आवाज द वॉयस/नई दिल्ली
सोशल मीडिया मंचों पर मानसिक स्वास्थ्य संबंधी जानकारी लेने और समान अनुभव वाले लोगों से जुड़ने के लिए बढ़ती निर्भरता के बीच एक नए अध्ययन में पाया गया है कि ऑनलाइन चर्चाओं का केंद्र अब अवसाद और चिंता जैसे पारंपरिक मानसिक विकारों से हटकर एडीएचडी (अटेंशन डेफिसिट हाइपरएक्टिविटी डिसऑर्डर) और ऑटिज्म जैसी तंत्रिका तंत्र संबंधी समस्याएं बन रही हैं।
शोधकर्ताओं ने सोशल मीडिया मंच ‘रेडिट’ पर मानसिक स्वास्थ्य से संबंधित 1.4 करोड़ से अधिक पोस्ट और टिप्पणियों का विश्लेषण कर यह निष्कर्ष निकाला। अध्ययन के अनुसार, सोशल मीडिया मानसिक स्वास्थ्य के बारे में लोगों की समझ, बीमारी की पहचान और उपचार के लिए सहायता प्राप्त करने के तरीकों को महत्वपूर्ण रूप से प्रभावित कर रहा है।
अध्ययन में कहा गया है कि हाल के वर्षों में लोग मानसिक स्वास्थ्य संबंधी जानकारी के लिए टिकटॉक, इंस्टाग्राम, यूट्यूब और रेडिट जैसे मंचों का अधिक इस्तेमाल कर रहे हैं। यह रुझान केवल अवसाद, चिंता और शिजोफ्रेनिया जैसे मानसिक विकारों तक सीमित नहीं है, बल्कि ऑटिज्म, एडीएचडी, टॉरेट सिंड्रोम और डिस्लेक्सिया जैसी उन स्थितियों तक भी फैला हुआ है जिन्हें आमतौर पर ‘‘न्यूरोडाइवर्जेंट’’ श्रेणी में रखा जाता है।
शोधकर्ताओं ने बताया कि टिकटॉक पर ‘एडीएचडी’ हैशटैग को 50 अरब से अधिक बार देखा जा चुका है, जो इस विषय में बढ़ती सार्वजनिक रुचि को दर्शाता है।
अध्ययन के अनुसार, सोशल मीडिया पर मानसिक स्वास्थ्य संबंधी सामग्री के बढ़ते प्रसार से यह बदलाव आया है। इससे मानसिक बीमारियों से जुड़े सामाजिक कलंक में कमी आने और मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं के उपयोग को बढ़ावा मिलने की संभावना है। हालांकि, इसके कुछ नकारात्मक प्रभाव भी सामने आए हैं।
शोधकर्ताओं ने कहा कि मानसिक स्वास्थ्य संबंधी चर्चाओं में गलत और भ्रामक जानकारी भी व्यापक रूप से मौजूद है। एक अध्ययन में पाया गया था कि टिकटॉक पर एडीएचडी से जुड़े सबसे लोकप्रिय वीडियो में से अधिकतर में भ्रामक या गलत जानकारी थी। अन्य मानसिक स्वास्थ्य स्थितियों के बारे में भी ऐसी गलत सूचनाएं आम हैं।