला का अपना ब्रांड हो और उसकी दुकान के बाहर उसके नाम का बोर्ड लगा हो। उनका मानना है कि महिलाओं को अस्थायी बिक्री के अवसर से आगे बढ़कर स्वतंत्र कारोबारी बनना चाहिए।

कारोबार के साथ हुनर को भी पहचान

हीरा बुटीक की प्रदर्शनियों में केवल कपड़े और आभूषण नहीं बिकते। यहां मेहंदी कलाकारों, मेकअप आर्टिस्ट, दर्जियों और हस्तशिल्प से जुड़े लोगों को भी जगह मिलती है। इस तरह अलग-अलग हुनर रखने वाली महिलाओं को अपने काम का प्रदर्शन करने और ग्राहक बनाने का अवसर मिलता है।

परवीन बच्चों के लिए भी गतिविधियों वाले स्टॉल लगवाती हैं। उनका मानना है कि बच्चों को हर समय मोबाइल फोन में व्यस्त रखने के बजाय उन्हें रचनात्मक कामों से जोड़ना चाहिए। कला, शिल्प और दूसरी गतिविधियां बच्चों को नई चीजें सीखने का मौका देती हैं।

वह इस बात पर भी जोर देती हैं कि मेहंदी, सिलाई और मेकअप जैसे कामों को छोटा नहीं समझना चाहिए। इन कामों को सीखने और आगे बढ़ाने में समय, मेहनत और पैसा लगता है। इसलिए इनके जरिए आजीविका कमाने वाली महिलाओं को सम्मान मिलना चाहिए।

परवीन का एक महत्वपूर्ण संदेश समय के सही इस्तेमाल से जुड़ा है। उनके अनुसार, पैसे के पीछे भागने के बजाय अपने समय और हुनर को बेहतर बनाने पर ध्यान देना चाहिए। मेहनत और लगन से आमदनी के रास्ते अपने आप खुल सकते हैं।

हर तीन महीने में प्रदर्शनी लगाने की खास वजह

महिलाओं की बढ़ती मांग के बावजूद परवीन हर महीने प्रदर्शनी आयोजित नहीं करतीं। वह आमतौर पर तीन महीने में एक बार आयोजन करना पसंद करती हैं। इसके पीछे उनका मानना है कि हर महीने ग्राहक खरीदारी नहीं करते। बार-बार प्रदर्शनी लगाने से स्टॉल लगाने वाली महिलाओं की बिक्री प्रभावित हो सकती है।

वह चाहती हैं कि प्रदर्शनी में आने वाली हर महिला को वास्तविक आर्थिक लाभ मिले। परवीन खुद भी मध्यमवर्गीय परिवार से आती हैं और कारोबार की जरूरतों को समझती हैं। फिर भी उनका कहना है कि अगर किसी महिला को ग्राहक नहीं मिलते और उसका सामान नहीं बिकता, तो उससे स्टॉल का पैसा लेना उचित नहीं होगा।

उनकी प्राथमिकता बड़े आयोजन या भीड़ जुटाना नहीं, बल्कि महिलाओं की बिक्री और आजीविका को बेहतर बनाना है। यह सोच उनके कारोबार को सामान्य प्रदर्शनी आयोजन से अलग पहचान देती है।

‘रिश्ता हीरा’ से परिवारों को जोड़ने की पहल

परवीन का काम केवल महिला उद्यमिता तक सीमित नहीं है। पिछले दो वर्षों से वह ‘रिश्ता हीरा’ नाम से विवाह संबंधों से जुड़ी एक पहल भी चला रही हैं। इसका उद्देश्य उन परिवारों की मदद करना है, जिन्हें अपने बेटे या बेटी के लिए उपयुक्त रिश्ता तलाशने में परेशानी होती है।

कई मध्यमवर्गीय परिवार विवाह संबंध कराने वाली एजेंसियों की महंगी फीस नहीं दे सकते। परवीन ऐसे परिवारों को एक मंच पर लाती हैं। लड़के और लड़कियों की जानकारी तथा प्रोफाइल साझा की जाती हैं। इसके बाद परिवार आमने-सामने बैठकर बातचीत कर सकते हैं।

