मंजीत ठाकुर
हर साल 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस समारोह में राजपथ पर जबरदस्त झांकी और परेड निकलती है. दूरदर्शन के जरिए हम सभी इस दृश्य को देखने को अभ्यस्त हैं. लेकिन सवाल है कि क्या शुरू से ही गणतंत्र दिवस की परेड राजपथ पर होती थी?
नहीं. देश का पहला गणतंत्र दिवस समारोह 26 जनवरी, 1950 को आयोजित हुआ था और उस दिन की परेड राजपथ पर आयोजित नहीं हुई थी बल्कि वह तब के इर्विन स्टेडियम में आयोजित किया गया था. इसी स्टेडियम को आज नेशनल स्टेडियम या मेजर ध्यानचंद स्टेडियम कहा जाता है. 1950 में इर्विन स्टेडियम में दीवारें नहीं बनी थी और इसलिए उसके पीछे से पुराना किला नजर आता था.
पहले पांच गणतंत्र दिवस के आयोजन राजपथ पर नहीं, कभी इर्विन स्टेडियम, कभी किंग्सवे कैंप, कभी लाल किला तो कभी रामलीला मैदान में आयोजित हुए. यह सिलसिला आज तक बना हुआ है. अब आठ किलोमीटर की दूरी तय करने वाली यह परेड रायसीना हिल से शुरू होकर राजपथ, इंडिया गेट से गुजरती हुई लालकिला पर ख़त्म होती है.
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स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर देश में संविधान लागू होने तक, 26जनवरी की तारीख की अपनी अहमियत रही है.
असल में, इसी दिन जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में कांग्रेस का लाहौर अधिवेशन हुआ था उसमें एक महत्वपूर्ण प्रस्ताव पारित हुआ था, जिसमें कहा गया था कि अगर ब्रिटिश सरकार ने 26जनवरी, 1930तक भारत को उपनिवेश का दर्जा (डोमीनियन स्टेटस) नहीं दिया, तो भारत को पूर्ण स्वतंत्र घोषित कर दिया जाएगा.
ब्रिटिश सरकार ने कांग्रेस की इस मांग पर ध्यान नहीं दिया और इसी वजह से सूरत में कांग्रेस ने 31 दिसंबर, 1929 की आधी रात को भारत की पूर्ण स्वतंत्रता के निश्चय की घोषणा करते हुए सक्रिय आंदोलन शुरू किया था.
कांग्रेस के लाहौर अधिवेशन में पहली बार तिरंगा फहराया गया और हर साल 26जनवरी के दिन पूर्ण स्वराज दिवस मनाने का भी फैसला लिया गया. इस तरह, आजादी मिलने से पहले ही 26जनवरी, अनौपचारिक रूप से देश का स्वतंत्रता दिवस बन गया था.
यही कारण था कि देश भर में उस दिन से 1947 में आजादी मिलने तक, 26 जनवरी को स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाया जाता रहा.
बहरहाल, 24 जनवरी, 1950 को संविधान सभा के 308 सदस्यों ने अपने-अपने दस्तखत मसौदे पर किए—पहले हिंदी में और फिर अंग्रेजी में, हालांकि मसौदे मे कुछ बदलाव भी किए गए थे.
26 जनवरी, 1950 की सुबह तीखी धूप खिलकर निकली थी. हालांकि, इसके पहले के कुछ दिन दिल्ली में चिल्ला जाड़ा पड़ रहा था. इस तेज धूप के साथ ही देश के लिए चमकीले वक्त की इबारत लिखी जा रही थी.
1950 में 26 जनवरी का दिन गुरुवार था और लोगों में काफी चहल पहल देखी जा रही थी. इस शानदार दिन के लिए लोग हफ्तों से तैयारियां कर रहे थे. आयोजन में हिस्सा लेने वाला लोग इस ऐतिहासिक दिन के लिए रिहर्सल कर रहे थे.
