आवाज द वॉयस ब्यूरो / नई दिल्ली
खेल के मैदानों में संघर्ष और जीत की अनगिनत कहानियां हैं, लेकिन उन में कुछ खास होती हैं जो समाज के बदलाव का प्रतीक बन जाती हैं। परवाज़ स्पोर्ट्स सीरीज में हम आपके सामने लेकर आए हैं भारत की दस ऐसी मुस्लिम महिला खिलाड़ियों की जीवंत तस्वीर, जिन्होंने गांव-खेडों से निकलकर दुनिया के मंचों पर अपनी अलग पहचान बनाई है। ये महिलाएं न केवल खेल में चमकी हैं, बल्कि सामाजिक रूढ़ियों और कठिनाइयों को भी चुनौती दे रही हैं। इनके हौसले और मेहनत की मिसाल हर युवा लड़की के लिए प्रेरणा हैं।

नागपुर की अल्फिया पठान ने मुश्किल हालातों और सामाजिक बंधनों को तोड़ते हुए विश्व चैंपियन बनने का गौरव हासिल किया। एक छोटे से परिवार की लड़की, जिसने अपनी ट्रेनिंग को कभी न छोड़ा। फिल्म मैरी कॉम और अपने भाई से प्रेरणा लेकर, उन्होंने कई विरोधों के बावजूद कड़ी मेहनत की। उनकी मेहनत रंग लाई और उन्होंने AIBA यूथ वर्ल्ड बॉक्सिंग चैंपियनशिप में गोल्ड मेडल जीतकर नाम रोशन किया। रिंग में उनकी तकनीक जितनी धारदार है, उतनी ही उनकी जीवनशैली सादगी से भरी है। अल्फिया की कहानी उन सभी लड़कियों के लिए मिसाल है जो अपने सपनों को पूरा करने की राह पर चल रही हैं।

कोलकाता की अलीमा रहमान को लोग ‘हिजाबी बाइकर’ के नाम से जानते हैं। उन्होंने अपनी आस्था और आत्मविश्वास को साथ लेकर शहर की सड़कों पर बाइक चलाने का साहस दिखाया। पिता का समर्थन उन्हें आगे बढ़ने की ताकत देता रहा, जबकि समाज के कई लोग विरोधी रहे। उपहास और तंग करने वाले रवैये के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी। आज अलीमा सिर्फ बाइक चलाने वाली नहीं, बल्कि एक सशक्त महिला का उदाहरण हैं जो परंपरा और आधुनिकता के बीच सामंजस्य स्थापित करती हैं। वे सड़क सुरक्षा का संदेश भी देती हैं और लड़कियों को हिम्मत देती हैं कि वे हर क्षेत्र में आगे बढ़ सकती हैं।

शूटिंग स्पोर्ट्स की दुनिया में जब मनु भाकर और अभिनव बिंद्रा चमक रहे थे, तब अनीसा सैयद ने अपने दम पर एक अलग पहचान बनाई। महाराष्ट्र की रहने वाली अनीसा ने सीमित संसाधनों के बीच अपने घर पर ही प्रैक्टिस सेटअप बनाया। 2010 राष्ट्रमंडल खेलों में उन्होंने 25 मीटर पिस्टल स्पर्धा में दो गोल्ड मेडल जीतकर इतिहास रचा। हालांकि, बड़ी उपलब्धियों के बावजूद उन्हें कई बार संस्थागत उपेक्षा और व्यक्तिगत कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। आज वे फरीदाबाद में एक शांत जीवन जी रही हैं, लेकिन उनकी कहानी खिलाड़ियों के संघर्षों की याद दिलाती है जो उनकी चमक के पीछे छिपे होते हैं।

गुवाहाटी की फरीहा ज़मान को ‘भारत की बैकस्ट्रोक क्वीन’ कहा जाता है। बचपन से तैराकी की दुनिया में कदम रखने वाली फरीहा ने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई रिकॉर्ड बनाए। प्रशासनिक बाधाओं और असम की समस्याओं के चलते उन्हें अपने गृह राज्य से दूर जाना पड़ा। लेकिन वे वापस लौटीं और अब असम में युवा प्रतिभाओं को आगे बढ़ाने में जुट गई हैं। उनका मकसद है कि कोई भी तैराक उनकी तरह मुश्किलों से न गुजरे।

महिला क्रिकेट के शुरुआती दौर की गवाह गुवाहाटी की नज़रीन अहमद ने उस समय असम को पहली बड़ी महिला क्रिकेट ट्रॉफी दिलाई जब सुविधाएं और समाज का समर्थन बहुत कम था। लाला अमरनाथ के मार्गदर्शन में उनका सफर संघर्षों से भरा रहा। बाद में प्रशासनिक जिम्मेदारियां संभालते हुए उन्होंने महिला क्रिकेट को मजबूत करने का काम जारी रखा। उनकी मेहनत ने आज की मशहूर क्रिकेटर स्मृति मंधाना और हरमनप्रीत कौर जैसे सितारे उगाए।

