नई दिल्ली:
बॉलीवुड के दमदार अभिनेताओं में गिने जाने वाले Manoj Bajpayee ने अपने अभिनय से भारतीय सिनेमा में एक अलग पहचान बनाई है। तीन दशक से अधिक लंबे करियर में उन्होंने कई यादगार किरदार निभाए हैं, लेकिन हाल ही में एक पॉडकास्ट में उन्होंने अपने जीवन के ऐसे पहलू साझा किए, जिनमें सफलता के साथ-साथ पछतावा भी शामिल है। अभिनेता ने स्वीकार किया कि कभी-कभी उनका मन अभिनय छोड़ने का भी करता है और उन्हें सबसे ज्यादा अफसोस इस बात का है कि वे अपने माता-पिता के साथ पर्याप्त समय नहीं बिता सके।
बातचीत के दौरान मनोज बाजपेयी ने कहा कि पिछले लगभग दस वर्षों से उनके मन में कई बार अभिनय छोड़ने का विचार आया। हालांकि हर बार कोई नया और चुनौतीपूर्ण किरदार उन्हें फिर से अभिनय की दुनिया में खींच लाता है।
उन्होंने कहा, “सच कहूं तो पिछले करीब दस सालों में कई बार ऐसा लगा कि अब अभिनय छोड़ देना चाहिए। लेकिन फिर कोई नया किरदार सामने आ जाता है और मैं अपना फैसला बदल देता हूं। मैं मजबूरी में अभिनय नहीं करता, न घर चलाने के लिए और न किसी आर्थिक आवश्यकता के कारण। मैं अभिनय इसलिए करता हूं क्योंकि मुझे किरदारों को जीना पसंद है।”
मनोज ने यह भी खुलासा किया कि इन दिनों उनका रुझान व्यावसायिक फिल्मों की ओर बढ़ रहा है। उन्होंने कहा कि लंबे समय तक गंभीर और चुनौतीपूर्ण भूमिकाएं निभाने के बाद अब उनका मन हल्की-फुल्की मनोरंजक फिल्मों में काम करने का है।
उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, “आजकल मेरा मन कॉमर्शियल फिल्मों की ओर जा रहा है। हल्की-फुल्की कॉमेडी, गानों पर थोड़ा-बहुत डांस और बिना ज्यादा मानसिक दबाव के काम करना अच्छा लगने लगा है। शायद यह बात मैं पहली बार सार्वजनिक रूप से कह रहा हूं।”
हालांकि बातचीत का सबसे भावुक हिस्सा वह था जब मनोज ने अपने माता-पिता को याद किया। अभिनेता ने स्वीकार किया कि करियर बनाने और सफलता हासिल करने की दौड़ में वे अपने परिवार से दूर होते चले गए।
उन्होंने कहा, “जब मैं पीछे मुड़कर देखता हूं तो महसूस होता है कि मैंने बहुत कुछ खो दिया। मुझे अपने माता-पिता के साथ पर्याप्त समय बिताने का अवसर नहीं मिला। जब उनके जीवन का अंतिम दौर आया, तब हम एक-दूसरे को समझने की कोशिश कर रहे थे। मैं उनके साथ उतना नहीं रह पाया जितना मुझे रहना चाहिए था।”
मनोज के अनुसार, सफलता की तलाश में वे लगातार संघर्ष और काम में व्यस्त रहे, जिसके कारण परिवार के साथ उनके संबंधों में दूरी आ गई थी। यह बात आज भी उन्हें भीतर से दुखी करती है।
अभिनेता ने अपने शुरुआती संघर्षों को याद करते हुए बताया कि उनका बचपन एक साधारण ग्रामीण परिवेश में बीता। पढ़ाई के लिए उन्हें कम उम्र में ही बोर्डिंग स्कूल भेज दिया गया था। बाद में अभिनेता बनने का सपना लेकर वे दिल्ली पहुंचे।
उन्होंने कहा, “हम गांव से थे, इसलिए बोर्डिंग स्कूल में रहना पड़ा। फिर अभिनय का सपना लेकर दिल्ली आया। वहां मैंने सिर्फ अभिनय ही नहीं सीखा, बल्कि अंग्रेजी भाषा, शहर का जीवन और आत्मनिर्भर बनना भी सीखा। कई बार रोज के खाने की व्यवस्था करना भी एक चुनौती होती थी।”
मनोज बाजपेयी की यह स्वीकारोक्ति दिखाती है कि सफलता की चमक के पीछे कई बार व्यक्तिगत त्याग और भावनात्मक संघर्ष भी छिपे होते हैं। आज भले ही वह भारतीय सिनेमा के सबसे सम्मानित अभिनेताओं में शामिल हों, लेकिन परिवार के साथ बिताए न जा सके समय की कमी उन्हें अब भी महसूस होती है।