इसी दिन भारत के पहले राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद अपना कार्यकाल शुरू करने वाले थे. जैसे ही दिन निकला, दिल्ली में जोश से भरे लोगों का बड़ा सा जुलूस निकला था. ढोल बजाए जा रहे थे और शंख फूंके जा रहे थे. इसके साथ ही लोग देशभक्ति के गीत गा रहे थे. ऐसा जश्न सिर्फ दिल्ली में नहीं, बल्कि पूरे देश में मनाया जा रहा था.
1950 में देश के पहले भारतीय गवर्नर जनरल चक्रवर्ती राजगोपालाचारी ने 26 जनवरी गुरुवार के दिन सुबह दस बजकर अठारह मिनट पर भारत को एक संप्रभु लोकतांत्रिक गणराज्य घोषित किया.
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फिर इसके छह मिनट के बाद डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद को भारतीय गणतंत्र के पहले राष्ट्रपति के रूप में शपथ दिलाई गई. तब के गवर्मेंट हाउस, जिसको आज राष्ट्रपति भवन कहा जाता है, के दरबार हाल में शपथ लेने के बाद राजेंद्र प्रसाद को साढ़े दस बजे तोपों की सलामी दी गई.
सन सत्तर के दशक से तोपों से सलामी देने की परंपरा में बदलाव आया और यह गिनती बढ़ाकर 21 तोपों की सलामी कर दी गई. यह सलामी भारतीय सेना के जिन सात तोपों से दी जाती थी उनको ’25 पॉन्डर्स’कहा जाता है. और हरेक तोप से तीन राउंड फायर किए जाते थे. तोपों की सलामी की यह परंपरा बदस्तूर कायम है, लेकिन इस बार से इसमें बदलाव लाया गया है.
एक तरफ तो राजपथ बदलकर कर्तव्य पथ हो गया है तो एक बदलाव यह भी हुआ है कि अब तक जिन ब्रिटिश 25पाउंडर गन से यह सलामी दी जाती रही है, उसे भी बदल दिया गया है. अब कर्तव्यपथ पर स्वदेशी 105 एमएम फील्ड गन से 21 तोपों की सलामी दी जाएगी. इसमें जो एम्युनिशन इस्तेमाल होगा वह भी स्वदेशी ही होगा.
बहरहाल, 1950 के गणतंत्र दिवस के बारे में बीबीसी में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक, “राष्ट्रपति का कारवां दोपहर बाद ढाई बजे गवर्मेंट हाउस से इर्विन स्टेडियम की तरफ रवाना हुआ. यह कारवां कनॉट प्लेस और उसके करीबी इलाकों का चक्कर लगाते हुए करीब पौने चार बजे सलामी मंच पर पहुंचा. तब राजेंद्र बाबू पैंतीस साल पुरानी पर विशेष रूप से सजी बग्घी में सवार हुए, जिसे छह ऑस्ट्रेलियाई घोड़े खींच रहे थे.”

इर्विन स्टेडियम में हुई मुख्य गणतंत्र परेड को देखने के लिए 15हज़ार लोग पहुंचे थे. आधुनिक गणतंत्र के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने इर्विन स्टेडियम में तिरंगा फहराकर परेड की सलामी ली.
उस समय हुई परेड में सशस्त्र सेना के तीनों बलों ने भाग लिया था. इस परेड में नौसेना, इन्फेंट्री, कैवेलेरी रेजीमेंट, सर्विसेज रेजिमेंट के अलावा सेना के सात बैंड भी शामिल हुए थे. आज भी यह ऐतिहासिक परंपरा बनी हुई है. पहले गणतंत्र दिवस के मुख्य अतिथि इंडोनेशिया के राष्ट्रपति सुकर्णो थे.

इतना ही नहीं, इस दिन पहली बार राष्ट्रीय अवकाश घोषित हुआ. देशवासियों की अधिक भागीदारी के लिए आगे चलकर साल 1951से गणतंत्र दिवस समारोह किंग्स-वे (आज का कर्तव्य पथ) पर होने लगा.
