प्रो. अख़्तरुल वासे
नात-गोई, शायरी की सबसे पुरानी विधाओं में से एक है. अगर देखा जाए तो नात की शैली तो पवित्र कुरान में मौजूद है, लेकिन कुरान शायरी की किताब नहीं है और नात-गोई शायरी है. इसलिए नात-गोई की कला के संस्थापक हज़रत अबू तालिब हैं, जो पैग़ंबर मुहम्मद (सल्ल.) के चाचा हैं.
हजरत अबू तालिब ने नात-गोई की शुरूआत की. जनाब हसन बिन साबित और काब बिन ज़हीर ने इसको आगे बढ़ा कर एक ऐसा माहौल बनाया कि अलग-अलग भाषाओं में हजारों लोगों ने मस्त होकर इस बाग़ को रोशनी और ख़ूशबू से सजाते व महकाते रहे.
यह विधा इतनी मनमोहक है कि जैसे इसमें भाषा की क़ैद समाप्त हो गई हो, एक समय ऐसा भी आया जब धर्म भी नात के आड़े नहीं आयाए और अनगिनत ग़ैर-मुसलमानों को यह नारा देते देखा गयाः
इश्क़ हो जाए किसी से कोई चारा तो नहीं
सिर्फ़ मुस्लिम का मुहम्मद पे इजारा तो नहीं
और कहीं ये आवाजें गूंजने लगींः
मोमिन ही के दिल में नहीं सौदाए मुहम्मद
हर दिल में है फ़िदा-ए-रुख़-ए-ज़ेबाए मुहम्मद
हिंदुस्तान की भूमि, जिसे मज़हब और धर्म से विशेष लगाव है, और जो अपनी उदारता और सहिष्णुता के लिए बेमिसाल है. इस भूमि पर शायरों ने नात कहने के लिए अरबी और फ़ारसी की भी नकल की और यहाँ के रंग और मिज़ाज में रची बसी एक नई शैली भी तैयार की.
मिसाल के लिए मोहसिन काकोरी का क़सीदा (वह शायरी जिसमें किसी की तारीफ़ या आलोचना की जाए) हैः
सिम्त काशी से चला जानिब-ए-मथुरा बादल
बर्क़ के काँधे पे लाती है सबा गंगाजल
यह कविता शुद्ध भारतीय शैली है. इसमें भारतीय पौराणिक पात्रों को नात से जोड़ा गया है. जिस तरह इस धरती पर मुसलमानों ने पैगंबर की नात के ये गीत गाए, उसी तरह हिंदुओं ने भी इस मैदान में नम्रता और अनुग्रह के साथ सलाम किया और ऐसे भक्ति गीत पेश किए जो पूरी तरह से भावना में डूबे हुए थे.
कई शायरों के पास नात इतने ज़्यादा हैं कि उनके कई संग्रह प्रकाशित हुए. जैसे काली दासगुप्ता रज़ा ने अपनी नातों का संग्रह ‘‘उजाला’’ के नाम से प्रकाशित किया और ऐसे कई शायर हैं जिन्होंने एक या कुछ नातें कही हैं.
हिंदू शायरों की शायरी से बहुत से लोग लाभान्वित होते रहते हैं, लेकिन इसके बावजूद यह सबकी पहुँच से बाहर थे. अखबारों, पत्रिकाओं और दीवान (ग़ज़लों की पुस्तक) में छपे इस बाग़ को फिर से सजाने का सौभाग्य धर्मेंद्र नाथ को मिला.
धर्मेंद्रनाथ इसके हक़दार थे कि उन्हें यह खुशी मिलती. उन्होंने अपना अधिकांश जीवन इसी मैदान में बिताया. वह जामिया मिल्लिया इस्लामिया के पुराने लोगों में से हैं और जामिया की मज़हबी रंगारंगी की अजीबो-ग़रीब मिसाल हैं.
जामिया का यह नियम है कि जब भी यहां कोई सभा या संगोष्ठी आयोजित होती है तो उसकी शुरुआत पवित्र कुरान के पाठ से होती है. जामिया की यह परंपरा यहां का अदब और यहाँ का तरीक़ा है, कोई धार्मिक पक्षपात नहीं.
इसका जीता-जागता सबूत हैं डॉ. धर्मेन्द्रनाथ, जिन्होंने जामिया की चारदीवारी में कई सभाओं के प्रारंभ में पवित्र कुरान की तिलावत करने का सौभाग्य प्राप्त किया.
डॉ. धर्मेंद्रनाथ अपने छात्र जीवन से ही पैगंबर मुहम्मद की ज़िंदगी से बहुत ज़्यादा लगाव था. जब वे माध्यमिक विद्यालय में थे, उस समय उन्होंने दिल्ली के सभी मुस्लिम स्कूलों में जीवनी पर भाषण प्रतियोगिता में प्रथम स्थान प्राप्त किया था.
