Lata Mangeshkar's death anniversary: Some unheard stories of the Nightingale of India
अर्सला खान/नई दिल्ली
भारत की संगीत दुनिया में लता मंगेशकर एक ऐसा नाम हैं, जिनकी आवाज़ ने पीढ़ियों को भावनाओं से जोड़ा। जब भी उनकी पुण्यतिथि आती है, तो सिर्फ उनके गाए गीत ही नहीं, बल्कि उनसे जुड़ी यादें, किस्से और अनकहे पहलू भी ज़ेहन में ताज़ा हो जाते हैं। लता जी सिर्फ एक महान गायिका नहीं थीं, बल्कि अनुशासन, सादगी और आत्मसम्मान की मिसाल भी थीं। उनके जीवन से जुड़े कई ऐसे किस्से हैं, जो कम लोगों को ही मालूम हैं।
लता मंगेशकर का जन्म 28 सितंबर 1929 को इंदौर में हुआ था। उनके पिता पंडित दीनानाथ मंगेशकर खुद एक जाने-माने रंगमंच कलाकार और शास्त्रीय गायक थे। बहुत कम उम्र में ही लता जी ने जीवन की कठिनाइयों का सामना किया। जब वह सिर्फ 13 साल की थीं, तब उनके पिता का निधन हो गया। इसके बाद परिवार की जिम्मेदारी उनके नाज़ुक कंधों पर आ गई। यही वह दौर था, जिसने लता जी को असाधारण रूप से मजबूत बनाया।
एक अनसुना किस्सा यह है कि लता जी को शुरुआत में “बहुत पतली आवाज़” कहकर कई संगीतकारों ने नकार दिया था। उस दौर में नूरजहाँ जैसी भारी और परिपक्व आवाज़ों का चलन था। लेकिन लता जी ने हार नहीं मानी। उन्होंने अपनी आवाज़ पर मेहनत की, रियाज़ किया और धीरे-धीरे अपनी अलग पहचान बना ली। संगीतकार गुलाम हैदर ने सबसे पहले उनकी प्रतिभा को पहचाना और उन्हें बड़ा मौका दिया।
लता मंगेशकर बेहद अनुशासनप्रिय थीं। कहा जाता है कि वह रिकॉर्डिंग से पहले गीत के हर शब्द और भाव को समझती थीं। कई बार वह संगीतकारों से सवाल पूछती थीं कि किसी पंक्ति को किस भावना के साथ गाना है। यह आदत उन्हें दूसरों से अलग बनाती थी। वह सिर्फ गाना नहीं गाती थीं, बल्कि गीत को जीती थीं।
एक दिलचस्प किस्सा यह भी है कि लता जी को शुरू में ऊँची एड़ी की चप्पल पहनने का शौक था। लेकिन एक बार रिकॉर्डिंग के दौरान संगीतकार नौशाद ने उनसे कहा कि गाने में पूरी तल्लीनता के लिए सादगी ज़रूरी है। इसके बाद लता जी ने हमेशा सादा पहनावा अपनाया, जो आगे चलकर उनकी पहचान बन गया।
बहुत कम लोग जानते हैं कि लता मंगेशकर को मंच पर बोलने में झिझक होती थी। वह इंटरव्यू और सार्वजनिक भाषणों से बचती थीं। उन्हें लगता था कि उनकी आवाज़ का असली काम गाना है, बोलना नहीं। यही वजह थी कि वह मीडिया से हमेशा एक दूरी बनाए रखती थीं।
लता जी का दिल बहुत नरम था। वह चुपचाप कई कलाकारों और जरूरतमंद लोगों की मदद करती थीं, लेकिन कभी इसका ज़िक्र नहीं करती थीं। एक बार किसी पुराने संगीतकार के बीमार होने की खबर मिली, तो लता जी ने बिना बताए उनकी आर्थिक मदद की। यह बात सालों बाद सामने आई।
उनका देशप्रेम भी किसी से छिपा नहीं था। 1963 में जब उन्होंने पंडित जवाहरलाल नेहरू के सामने “ऐ मेरे वतन के लोगों” गाया, तो पूरा माहौल भावुक हो गया। कहा जाता है कि यह गीत सुनकर नेहरू जी की आँखों से आँसू बह निकले थे। लता जी इसे अपने जीवन के सबसे भावनात्मक पलों में से एक मानती थीं।
लता मंगेशकर ने कभी शादी नहीं की, लेकिन उनका कहना था कि संगीत ही उनका जीवन साथी है। उन्होंने अपना पूरा जीवन सुरों और रागों को समर्पित कर दिया। उन्हें अकेलापन कभी महसूस नहीं हुआ, क्योंकि गीतों के ज़रिये वह करोड़ों दिलों में बसती थीं।
लता जी को कई भाषाओं में गाने का हुनर हासिल था। हिंदी के अलावा उन्होंने मराठी, बंगाली, तमिल, तेलुगु, उर्दू और नेपाली सहित कई भाषाओं में गीत गाए। वह किसी भी भाषा के उच्चारण को सही करने के लिए खास मेहनत करती थीं।
लता मंगेशकर का निधन 6 फरवरी 2022 को हुआ, लेकिन उनकी आवाज़ आज भी अमर है। उनकी पुण्यतिथि हमें यह याद दिलाती है कि सच्ची लगन, मेहनत और सादगी से इंसान कैसे इतिहास बन सकता है। लता जी के ये अनसुने किस्से सिर्फ उनकी महानता नहीं, बल्कि उनके इंसान होने की खूबसूरती को भी सामने लाते हैं। सुरों की यह सरस्वती भले ही हमारे बीच न हों, लेकिन उनकी आवाज़ हमेशा हमारे दिलों में गूंजती रहेगी।