लखनऊ की आयशा: शायरी से सोशल एंटरप्रेन्योरशिप तक, सहयोग को बनाया कारोबार

Story by  ओनिका माहेश्वरी | Published by  onikamaheshwari | Date 18-08-2026
Lucknow’s Ayesha: From poetry to social entrepreneurship—turning collaboration into a business strength.
Lucknow’s Ayesha: From poetry to social entrepreneurship—turning collaboration into a business strength.

 

ओनिका माहेश्वरी/ नई दिल्ली
 
बिजनेस की दुनिया में सफलता को अक्सर पूंजी, तकनीक और बाजार से जोड़कर देखा जाता है, लेकिन सोशल एंटरप्रेन्योर, डिजिटल मार्केटर और शायरा आयशा अय्यूब का सफर बताता है कि कारोबार की असली ताकत लोगों से जुड़ने, एक-दूसरे को अवसर देने और साथ मिलकर आगे बढ़ने में भी छिपी होती है। लखनऊ से अपने पेशेवर सफर को आगे बढ़ाने वाली आयशा ने डिजिटल मार्केटिंग को केवल रोज़गार का माध्यम नहीं बनाया, बल्कि इसे छोटे कारोबारों और महिलाओं को आगे बढ़ाने के एक मंच के रूप में विकसित किया।

मुंबई में जन्मीं और सऊदी अरब में बचपन बिताने वाली आयशा का लखनऊ तक पहुंचने का सफर कई संस्कृतियों और अनुभवों से होकर गुजरा। उनके पिता करीब 25-26 वर्षों तक सऊदी अरब में व्यवसाय करते रहे। वहीं उनकी शुरुआती शिक्षा हुई और उन्होंने बचपन में उर्दू सीखी। बाद में जब परिवार ने बच्चों की उच्च शिक्षा के लिए भारत लौटने का फैसला किया तो मुंबई और लखनऊ में से लखनऊ को चुना गया।
 
उनका पैतृक घर फैजाबाद, जिसे अब अयोध्या कहा जाता है, में था और उस समय लखनऊ तेजी से विकसित हो रहा था। क्लास 11 में उन्होंने लखनऊ आकर आगे की पढ़ाई शुरू की।
 
 
महानगरीय और सऊदी अरब के सामाजिक वातावरण से उत्तर प्रदेश के सांस्कृतिक परिवेश में बदलाव उनके लिए आसान नहीं था, लेकिन अलग-अलग परिस्थितियों में ढलने की क्षमता आगे चलकर उनके बिजनेस जीवन की महत्वपूर्ण ताकत बनी। उन्होंने बताया कि CMS स्कूल की प्रवेश परीक्षा के दौरान उनकी बहन ने लखनऊ की आलोचना करते हुए एक व्यंग्यात्मक निबंध लिखा था, जिसे स्कूल प्रशासन ने भी पसंद किया। आगे चलकर उनकी वही बहन रेडियो जॉकी बनी।
 
आयशा के करियर की नींव हालांकि बिजनेस से पहले शिक्षा और साहित्य से जुड़ी थी। परिवार में डॉक्टरों का माहौल होने के कारण उनसे भी मेडिकल क्षेत्र में जाने की अपेक्षा की गई।
 
उनके चाचा डॉक्टर थे और उनके पिता ने लखनऊ में अस्पताल स्थापित किया था। परिवार चाहता था कि वह भी डॉक्टर बनें, जबकि उनकी दिलचस्पी साहित्य, भाषा और लेखन में थी। उस दौर में आर्ट्स को लेकर समाज में बनी धारणा भी उनके लिए एक बाधा थी। उन्हें बायोलॉजी पढ़नी पड़ी और करीब पांच वर्षों तक विज्ञान की पढ़ाई की।
 
आज आयशा इस अनुभव को अपने लिए एक उपयोगी संपत्ति मानती हैं। उनका कहना है कि "इल्म कभी जाया नहीं होता।" आज उनके कई क्लाइंट डॉक्टर, डाइटिशियन और मेडिकल प्रोफेशनल हैं और विज्ञान की पृष्ठभूमि उन्हें उनके काम और विषय को बेहतर समझने में मदद करती है। यही बहुआयामी शिक्षा आगे चलकर उनके डिजिटल मार्केटिंग बिजनेस में भी काम आई।
 