विद्यार्थी काल का यह जोश और शौक़ जान से ज़्यादा प्यारा बना रहा और समय बीतने के साथ उसमें परिपक्वता आती गयी. आज उनकी लगन और लगाव की चमक के साथ उनकी अनूठी किताब ‘‘हमारे रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम’’ के रूपर में हमारे सामने मौजूद है.
इस मोटी किताब में उन्होंने गैर-मुस्लिम उर्दू शायरों के नातों का संग्रह किया है. अपनी तरह की इस अनूठी किताब में उर्दू के 394, फारसी के 25, हिंदी के 7, पंजाबी के 4, गुजरी का 1, सिंधी के 2 और मराठी के 2 हिंदू शायरों के नातिया कलाम और उनकी संक्षिप्त जीवनी संबंधी जानकारी एकत्र की गई है.
यह पुस्तक इस्लामिक गणराज्य, ईरान के दिल्ली दूतावास द्वारा प्रकाशित की गई है. यह पुस्तक में केवल शायरों की शायरी नहीं है बल्कि यह पुस्तक नातगोई की कला का एक व्यापक संग्रह भी है.
लगभग 250 पृष्ठों में नातगोई का इतिहास, नातगोई की कला में दिलचस्पियाँ और नातगोई में शायरों के विभिन्न अनुभवों का वर्णन किया गया है. उसके बाद शायरों की शायरी और उनके हालात लिखे गए हैं और इस भाग का नाम ‘‘गुलशन-ए-बेख़िज़ाँ’’ रखा है जो वाक़ई ऐसी बहार है जिसमें किसी ख़िज़ाँ का गुज़र नहीं.
पुस्तक समर्पित है वरफ़ा‘ना लका ज़िकरक (और हमने तुम्हारे लिए तुम्हारा ज़िक्र बुलंद कर दिया) के हवाले से स्वयं पैगंबर मुहम्मद सल्ल. के नाम पर, और इसकी प्रासंगिकता का वर्णन करते हुए, यह उन प्रबुद्ध दिमागों के नाम पर एक व्यावहारिक समर्पण है जिन्होंने सभी में हक़ की रौशनी देखी है.
डॉ. धर्मेंद्रनाथ, जो निस्संदेह अपने पिता पंडित गोपीनाथ अमन लखनवी के असली उत्तराधिकारी और उनकी परंपरा के संरक्षक हैं, ने इस पुस्तक को संकलित करके एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है.
इसमें हम उपमहाद्वीप की सांस्कृतिक परंपरा में निहित नात-गोई और पैग़म्बर मुहम्मद की बारगाह में श्रद्धांजलि के फूल नज़र आते हैं. तुलसीदास को हम रामायण के हवाले जानते हैं.
लेकिन लोग नातगोई में उनके ख़ूबसूरत प्रयासों से वाक़िफ़ नहीं, जब वे कहते हैंः
तब तक जो सुन्दरम् चहे कोई
बिना मुहम्मद पार न होई
और शुद्ध हिंदी रंग में डूबी हुई राग खमांच में इस क़व्वाली की दाद तो दिलचस्पी लेने वाले ही दे सकते हैंः
जग ज्योति, स्वामी अवतारी, तेरे रूप की वारी सैयदना
मनमोहन गिरधर, गिरधारी, तेरे रूप की वारी सैयदना
रघुपति सहाय फ़िराक़ गोरखपुरी की रुबाईः
अनवार बेशुमार मादूद नहीं
रहमत की शाहराह मसदूद नहीं
मालूम है कुछ तुमको मुहम्मद का मक़ाम
वह उम्मत-ए-इस्लाम में महदूद नहीं
यह किताब वास्तव में फ़िराक़ गोरखपुरी की उसी रुबाई (चौपाई) की व्याख्या है कि नात-ए-मुहम्मद (सल्ल.) इस्लाम के मानने वालों तक सीमित नहीं हैं बल्कि और भी सैकड़ों ऐसे हैं जो इस्लाम धर्म का पालन नहीं करते हैं लेकिन नातगोई की महफ़िलों में भाग लेते रहते हैं.
उनका यह भाग लेना वास्तव में उस सहिष्णुता और उदारता की मिसाल है जो हिंदुस्तान के समाज व मज़हब में रची बसी है.ख़ूबसूरत राइटिंग से सजी, कागज पर सुंदर अलंकृत आवरण से सजी यह पुस्तक अत्यंत प्रशंसनीय उपलब्धि है.
आज ज़रूरत इस बात की है कि इस तरह के प्रयासों की सराहना की जाए और इसको आगे बढ़ाया जाए.
(लेखक जामिया मिल्लिया इस्लामिया के प्रोफेसर एमेरिटस (इस्लामिक स्टडीज) हैं।)