इस पहल में रिश्ता तय होने पर परवीन कोई शुल्क नहीं लेतीं। हालांकि, बैठक के लिए हॉल और नाश्ते की व्यवस्था के खर्च को पूरा करने के लिए पंजीकरण शुल्क लिया जाता है। परिवारों को छह महीने तक संबंधित समूह से जुड़े रहने की सुविधा भी दी जाती है।

इस पहल को दुबई, ऑस्ट्रेलिया और कनाडा से भी पूछताछ मिल रही है। परवीन ने 15 नवंबर को दुबई में ‘रिश्ता हीरा’ कार्यक्रम आयोजित करने की योजना बनाई है।

पुणे की महिलाओं को दुबई के बाजार तक पहुंचाने की तैयारी

परवीन की दुबई यात्रा का एक दूसरा उद्देश्य भी है। वह पुणे और भारत के अन्य शहरों की महिलाओं के उत्पादों को अंतरराष्ट्रीय बाजार तक पहुंचाना चाहती हैं। उनकी योजना है कि प्रदर्शनियों से जुड़ी महिलाएं दुबई में भी स्टॉल लगाएं और वहां के ग्राहकों के सामने अपने उत्पाद पेश करें।

उनका मानना है कि अगर किसी महिला के उत्पाद को दुबई में ग्राहक पसंद करते हैं, तो वह भारत लौटने के बाद भी ऑनलाइन माध्यम से कारोबार जारी रख सकती है। इस तरह एक ग्राहक से नए ग्राहक जुड़ सकते हैं और कारोबार का दायरा बढ़ सकता है।

देश के कई शहरों की महिलाएं उनके मंच से जुड़ी हैं। हांगकांग की कुछ महिलाओं ने भी दुबई में होने वाली प्रदर्शनी में भाग लेने की इच्छा जताई है। परवीन चाहती हैं कि महिलाओं को बेहतर बाजार मिले और वे अपने उत्पादों को देश की सीमाओं से बाहर भी पहचान दिला सकें।

मुस्लिम महिलाओं के लिए आत्मनिर्भरता का संदेश

परवीन का मानना है कि हिजाब और नकाब पहनने वाली महिलाएं भी कारोबार कर सकती हैं और अपनी अलग पहचान बना सकती हैं। उनके अनुसार, महिला की सफलता का संबंध उसके कपड़ों से नहीं, बल्कि उसके हुनर, मेहनत और आत्मविश्वास से है।

लॉकडाउन के बाद उन्होंने इसी संदेश के साथ सोशल मीडिया पर एक वीडियो साझा किया था। इसके बाद कई महिलाओं ने उनसे संपर्क किया। शुरुआत में कुछ परिवार अपनी महिलाओं को प्रदर्शनी में भेजने से हिचकिचाते थे। लेकिन जब उन्होंने आयोजन का माहौल और महिलाओं के काम को देखा तो उनका भरोसा बढ़ा।

इन आयोजनों में परिवार के पुरुष सदस्य भी महिलाओं की मदद करते हैं। परवीन के पति जाकिर सैयद और उनके बच्चे हर कदम पर उनके साथ रहे हैं। उनकी बेटी, तीन बेटे, बहू और दामाद भी इस काम में सहयोग करते हैं। उनका एक बेटा कारोबार के प्रबंधन की जिम्मेदारी संभालता है।

हाल ही में परवीन ने अपनी प्रदर्शनी में मेहनती महिलाओं को ताज पहनाकर सम्मानित भी किया। इनमें सफाई का काम करने वाली महिलाएं भी शामिल थीं। इस पहल का उद्देश्य उन महिलाओं की मेहनत को पहचान देना था, जिनकी जिम्मेदारियों और योगदान की अक्सर चर्चा नहीं होती।

53 वर्ष की उम्र में परवीन सैयद का सफर इस बात की मिसाल है कि सीमित पूंजी और साधारण शुरुआत के बावजूद बड़ा काम किया जा सकता है। उन्होंने अपने लिए कारोबार खड़ा किया, लेकिन उनकी सफलता का असली अर्थ उन महिलाओं की प्रगति में दिखाई देता है, जिन्हें उन्होंने आगे बढ़ने का अवसर दिया। उनका संदेश साफ है। अपने हुनर पर भरोसा कीजिए, समय का सम्मान कीजिए और आगे बढ़ते हुए दूसरी महिलाओं का हाथ भी थामिए।