आयशा का लेखन से जुड़ाव भी बचपन से रहा। वह अंग्रेजी में निबंध लिखती थीं और 12वीं कक्षा में उन्होंने अपना पहला शेर कहा। उनकी मां उर्दू की लोकप्रिय पत्रिकाएं "महकता आंचल" और "पाकीज़ा आंचल" पढ़ती थीं। इन पत्रिकाओं की कहानियों और गजलों ने आयशा के भीतर साहित्य के प्रति रुचि पैदा की। सऊदी अरब में बचपन में सीखी उर्दू को उन्होंने बाद में व्यवस्थित ढंग से पढ़ा और शायरी की बारीकियों को समझा। आज वह विज्ञान, भाषा, साहित्य और डिजिटल कम्युनिकेशन के इस मिश्रण को अपनी पेशेवर ताकत मानती हैं।
 
 
आयशा के बिजनेस करियर का निर्णायक मोड़ कोविड महामारी के दौरान आया। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत फ्रीलांसर के तौर पर नहीं की थी। वह लखनऊ की एक बड़ी डिजिटल एजेंसी में कंटेंट लीड के रूप में काम कर रही थीं। कोविड के दौरान एजेंसी के कई क्लाइंट चले गए और आर्थिक दबाव बढ़ने के कारण वरिष्ठ कर्मचारियों की छंटनी शुरू हुई। इसी प्रक्रिया में उनकी नौकरी भी चली गई।
 
नौकरी का जाना उनके लिए मुश्किल दौर था, लेकिन यही घटना उनके उद्यमी बनने की शुरुआत बनी। उन्होंने अपना डिजिटल मार्केटिंग व्यवसाय शुरू किया। आयशा के अनुसार कोविड महामारी डिजिटल मार्केटिंग इंडस्ट्री के लिए "Blessing in Disguise" साबित हुई। Zoom मीटिंग, ऑनलाइन बिजनेस, वेबिनार और Work From Home के बढ़ते चलन ने डिजिटल प्लेटफॉर्म को व्यवसाय का महत्वपूर्ण माध्यम बना दिया।
 
इस बदलाव के बीच बड़ी संख्या में महिलाओं ने भी छोटे कारोबार शुरू किए। कई महिलाओं ने घर से अपना व्यवसाय शुरू किया और सोशल मीडिया के जरिए ग्राहकों तक पहुंच बनाने की कोशिश की। आयशा के शुरुआती क्लाइंट्स में ऐसे ही छोटे कारोबार शामिल थे। उन्होंने इन व्यवसायों को डिजिटल पहचान बनाने, सोशल मीडिया पर अपनी उपस्थिति मजबूत करने और संभावित ग्राहकों तक पहुंचने में मदद की।
 
यहीं से आयशा के बिजनेस मॉडल में 'सहयोग' केंद्रीय विचार बन गया। उनके लिए डिजिटल मार्केटिंग सिर्फ किसी कंपनी के सोशल मीडिया अकाउंट को संभालना नहीं था, बल्कि छोटे कारोबारियों को बाजार से जोड़ना और उन्हें अपनी क्षमता दिखाने का अवसर देना भी था।
 
हालांकि Tier-2 शहरों में डिजिटल मार्केटिंग के सामने अपनी चुनौतियां हैं। आयशा के अनुसार छोटे शहरों में आज भी अनेक लोग डिजिटल मार्केटिंग की वास्तविक व्यावसायिक उपयोगिता को पूरी तरह नहीं समझते। कई बार वे इसके लिए उचित भुगतान करने से बचते हैं। इससे डिजिटल प्रोफेशनल्स के लिए अपनी सेवाओं का सही मूल्य हासिल करना मुश्किल हो जाता है।
 
उनका अनुभव है कि करियर की शुरुआत में हर तरह के काम को स्वीकार करना पड़ सकता है, लेकिन समय और अनुभव के साथ पेशेवर को अपनी मेहनत की कीमत समझनी चाहिए। इसी संदर्भ में उन्होंने कहा, "Cheap clients are very expensive." उनका आशय था कि कम भुगतान करने वाले क्लाइंट कई बार अधिक समय, ऊर्जा और संसाधन लेते हैं।
 
