हैदराबाद:
मौलाना आजाद नेशनल उर्दू यूनिवर्सिटी (MANUU) के स्कूल ऑफ आर्ट्स एंड सोशल साइंसेज के समाजशास्त्र विभाग ने बौद्धिक स्वायत्तता और स्वतंत्र चिंतन के महत्व पर एक विशेष व्याख्यान का आयोजन किया। इसमें भारतीय प्रबंधन संस्थान (IIM), कोझिकोड, केरल के ह्यूमैनिटीज एंड लिबरल आर्ट्स इन मैनेजमेंट से जुड़े डॉ. इरफानुल्लाह फारूकी ने विद्यार्थियों और शोधार्थियों को संबोधित किया।
व्याख्यान में डॉ. इरफानुल्लाह फारूकी ने शोध के क्षेत्र में आलोचनात्मक चिंतन की जरूरत पर जोर दिया। उन्होंने समाजशास्त्रीय शोध के नैतिक और अनैतिक पहलुओं पर भी चर्चा की। उनका कहना था कि किसी विषय की स्पष्ट अनुशासनात्मक समझ शोधकर्ताओं को गहराई से सोचने और अपने अध्ययन के प्रति आलोचनात्मक दृष्टिकोण विकसित करने में मदद करती है।
कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) के बढ़ते प्रभाव का उल्लेख करते हुए डॉ. फारूकी ने कहा कि एआई जानकारी जुटाने और सीखने की प्रक्रिया में उपयोगी साधन हो सकता है। हालांकि, विद्यार्थियों को केवल एआई से तैयार जानकारी पर निर्भर नहीं रहना चाहिए।
उन्होंने छात्रों को अपने शोध विषयों का गहराई से अध्ययन करने और उपलब्ध ज्ञान का स्वतंत्र रूप से विश्लेषण तथा व्याख्या करने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने कहा कि शोधार्थियों में अपनी समझ विकसित करने और तथ्यों को परखने की क्षमता होनी चाहिए।
डॉ. फारूकी ने अकादमिक और शोध गतिविधियों में बौद्धिक स्वायत्तता तथा स्वतंत्र विचार की अहमियत को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि शोधकर्ता होना केवल किसी संस्थान से जुड़ने या औपचारिक पद हासिल करने तक सीमित नहीं है। इसके लिए आंतरिक वैचारिक दृढ़ता, आलोचनात्मक सोच और मौलिक विचार विकसित करने की क्षमता भी जरूरी है।
उनके मुताबिक, एक अच्छा शोधकर्ता वही है जो स्थापित विचारों को समझने के साथ-साथ उन पर सवाल उठा सके और अपने स्वतंत्र निष्कर्षों तक पहुंचने का प्रयास करे।
व्याख्यान के दौरान उच्च शिक्षा के अलग-अलग स्तरों पर बौद्धिक क्षमताओं के विकास पर भी चर्चा हुई। डॉ. फारूकी ने बताया कि स्नातक स्तर पर विद्यार्थियों से मुख्य रूप से क्लासिकल ग्रंथों को समझने, उनकी व्याख्या करने और उनका सार प्रस्तुत करने की अपेक्षा की जाती है।
वहीं, स्नातकोत्तर स्तर पर विद्यार्थियों को इससे आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। इस स्तर पर विभिन्न सिद्धांतों और विद्वानों के विचारों को आपस में जोड़कर अपनी आलोचनात्मक समझ विकसित करना महत्वपूर्ण होता है।
विशेष व्याख्यान में बौद्धिक स्वतंत्रता, आलोचनात्मक दृष्टिकोण और स्वतंत्र जिज्ञासा को मजबूत बनाने पर जोर दिया गया। वक्ता ने इन क्षमताओं को अकादमिक गुणवत्ता और बेहतर शोध परंपरा के लिए महत्वपूर्ण बताया।
कार्यक्रम ने विद्यार्थियों और शोधार्थियों के सामने यह विचार रखा कि ज्ञान हासिल करने के साथ-साथ उसे समझना, परखना और अपने विवेक से उसकी व्याख्या करना भी शिक्षा का महत्वपूर्ण उद्देश्य है।