Govt notifies new CAFE norms, target 16.7% improvement in passenger vehicle fuel efficiency by 2032
नई दिल्ली
सरकार ने पैसेंजर गाड़ियों के लिए नए 'कॉर्पोरेट एवरेज फ्यूल इकोनॉमी' (CAFE) नियम जारी किए हैं। इनका मकसद अगले पांच सालों में फ्यूल एफिशिएंसी (ईंधन दक्षता) में 16.7% का सुधार करना है, क्योंकि भारत ऑटोमोबाइल सेक्टर में क्लीनर टेक्नोलॉजी, वैकल्पिक ईंधन, इलेक्ट्रिक गाड़ियों और हाइब्रिड गाड़ियों को बढ़ावा देना चाहता है। पावर मिनिस्ट्री (ऊर्जा मंत्रालय) द्वारा जारी ये नए नियम 1 अप्रैल, 2027 से लागू होंगे और 31 मार्च, 2032 तक प्रभावी रहेंगे। पावर मिनिस्ट्री की एक विज्ञप्ति के अनुसार, ये नियम भारत में बिक्री के लिए बनने वाली या इम्पोर्ट की जाने वाली नई पैसेंजर गाड़ियों पर लागू होंगे।
नए फ्रेमवर्क के तहत, फ्यूल-कंजम्पशन (ईंधन खपत) का बेंचमार्क हर साल धीरे-धीरे कड़ा किया जाएगा - 2027-28 में 100 km पर 3.996 लीटर से लेकर 2031-32 में 100 km पर 3.3273 लीटर तक। इस तरह, इस अवधि में लगभग 16.7% का सुधार होगा। सरकार ने नियमों के लिए इस्तेमाल होने वाले रेफरेंस वेट (संदर्भ वजन) को भी 1,082 kg से बढ़ाकर 1,229 kg (लगभग 13.6%) कर दिया है। संशोधित टारगेट लाइन हल्की गाड़ियों के लिए थोड़े आसान टारगेट तय करेगी, जबकि भारी गाड़ियों के लिए फ्यूल एफिशिएंसी की ज़रूरतें ज़्यादा होंगी।
इस फ्रेमवर्क को इस तरह से डिज़ाइन किया गया है कि ऑटोमोबाइल मैन्युफैक्चरर्स को टारगेट पूरा करने के लिए टेक्नोलॉजी चुनने में ज़्यादा फ्लेक्सिबिलिटी (लचीलापन) मिले। यह 'कार्बन न्यूट्रैलिटी फैक्टर' को शामिल करके रिन्यूएबल और कम-कार्बन वाले ईंधन - जैसे इथेनॉल-ब्लेंडेड पेट्रोल, बायोफ्यूल और कम्प्रेस्ड बायोगैस (CBG) - को मान्यता देता है। ईंधन बचाने वाली मान्यता प्राप्त टेक्नोलॉजी की लिस्ट को भी 4 से बढ़ाकर 12 कर दिया गया है। हर योग्य टेक्नोलॉजी के लिए प्रति km 1 ग्राम CO2 की छूट मिलेगी, लेकिन यह छूट ज़्यादा से ज़्यादा प्रति km 9 ग्राम CO2 तक ही सीमित होगी।
बैटरी इलेक्ट्रिक गाड़ियां, रेंज-एक्सटेंडेड इलेक्ट्रिक गाड़ियां, प्लग-इन हाइब्रिड, स्ट्रॉन्ग हाइब्रिड और फ्लेक्स-फ्यूल गाड़ियों को फ्लीट-एवरेज कैलकुलेशन में 'वॉल्यूम डेरोगेशन फैक्टर' या "सुपर क्रेडिट" मिलेंगे। इस कदम का मकसद मैन्युफैक्चरर्स को क्लीनर गाड़ी टेक्नोलॉजी को तेज़ी से अपनाने के लिए प्रोत्साहित करना है। इस नए फ्रेमवर्क से मैन्युफैक्चरर्स को तय दो या तीन साल के कंप्लायंस ब्लॉक में अपनी ज़िम्मेदारियाँ पूरी करने में मदद मिलेगी। जो कंपनियाँ अपने टारगेट से ज़्यादा उपलब्धि हासिल करेंगी, वे क्रेडिट को आगे ले जा पाएँगी। वहीं, जिन कंपनियों में कंप्लायंस की कमी होगी, वे योग्य क्रेडिट का इस्तेमाल कर पाएँगी, दूसरे मैन्युफैक्चरर्स के साथ क्रेडिट का लेन-देन कर पाएँगी या 'ब्यूरो ऑफ़ एनर्जी एफिशिएंसी' द्वारा चलाए जा रहे बायआउट मैकेनिज़्म के ज़रिए क्रेडिट खरीद पाएँगी।
मंत्रालय ने कहा कि यह फ्रेमवर्क बेहतर रेगुलेटरी स्पष्टता, टेक्नोलॉजी चुनने की आज़ादी और लचीलापन देता है। साथ ही, यह पैसेंजर व्हीकल सेक्टर को ज़्यादा एनर्जी एफिशिएंसी और कम फ़्यूल खपत की ओर बढ़ने में मदद करता है।