इसलिए बिजनेस में सिर्फ क्लाइंट की संख्या नहीं, बल्कि काम की गुणवत्ता और संबंधों की उपयोगिता भी महत्वपूर्ण है। आयशा के लिए बिजनेस की सबसे बड़ी पूंजी नेटवर्किंग है। कोविड के दौरान ही उन्होंने महिलाओं के लिए HER यानी Hurdle Empower Rise नाम से एक नेटवर्किंग प्लेटफॉर्म शुरू किया। यह प्लेटफॉर्म MSME के रूप में पंजीकृत है। 
 
 
उनका उद्देश्य महिलाओं को केवल एक कम्युनिटी उपलब्ध कराना नहीं, बल्कि ऐसा नेटवर्क बनाना था जहां वे नौकरी, बिजनेस, आर्थिक अवसर, नेटवर्किंग और मार्गदर्शन के जरिए एक-दूसरे की मदद कर सकें।
 
आयशा मानती हैं कि कारोबारी दुनिया में नेटवर्किंग सिर्फ परिचय बनाने का माध्यम नहीं है, बल्कि अवसरों का रास्ता है। यदि व्यक्ति लोगों से जुड़ना और संबंधों को बनाए रखना जानता है तो नए अवसर अपने आप सामने आने लगते हैं। उनके अपने शुरुआती क्लाइंट्स भी नेटवर्किंग के जरिए मिले और आज भी उनके अधिकांश क्लाइंट रेफरल और वर्ड-ऑफ-माउथ के माध्यम से आते हैं।
 
इस मॉडल में सहयोग दोतरफा है। एक महिला अपने व्यवसाय की जानकारी दूसरी महिला तक पहुंचाती है, दूसरी महिला उसे अपने नेटवर्क से संभावित ग्राहक से जोड़ सकती है और तीसरी महिला अपनी विशेषज्ञता साझा कर सकती है। इस तरह नेटवर्क केवल संपर्कों की सूची नहीं रहता, बल्कि आर्थिक अवसरों का साझा तंत्र बन जाता है।
 
महिला उद्यमिता को लेकर आयशा का मानना है कि महिलाओं को आगे बढ़ाने के साथ पुरुषों की सोच में बदलाव भी जरूरी है। उन्होंने कहा कि आज की लड़कियां पहले की तुलना में अधिक आत्मनिर्भर और आत्मविश्वासी हैं, लेकिन समाज ने महिलाओं को सशक्त करने पर जितना ध्यान दिया है, उतना पुरुषों की मानसिकता बदलने पर नहीं दिया गया।
 
उनके अनुसार पितृसत्ता केवल महिलाओं को नुकसान नहीं पहुंचाती, बल्कि पुरुषों पर भी परिवार की आर्थिक जिम्मेदारियों का अत्यधिक बोझ डालती है। यदि पति और पत्नी दोनों काम करते हैं तो घरेलू और आर्थिक जिम्मेदारियां भी साझा होनी चाहिए। उनके लिए सहयोग का अर्थ केवल बिजनेस नेटवर्किंग नहीं, बल्कि घर और समाज में भी जिम्मेदारियों की साझेदारी है।
 
विवाह और साझेदारी पर भी आयशा ने इसी नजरिए से बात की। उनका कहना है कि विवाह प्रेम पर आधारित होना चाहिए, हालांकि प्रेम विवाह भी सफलता की गारंटी नहीं है। साथ रहने के बाद ही व्यक्ति के व्यवहार और वास्तविक स्वभाव को बेहतर ढंग से समझा जा सकता है। उन्होंने समाजशास्त्री कमला भसीन के साथ हुई अपनी चर्चाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि विवाह की संस्था लंबे समय तक पितृसत्तात्मक रही है और अब इसे अधिक समानता तथा साझेदारी पर आधारित बनाने की जरूरत है।
 
कामकाजी महिलाओं की चुनौतियों का जिक्र करते हुए उन्होंने अपने जीवन की एक घटना साझा की। एक बार रात में उनके क्लाइंट का फोन आने पर घर में सवाल उठाए गए, जबकि कुछ देर बाद उनके वकील पति के क्लाइंट का फोन आया तो उसे सामान्य माना गया। आयशा के अनुसार आज भी महिलाओं के पेशे को कई बार पुरुषों के पेशे जितनी गंभीरता नहीं दी जाती। हालांकि वह यह भी स्पष्ट करती हैं कि यह समस्या किसी एक धर्म या समुदाय तक सीमित नहीं है, बल्कि अलग-अलग समाजों में अलग रूपों में दिखाई देती है।
 