1951 के गणतंत्र दिवस समारोह में चार वीरों को पहली बार उनके अदम्य साहस के लिए सर्वोच्च अलंकरण परमवीर चक्र दिए गए थे. उस साल से समारोह सुबह होना शुरू हुआ और उस साल परेड गोल डाकखाना पर ख़त्म हुई.
साल 1952से बीटिंग रिट्रीट का कार्यक्रम शुरू हुआ. इसका एक समारोह रीगल सिनेमा के सामने मैदान में और दूसरा लालकिले में हुआ था. सेना बैंड ने पहली बार महात्मा गांधी के मनपसंद गीत 'अबाइड विद मी' की धुन बजाई और तभी से हर साल यही धुन बजती आ रही थी. लेकिन पिछले साल से इसमें बदलाव लाया गया और 2022 के बीटिंग रीट्रीट में 'ऐ मेरे वतन के लोगों', 'सारे जहां से अच्छा' की धुनें बजाई गई थीं.
साल 1953में पहली बार गणतंत्र दिवस परेड में लोक नृत्य और आतिशबाजी को शामिल किया गया. तब इस अवसर पर रामलीला मैदान में आतिशबाजी भी हुई थी.
उसी साल त्रिपुरा, असम और नेफा (अब अरुणाचल प्रदेश) के आदिवासी समाज के नागरिकों ने गणतंत्र दिवस समारोह में भाग लिया.

दिल्ली के लाल किले में गणतंत्र दिवस के मौके पर हर साल मुशायरा भी होता है. लाल किले के दीवान-ए-आम में यह मुशायरा 1955 में शुरू हुआ. तब मुशायरा रात दस बजे शुरू होता था. उसके बाद के साल में हुए 14 भाषाओं के कवि सम्मेलन का पहली बार रेडियो से प्रसारण हुआ.
1956 में पहली बार पांच हाथी गणतंत्र दिवस परेड में शामिल हुए. उस समय यह डर था कि वायुसेना के विमानों के शोर से कहीं हाथी बिदक न जाएं. ऐसे में उनके परेड में आने के समय को दुरुस्त किया गया. सेना की टुकड़ियों के गुजरने और लोकनर्तकों की टोली आने के बीच के समय में इन सजे-धजे हाथियों को लाया गया. पहली बार जब हाथी परेड में शामिल हुए तब इन हाथियों पर शहनाईवादक बैठे थे.
दिल्ली के गणतंत्र दिवस की एक पहचान सरकारी इमारतों पर रोशनी की भी है. यह परंपरा 1958 से शुरू हुई. 1959 में पहली बार गणतंत्र दिवस समारोह में दर्शकों पर वायुसेना के हेलीकॉप्टरों से फूल बरसाए गए.
1960 में परेड में पहली बार बहादुर बच्चों को हाथी के हौदे पर बैठाकर लाया गया. हालांकि, बहादुर बच्चों को सम्मानित करने की परंपरा पहले ही शुरू हो चुकी थी. उस साल, राजधानी में लगभग 20 लाख लोगों ने गणतंत्र दिवस समारोह देखा, जिसमें से पांच लाख लोग राजपथ पर ही जमा हुए थे.
गणतंत्र दिवस परेड और बीटींग रिट्रीट समारोह देखने के लिए टिकटों की बिक्री साल 1962 में शुरू हुई.
उस साल तक गणतंत्र दिवस परेड की लंबाई छह मील हो गई थी यानी जब परेड की पहली टुकड़ी लाल किला पहुंच गई तब आखिरी टुकड़ी इंडिया गेट पर ही थी. उसी साल भारत पर चीनी हमले से अगले साल परेड का आकार छोटा कर दिया गया.
1973 में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के कार्यकाल में पहली बार इंडिया गेट पर स्थित अमर जवान ज्योति पर सैनिकों को श्रद्धांजलि अर्पित की गई.