निजामाबाद की निखत जरीन ने बॉक्सिंग के क्षेत्र में नए कीर्तिमान स्थापित किए। शुरूआती दौर में उनके सामने सामाजिक बाधाएं थीं लेकिन स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया से मिली ट्रेनिंग ने उन्हें मजबूत बनाया। उन्होंने 2022 और 2023 में IBA महिला वर्ल्ड बॉक्सिंग चैंपियनशिप में लगातार दो गोल्ड मेडल जीते और राष्ट्रमंडल खेलों में भी स्वर्ण पदक हासिल किया। निखत की कहानी महिलाओं के खेलों में बढ़ते अधिकारों और सशक्तिकरण की कहानी है।

कन्नूर की उमैरा ने 39 वर्ष की उम्र में पावरलिफ्टिंग शुरू कर सबको चौंका दिया। मास्टर्स कैटेगरी में उन्होंने अपने नाम कई पदक दर्ज किए और करीब 350 किलो का भार उठाकर अपनी ताकत साबित की। परिवार की जिम्मेदारी और चोटों के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी। उनका संघर्ष बताता है कि उम्र या सामाजिक मान्यताएं कभी भी रुकावट नहीं बन सकतीं।

शनाज़ परवीन की कहानी एक साधारण जीत से कहीं बढ़कर है—यह संघर्ष, दृढ़ता और सपनों को साकार करने की प्रेरणादायक यात्रा है। हाल ही में बालासोर में आयोजित अखिल भारतीय विश्वविद्यालय ताइक्वांडो चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक जीतकर उन्होंने अपनी प्रतिभा और मानसिक मजबूती का शानदार प्रदर्शन किया। कठिन मुकाबलों के बीच उन्होंने अनुशासन, रणनीति और आत्मविश्वास से सभी प्रतिद्वंद्वियों को हराया, जिससे वह एक असाधारण खिलाड़ी के रूप में उभरीं।
कारगिल के सांकू गांव में जन्मी शनाज़ का सफर आसान नहीं था। एक रूढ़िवादी माहौल और सामाजिक विरोध के बावजूद उन्होंने ताइक्वांडो को अपनाया। “लड़कियों के लिए यह खेल नहीं” जैसी टिप्पणियों के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी और अपने लक्ष्य पर अडिग रहीं। स्थानीय कोचों के मार्गदर्शन में उन्होंने प्रशिक्षण लिया और धीरे-धीरे जिला, राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर सफलता हासिल की। 2023 में राष्ट्रीय विश्वविद्यालय खेलों में स्वर्ण पदक जीतकर वह लद्दाख की पहली महिला बनीं जिन्होंने यह उपलब्धि हासिल की। इसके बाद उन्होंने अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में भी भारत का प्रतिनिधित्व किया। उनकी हालिया जीत उनके समर्पण और मेहनत का परिणाम है। शनाज़ आज उन सभी लड़कियों के लिए प्रेरणा हैं जो सामाजिक बाधाओं के कारण अपने सपनों को दबा देती हैं। उनकी कहानी बताती है कि मजबूत इरादों और मेहनत से हर मुश्किल को पार किया जा सकता है।

छत्तीसगढ़ के दुर्ग से आने वाली सबा अंजुम करीम ने हॉकी में अपना नाम चमकाया। सीमित संसाधनों और आर्थिक दिक्कतों के बावजूद उन्होंने 2002 राष्ट्रमंडल खेलों में भारत को गोल्ड मेडल दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 90 से अधिक अंतरराष्ट्रीय गोल और अर्जुन पुरस्कार व पद्मश्री जैसे सम्मान उन्हें मिले। आज वे पुलिस अधिकारी के रूप में भी युवाओं के लिए प्रेरणा बनी हैं।

बांदीपोरा की तजामुल इस्लाम ने कम उम्र में किकबॉक्सिंग को चुना और अपने जुनून से दुनिया में अपनी जगह बनाई। मात्र आठ साल की उम्र में 2016 विश्व किकबॉक्सिंग चैंपियनशिप में गोल्ड जीतकर उन्होंने नाम कमाया। उनकी सफलता ने समाज में महिलाओं के प्रति दृष्टिकोण बदलने में मदद की। आज वे लड़कियों के लिए एक मिसाल हैं कि वे अपने सपनों को बिना डरे पूरा कर सकती हैं।
ये सभी खिलाड़ी सिर्फ खेल की मिसाल नहीं, बल्कि सामाजिक बदलाव की प्रतीक हैं। उनकी मेहनत और संघर्ष भारत के नए युग की झलक हैं, जहां महिलाएं हर क्षेत्र में आगे बढ़ रही हैं और अपनी अलग पहचान बना रही हैं। इनके कदम युवाओं के लिए उम्मीद और प्रेरणा की नई किरण हैं जो देश को नई ऊंचाइयों पर ले जा रही हैं।