तकनीक के बदलते दौर में आयशा का बिजनेस विजन अब AI से भी जुड़ गया है। उनका मानना है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से डरने की जरूरत नहीं है। AI अपने आप किसी व्यक्ति की नौकरी नहीं छीनता, बल्कि वे लोग आगे निकलेंगे जो AI का प्रभावी इस्तेमाल करना सीखेंगे। वह अपने भाई की कही बात दोहराती हैं—"AI will not replace you, but people using AI will replace you." उनके अनुसार भविष्य की कारोबारी सफलता का आधार तकनीक से मुकाबला करना नहीं, बल्कि उसे समझकर अपने काम का हिस्सा बनाना है।
 
नई पीढ़ी के कार्यसंस्कृति को लेकर भी उनका नजरिया संतुलित है। वह मानती हैं कि Gen Z अपनी सीमाएं तय करना जानती है और 'ना' कहना सीख चुकी है। उन्होंने अपनी टीम के एक नए कर्मचारी का उदाहरण दिया, जिसने काम मिलने के बाद पूरा दिन गायब रहने के अगले दिन बताया कि वह सो गया था। इसके बावजूद वह Gen Z को प्रतिभाशाली और नई सोच वाली पीढ़ी मानती हैं, बशर्ते उन्हें सही दिशा और जिम्मेदारी का बोध दिया जाए।
 
 
आयशा को चिंता यह भी है कि नई पीढ़ी धीरे-धीरे भाषा और संस्कृति की अपनी जड़ों से दूर होती जा रही है। उन्होंने बताया कि उनकी एक इंटर्न को "देवनागरी" शब्द तक का अर्थ नहीं पता था। उनके लिए भाषा और संस्कृति केवल पहचान का हिस्सा नहीं, बल्कि संवाद और रचनात्मकता की महत्वपूर्ण ताकत भी हैं।
 
इसी बहुआयामी सोच का परिणाम है कि आयशा का कारोबार और उनकी शायरी एक-दूसरे से अलग नहीं हैं। कार्यक्रम के अंत में उन्होंने अपनी गजलों और शेरों के माध्यम से महिलाओं की स्वतंत्र सोच और आत्मनिर्भरता को सामने रखा। "मोहब्बत मोहब्बत अम्मा जाइए, जरूरत-वरूरत अम्मा जाइए…" और "ये औरत की नजरें हैं, सब जानती…" जैसे उनके शेरों को श्रोताओं ने खूब सराहा।
 
युवा महिलाओं के लिए उनका संदेश भी उनके बिजनेस दर्शन से जुड़ा है। वह कहती हैं कि अपनी क्षमताओं पर विश्वास रखें, लगातार सीखते रहें, अपनी आवाज उठाएं और अपने सपनों के लिए समय निकालें। उनके अनुसार सफलता केवल डिग्री या नौकरी से नहीं मिलती। लगातार सीखना, बदलती तकनीक को अपनाना, मजबूत नेटवर्क बनाना, सही लोगों के साथ सहयोग करना और अपनी क्षमता पर विश्वास रखना ही लंबे समय में व्यक्ति को आगे ले जाता है।
 
आयशा अय्यूब की कहानी इसलिए सिर्फ एक महिला के नौकरी से उद्यमी बनने की कहानी नहीं है। यह उस कारोबारी सोच की कहानी है जिसमें प्रतिस्पर्धा के साथ सहयोग भी जरूरी है। डिजिटल मार्केटिंग से शुरू हुआ उनका सफर छोटे व्यवसायों को अवसर देने, महिलाओं को नेटवर्क से जोड़ने और तकनीक को अपनाने तक पहुंचा है। उनके लिए बिजनेस का अर्थ केवल लाभ कमाना नहीं, बल्कि ऐसा नेटवर्क तैयार करना भी है जहां एक व्यक्ति की सफलता दूसरे के लिए अवसर बने। यही सोच उनके उद्यम और उनकी पहचान को एक अलग दिशा देती है।